

संगमयुग पर स्वयं को भरपूर अनुभव करो। केवल यह न सोचो कि हम संगमयुग पर हैं, बल्कि बुद्धि से, कलयुग से किनारा करके अपनी (ब्राह्मणों की) दिनचर्या अनुसार चलो, इसमें बहुत फायदा है। बाबा की याद में बैठना एक सेवा है। इससे वायुमंडल शांत बनता है। लेकिन व्यर्थ संकल्प शक्ति को कमजोर करते हैं, और याद से मिली शक्ति व्यर्थ में लीक हो जाती है। याद में बैठते समय अगर बाहर की दुनिया याद आती है तो योग नहीं लगेगा। अंदर संकल्प रहे — मुझे उदाहरण मूर्त और सतोप्रधान बनना है। स्वयं पर रहम नहीं करेंगे तो बाबा की ब्लेसिंग मिलकर भी काम नहीं आएगी। दिल में बाबा को बैठाने से ही सच्ची खुशी मिलती है। दिल से की हुई निष्काम सेवा खुशी बढ़ाती है। जिसकी श्वासों श्वास में बाबा की याद है, उसका मन और स्वास्थ्य भी अच्छा रहता है। ज्यादा “चाहिए-चाहिए” की इच्छा, जैसे धन, चीजें, आदि, मन को टॉकी बनाते हैं और साइलेंस से दूर करते हैं। एक म्यान में दो तलवारें नहीं रह सकतीं — साधारणता ही उन्नति का आधार है। रूठने और अपसेट होने की आदत बहुत खराब है। जो स्वयं ठीक नहीं, वह सेवा भी ठीक नहीं कर सकता। रोज मनन-चिंतन न हो तो समझो नुकसान हुआ। अपने आप से पूछो — आज मैंने पुण्य आत्मा बनने का कितना ध्यान रखा? जो होमवर्क नहीं करते, उन्हें क्लास में रुचि नहीं रहती। यदि बाबा के सामने हाजिर नहीं होंगे, तो धर्मराज के सामने होना पड़ेगा। जो सदा बाबा के सामने हाजिर रहता है, उसके साथ बाबा भी बंधे रहते हैं।