"इस धरती पर अतिथि है तु मुल वतन का वासी
इस धरती पर अतिथि है तु मुल वतन का वासी
तु आत्मा है अविनाशी तु आत्मा है अविनाशी
पांच तत्व के तन को तुने रूप स्वयं का माना
इसीलिए ही पड़ा है तुझको बार बार पछताना
अब तो आंखे खोल के अपनी
अब तो आंखे खोल के अपनी
काट ताल की बांसी
तु आत्मा है अविनाशी तु आत्मा है अविनाशी
परम पिता से जोड़ के रिश्ता बन जा उनका बच्चा
योगाग्नि में तपने से ही दिव्य सोना सच्चा
शिव की शक्ति पाकर होगा
शिव की शक्ति पाकर होगा
हीरा स्वयं प्रकाशी
तु आत्मा है अविनाशी तु आत्मा है अविनाशी
निराकार शिव परमात्मा की श्रीमत पर ही चलना
माया के इस कीचड़ में कमल फूल सा खिलना
सुख शांति का वर्सा पाकर
सुख शांति का वर्सा पाकर
हर ले मन की उदासी
तु आत्मा है अविनाशी तु आत्मा है अविनाशी
तु आत्मा है अविनाशी तु आत्मा है अविनाशी"
