"तपके बल से तपते मन को
कर ले शीतल शीतल
तपके बल से तपते मन को
कर ले शीतल शीतल
कर ले शीतल शीतल
तन के रथ का रथी है तू
तन के रथ का रथी है तू
रूप तेरा है निर्मल
रूप तेरा है निर्मल
शुद्ध संकल्पों के मोतियों से
चिंतन को सजाना है
सिद्धि स्वरूप बनके अब
इस जग को महकाना है
पावन करने हर मन को
पावन करने हर मन को
बन जा गंगा का जल
बन जा गंगा का जल
कर्म सुकर्म हो हर पल शिव पिता की याद से
प्रेम रूहानी दे सभी को पल पल कर आबाद ये
सुख का रस पीना पिलाना
सुख का रस पीना पिलाना
पुण्य का ये ही फल
पुण्य का ये ही फल
आचरण को दिव्य गुणों से सतोप्रधान बनाना है
जैसे सूरज तम को मिटाए वैसे तुमको मिटाना है
प्यार प्रभु का भर के दिल में
प्यार प्रभु का भर के दिल में
कर ले जीवन विमल
कर ले जीवन विमल
तपके बल से तपते मन को
कर ले शीतल शीतल
कर ले शीतल शीतल
तन के रथ का रथी है तू
तन के रथ का रथी है तू
रूप तेरा है निर्मल
रूप तेरा है निर्मल
रूप तेरा है निर्मल
रूप तेरा है निर्मल
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