ठहर जा ओ मानव किधर जा रहे हो
उमंग नहीं तुम जिधर जा रहे हो
ठहर जा ओ मानव किधर जा रहे हो
उमंग नहीं तुम जिधर जा रहे हो
साधनों में उलझा हुआ तेरा मन है
बीच भवर में फसा ये जीवन है
सुनहरा ये मिथ तुमको दौड़ा रहा है
साया है जो तुमको भरमा रहा है
मिथ्या है सब मन क्यू बहका रहे हो
ठहर जाओ मानव किधर जा रहे हो
ठहर जा ओ मानव किधर जा रहे हो
उमंग नहीं तुम जिधर जा रहे हो
आओ बदले ये चिंतन की धारा
समझे प्रभुके समय का इशारा
सदियों से ढूंढे जिसे विश्व सारा
वही धरापर स्वयं पधारा
सुना अनसुना क्यू किए जा रहे हो
ठहर जाओ मानव किधर जा रहे हो
ठहर जाओ मानव किधर जा रहे हो
उमंग नहीं तुम जिधर जा रहे हो
दिन होंगे सुख के सुखो की राते
ऐसे जहा में चले गुनगुनाते
सपनो से सुंदर लगे जो नजारा
आया की आया वो संसार प्यारा
प्रभु का निमंत्रण क्यू ठुकरा रहे हो
उमंग नहीं तुम जिधर जा रहे हो
ठहर जा ओ मानव किधर जा रहे हो
उमंग नहीं तुम जिधर जा रहे हो
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