बाबा ने हमें निश्चय बुद्धि बनाकर समर्पित जीवन का संकल्प दिया है। समर्पण का अर्थ है—बुद्धि, मन, तन और जीवन बाबा को अर्पण करना। इसके तीन आधार हैं—त्याग, तपस्या और सेवा। देह-अभिमान, मोह, विकार, इच्छाओं और अपनी मनमर्जी का त्याग कर बाबा की श्रीमत पर चलना है। भाव रहे—“बाबा मिला, सब कुछ मिला।”
सच्चा संस्कार परिवर्तन केवल व्यवहार में नहीं, बल्कि दृष्टि, वृत्ति, वाणी और कर्म में दिखाई देता है। क्रोध, ईर्ष्या, जिद, सुस्ती जैसे पुराने संस्कारों को पहचानकर दृढ़ संकल्प से उन्हें बदलना है। मधुरता, निर्माणता और सभी के प्रति प्यार ही वास्तविक परिवर्तन की निशानी है।
तपस्या अर्थात् स्वयं पर कंट्रोल और हर कर्म में बाबा की याद। बाबा के तीन मंत्र हैं—निराकारी, निरहंकारी और निर्विकारी बनना। देह-अभिमान से न्यारे, अहंकार से मुक्त और विकारों से पवित्र रहना ही योगी जीवन की पहचान है।
नष्टोमोहा बनकर सभी संबंध बाबा से जोड़ने हैं। भाव रहे—“सब मेरे हैं और मैं सबका हूँ, लेकिन बाबा के सिवा कोई मेरा नहीं।” अपना अधिकतम समय पढ़ाई, योग और सेवा में लगाकर सदा सेवा के लिए हाज़िर रहना है।
मुख्य संकल्प: “मेरे लिए एक बाप, दूसरा न कोई। बाबा मिला तो सब कुछ मिला। मैं अपने पुराने संस्कारों को परिवर्तन कर निराकारी, निरहंकारी और निर्विकारी बनकर बाबा की सेवा में सफल बनूँगी।”
