

शिवरात्रि नई बातें और नया जीवन लाने वाली है। यह बाबा की प्रत्यक्षता की जयंती है। हमें चेक करना है कि हमारा शिवबाबा से कितना सच्चा प्यार है। संपन्नता के दो अर्थ हैं— एक बाहरी संपत्ति (धन), दूसरा आंतरिक भरपूरता (सर्व गुणों से संपन्न)। जब हम (आंतरिक) संपन्न बनेंगे, तभी समान बनेंगे, और समानता से ही बाप की प्रत्यक्षता होगी। बाबा कहते हैं— जो बच्चे जितने न्यारे हैं, उतने ही मेरे प्यारे हैं। न्यारा होने का अर्थ है पुरानी दुनिया और व्यर्थ संबंधों से अलग रहना। किसी से अटैचमेंट नहीं करनी है। हर कर्म एक्यूरेट करने की भावना रखनी है— हमें एक्यूरेट बनना ही है। जहाँ रेस्पेक्ट है, वहाँ लव भी रहता है। सेल्फ-रेस्पेक्ट बहुत जरूरी है, क्योंकि बिना इसके न स्वयं से प्यार होगा, न दूसरों से। समझ से काम लेने वाला ही ज्ञानस्वरूप, शांतस्वरूप और प्रेमस्वरूप बनता है। बाबा कहते हैं— लगंडा पुरुषार्थी (एक पाँव पुरानी दुनिया में, एक संगमयुग में) नहीं बनना है, वरना आगे नहीं बढ़ पाएँगे। जब बाबा को अपना जिम्मेवार मानकर चलते हैं, तो फिक्र नहीं रहती। मन अच्छा है तो दिल अच्छा रहेगा; दिल अच्छा है तो बुद्धि सही चलेगी। अपनी दिल एक दिलाराम बाप को दे दी है— दिल से पूछो, उसमें क्या है? परमात्मा से सच्चा प्यार हो तो कभी प्यार की कमी महसूस नहीं होगी। सेवा में यदि दिलशिकस्त हों, तो बाबा से शेयर करो— वे सुनकर हल्का कर देंगे और शक्ति देंगे। जैसा बाबा हमें बनाना चाहते हैं, वैसा बनना ही स्वयं से सच्चा प्यार है। रोज पूछें— मेरे जीवन का उद्देश्य क्या है? क्या मेरा आज सफल रहा? क्या मेरे जीने से मैं, सब और भगवान खुश हैं? जब भीतर से भाव रहे— सबका भला हो, सब खुश रहें— तो बाबा भी खुश होते हैं।