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54 संगमयुग पर तीव्र पुरुषार्थ की विधि
Spiritual Classes

54 संगमयुग पर तीव्र पुरुषार्थ की विधि

Dadi Janki Ji
58:25173
54 संगमयुग पर तीव्र पुरुषार्थ की विधि
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54 संगमयुग पर तीव्र पुरुषार्थ की विधि
Dadi Janki Ji
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Essence

बाबा हमें अभी इतनी पालन दे रहे हैं ताकि हम वैजयंती माला का दाना बनें। लेकिन श्रीमत में मनमत मिक्स न हो। श्रीमत से बुद्धि श्रेष्ठ और दिव्य बनती है। ऐसा लंबे समय का पुरुषार्थ ही वैजयंती माला में स्थान दिलाता है।
बाबा की याद का सच्चा प्रमाण है — उनके गुण आप में दिखाई देना।

बाबा ने कहा है — ज्ञान अज्ञानियों को सुनाने के लिए है, और आपस में स्नेह और सहयोग की लेन-देन हो। मनमनाभव से मन बाबा में लगे, अशरीरी भाव से कर्मेंद्रियाँ शांत हों — यही सच्ची साइलेंस है। कर्म करें, पर इच्छा-वश नहीं; कर्म श्रेष्ठ हों।

जिसने समझ लिया कि यह पुरानी दुनिया है और नई दुनिया आ रही है, उसे “मुझे फुर्सत नहीं है” नहीं कहना चाहिए। इतना पावन बनें कि डबल-अहिंसक रहें — काम-कटारी ही नहीं, मुख से कड़वे बोल भी न निकलें।

जब स्मृति रहती है “मैं आत्मा हूँ”, तब परमात्मा बाप की ओर खिंचाव होता है। बाबा कहते हैं — पुराने विकारी कर्मबंधन समाप्त करो, फिर मैं तुम्हें घर ले चलूँगा। इसके लिए योगबल चाहिए — जिससे विकर्म विनाश हों। अनादि-आदि संस्कार बनें, मध्य के संस्कार योगबल से भस्म हों।

“अमृतवेले के समय, संकल्प यह हो कि, मैं बाबा का ही हूँ” इस भाव से योग में बैठें। नुमाशाम के समय डबल-लाइट, फरिश्ता रूप में बैठें। सुबह — हम बाबा के; शाम — बाबा ने हमें क्या बनाया, उस स्वरूप में स्थित हों। बाबा के नियमों पर चलने से फायदा ही फायदा है।

समय, स्वयं, बाबा और लक्ष्य — इन चारों को कभी न भूलें। समय व्यर्थ गंवाया तो साथ का अनुभव कम हो जाएगा। यह संगम की वेला, विनाशकाल और घर जाने का समय है तो स्वयं से पूछें: “मैं क्या कर रही हूँ?”

स्थायी खुशी तब रहती है जब बाबा हमसे खुश रहते हैं। बाबा चाहते हैं — याद से आत्मा पर चढ़ी जंग हटे और आत्मा समीप पहुँचे। कुसंग भी जंग का कारण है। बाबा की पसंद का कार्य करेंगे तो खुशी स्वतः मिलेगी।

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