किताब कर्म की, बड़ी ही निराली है। लिखी जीवन की, इसमें कहानी है... मन की कलम से, सोच की स्याही से, भाग्य की दवात से, भावना के हाथ से। हर कर्म छोड़े, अमिट निशानी है। हर क्षण बोले, कथा पुरानी है। कर्म की किताब, खुली पड़ी है। कड़ा है हिसाब, सच्चाई बड़ी है। किताब कर्म की, बड़ी ही निराली है। लिखी जीवन की, इसमें कहानी है... कर्म का चेहरा, रहस्य गहरा, कभी उजाला, कभी कोहरा। मन का दर्पण, सच दिखाता, जो बोया गया, वो लौट आता। कर्म की लहरें, समय में बहें, संसार के किनारे, मौन में ठहरें। किताब कर्म की, बड़ी ही निराली है। लिखी जीवन की, इसमें कहानी है... कर्म नहीं डराते, वो बस सिखाते। कर्म नहीं बांधते, दर्पण दिखाते। ये किताब तो, तेरे भीतर है। जरा पढ़ तो, समय कम है। देख स्वयं को, जान ले राज़। जला पाप को, योग से आज। किताब कर्म की, बड़ी ही निराली है। लिखी जीवन की, इसमें कहानी है... जाग जा तू, पन्ना पलट। आँखें खोल तू, अब न भटक। शुभ ही लिख, अब से निरंतर। स्वयं ही देख, अपना अंतर। चल बन वो लेखक, लिख जीवन प्रेरक, बन विश्व सेवक, दे प्रकाश की झलक। किताब कर्म की, बड़ी ही निराली है। लिखी जीवन की, इसमें कहानी है... ---------------------------------------------- ----------------------------------------------