63 जन्मों के संस्कारों के कारण बाबा की शिक्षा जीवन में स्थिर नहीं रहती। जब शिक्षा स्मृति में आती है, तब स्थिति (अव्यक्त/फरिश्ता) स्थिर हो जाती है।
बाल ब्रह्मचारी जीवन सबसे श्रेष्ठ भाग्य है। इस अवस्था में ऊर्जा अधिक होती है, जिसे सही दिशा में लगाने से उन्नति होती है, और गलत दिशा में लगाने से गिरावट।
इच्छा को दबाना नहीं, उसका सदुपयोग करना है। सेवा में लगाई गई इच्छा उत्थान का कारण बनती है, जबकि सांसारिक इच्छा पतन का कारण बन सकती है।
कर्म तीन आधारों पर बनते हैं: संकल्प, संस्कार और स्मृति । इन तीनों को बदलने से कर्म और जीवन बदल जाता है।
बाबा हमें नए, पॉजिटिव और गोल्डन थॉट्स देते हैं, जिससे पुराने देह-अभिमान के विचार बदलकर आत्म-अभिमान में बदल जाते हैं।
बार-बार किए गए कर्म स्मृति बनते हैं और वही आगे चलकर संस्कार बन जाते हैं। संस्कार गुप्त होते हैं लेकिन जीवन को प्रभावित करते हैं।
स्मृति से स्थिति बनती है, स्थिति से संस्कार बदलते हैं और संस्कार से कर्म बनते हैं। इसलिए योग का अर्थ है सही स्मृति बनाए रखना।
निर्णय शक्ति स्थिर और शक्तिशाली होनी चाहिए। सत्बुद्धि और ज्ञान के पॉइंट्स से सही निर्णय लेने की शक्ति बढ़ती है।
चार मुख्य शक्तियां हैं: इच्छा शक्ति, निर्णय शक्ति, स्मृति शक्ति और धारणा शक्ति। यही मिलकर रूहानी शक्ति बनती हैं।
अंगद समान बनना है—अपनी इन्द्रियां और शरीर बाबा को समर्पित कर देना, तब माया प्रभाव नहीं डाल सकती।
जैसा सोचेंगे, वैसा बनेंगे। इसलिए विचार और स्मृति को शुद्ध और शक्तिशाली बनाना ही असली परिवर्तन है। Purity, Peace, Prosperity – यह आपका जन्मसिद्ध अधिकार है।
