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सतयुग का वर्णन
Spiritual Classes

सतयुग का वर्णन

Dadi Kamal Sundari Ji
46:15215
सतयुग का वर्णन
Spiritual Classes
सतयुग का वर्णन
Dadi Kamal Sundari Ji
46:15215 plays

Essence

बाबा कहते थे—साइंस के साधन तुम्हारे सेवक बनेंगे, क्योंकि तुम मालिक हो। सतयुग में यही विज्ञान तुम्हें सुख देगा। पर असली महिमा उन आत्माओं की है जो पवित्र संकल्प और योगबल से स्वयं को बदलती हैं।

एक बार बाबा ने कहा—“बच्चों, तुम ब्रह्मा बाबा के पास नहीं, मेरे पास आए हो। मैं परमधाम का निवासी हूँ। सारा खाता मेरा है। वर्सा मुझसे लेना है।” यह सुनकर आत्मा आनंद से भर जाती थी। बापदादा का मिलन प्रत्यक्ष अनुभव होता था।

यज्ञ के दिनों में अनेक कठिनाइयाँ भी आईं। भोजन की कमी हुई, तो बाबा ने साधारण भोजन का कार्यक्रम दिया—मक्के, ज्वार, चावल की रोटी, छाछ और खिचड़ी। फिर भी सब खुशी से चलते रहे। बाबा ने सिखाया कि समय के लिए अन्न का संग्रह भी रखना चाहिए।

अब सतयुग की झलक सुनते दादीजी नि कहा, वहाँ महल विशाल और सुंदर होते हैं, दरवाजों की जगह पर्दे होते हैं। सबके पास विमान होते हैं, जिनसे यात्रा होती है। चारों ओर शांति रहती है।
लक्ष्मी-नारायण के महल में सेवक-सेविकाएँ रहती हैं। वे प्रेम से सेवा करते हैं। वस्त्र, आभूषण और वैभव अपार होता है। हर समय नई सजावट, नई शोभा और नया आनंद होता है। वहाँ सब सम्पन्न हैं, कोई कमी नहीं।
राजा-रानी और प्रजा में बहुत प्रेम होता है। सब एक-दूसरे के गुण गाते हैं। यथा राजा-रानी, तथा प्रजा—सभी सुखी, संतुष्ट और मर्यादित रहते हैं।

आज संगमयुग में हम वही पद्मापदम भाग्यशाली आत्माएँ हैं। इसलिए शिवबाबा की हाजिरी में हर पल अमूल्य है। जितना समय बाबा के साथ रहें, उतना कम है।

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