

ईश्वरीय विश्वविद्यालय में चारों सब्जेक्ट के माध्यम से बाबा बार-बार याद की यात्रा, लग्न में मगन रहने और मनमनाभव की ओर ध्यान खिंचवाते हैं। हम चाहते हैं कि योग की स्थिति पावरफुल बने, लेकिन विघ्न और पुराने संस्कारों के कारण वह स्थिति सहज नहीं बन पाती। बाबा ने सहज राजयोग सिखाया है, जिसमें संतुष्टता व मैत्री भाव का विशेष महत्व है। इनके बिना योग की स्थिति स्थिर नहीं होती और बिंदु रूप अवस्था भी कठिन लगती है। बाबा ने संतुष्टता को तीन सर्टिफिकेट कहा है— 1. हम अपने से संतुष्ट हों। 2. दूसरे हमसे संतुष्ट हों। 3. शिव बाबा हमसे संतुष्ट हों। संतुष्टता एक महान गुण है, जैसे नम्रता, मधुरता और सहनशीलता। इसी तरह मैत्री भाव भी बहुत आवश्यक है। मैत्री का अर्थ केवल अच्छे लोगों से प्रेम नहीं, बल्कि जो हमें दुख दे, उसके प्रति भी शुभ भावना रखना है। नफरत का जवाब प्रेम से देना, अपकारी पर उपकार करना—यही सच्ची मैत्री है। जब जीवन में संतुष्टता और मैत्री होती है, तब अन्य दिव्य गुण भी सहज आ जाते हैं। यही सभी गुणों की नींव हैं। योग न लगने का मुख्य कारण नेगेटिव सोच और असंतुष्टता है। क्रोध, द्वेष, ईर्ष्या, रूठना—ये सब असंतोष के रूप हैं। “योग नहीं लग रहा” सोचने के बजाय “मुझे योग करना है” यह संकल्प रखें। “बाबा मेरा है, मैं बाबा का हूँ”—यही याद की यात्रा है। हम सबके मित्र हैं और सबकी भलाई चाहते हैं। इसलिए जब हम किसी को ज्ञान, योग या धारणा की बातें बताते हैं, तब उसमें भी हमारा मैत्री भाव ही होना चाहिए