ब्राह्मण जन्म की स्मृतियों द्वारा
समर्थ बन सबको समर्थ बनाओ
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स्नेह सागर की बाहों में यूं,
खो जाएं हम, ओ...खो जाएं हम।
स्नेह के मोतियों की माला,
पहनाएं हम, उन्हें पहनाएं हम।
स्नेह सागर की बाहों में यूं,
खो जाएं हम, हो... खो जाएं हम।
स्नेह की है शक्ति अटूट,
सहज योगी बनाए।
यही शक्ति ही वरदान बन,
हमको आगे बढ़ाए।
स्नेह भरे अनुभव को,
जीवन में संजोएं।
हो , अपना जीवन स्नेह पर ही,
आदि काल से है खड़ा।
स्नेह सागर की बाहों में यूं,
खो जाएं हम,हो...खो जाएं हम।
सुंदर स्मृतियों में ये नयन,
रूहानी खुशी झलकाएं।
जैसी स्मृति वैसी ही,
समर्थी को हम पाएं।
बनके समर्थ, सबको भी,
समर्थ हम बनाएं।
मैं आत्मा, यही आदि स्मृति से,
हमें ये ब्राह्मण जीवन मिला।
स्नेह सागर की बाहों में यूं,
खो जाएं हम, हो... खो जाएं हम।
कृपालु बन आत्माओं को,
देनी है सुख-शांति।
वंचित न रहे कोई,
कुछ तो मिले उन्हे प्राप्ति।
खुद की भी स्थिति हम बनाएं,
अशरीरी-अव्यक्ति।
हो , मन की नैया, हद के किनारों से,
मुक्त करने की है ये घड़ी।
स्नेह सागर की बाहों में यूं,
खो जाएं हम,हो... खो जाएं हम।
स्नेह के मोतियों की माला पहनाएं हम,
उन्हें पहनाएं हम।
उन्हीं में खो जाएं हम।
