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सम्पूर्ण समर्पण
Spiritual Classes

सम्पूर्ण समर्पण

BK Jagdish Bhai
75:28191
सम्पूर्ण समर्पण
Spiritual Classes
सम्पूर्ण समर्पण
BK Jagdish Bhai
75:28191 plays

Essence

जब हमारी दृष्टि और वृत्ति बदलती है, तो ज्ञान समझने का तरीका भी बदल जाता है। तब हर चीज हमें परमात्मा की याद दिलाती है और मन आनंदित रहता है।

पहला सर्टिफिकेट : ऐसा जीवन बने कि सभी आत्माएं हमसे संतुष्ट हों—न केवल मनमुटाव न हो, बल्कि उनके दिल से हमारे लिए दुआएं निकलें।

सम्पूर्ण समर्पण : समर्पण का अर्थ है—हमारी हर इंद्रिय, मन और बुद्धि शिव बाबा को अर्पित हो। दृष्टि, वृत्ति और कर्म—सब में कल्याण, रहम और शुभ भावना हो। जो इंद्रियों पर विजय पा लेता है, वही सच्चा “ इंद्रियजीत ” बनता है।

समर्पण का पहला लेसन : “ मैं देही, आत्मा हूँ ”—इस स्मृति में रहना। देह-अभिमान रहते योग नहीं लग सकता। परमात्मा ही विकर्मों को दग्ध कर सकता है और संस्कारों को शुद्ध बनाता है।

कर्मातीत अवस्था के 3 भाव है - 
-देहातीत - देह के भान से न्यारे, कोई देहधारी भी याद न आए
-कर्म के फल (निंदा-स्तुति, लाभ-हानि) से अप्रभावित रहना
-कर्तापन का भाव न होना—“वो (बाबा) करवा रहा है”
यह तीनों ही प्रैक्टिस हमारे साथ साथ चले तब हमें निराकारी स्थिति का अनुभव होने लगेगा।

योग और समर्पण का संबंध : जब हम बिना अपेक्षा के कर्म करते हैं और प्रशंसा की इच्छा नहीं रखते, तब योग मजबूत होता है। अच्छे कर्म करते हुए मस्त रहना ही सच्चा पुरुषार्थ है।

फरिश्ता और कर्मातीत में अंतर : फरिश्ता अवस्था में हल्कापन महसूस होता है, जबकि कर्मातीत अवस्था में पूर्ण देह-भान समाप्त होकर आत्मिक स्थिति में स्थिरता होती है। इसी अवस्था में विकर्म भस्म होते हैं।

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