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जब-जब अधर्म बढ़ा धरती पर, जब-जब मन हुआ निर्बल, तब-तब तूने प्रकट होकर संहार का शंखनाद फूँका है। आ आ आ आदिशक्ति तू.... शिवशक्ति तू... दिव्य शक्ति तू... मातृ शक्ति तू... तू रूद्र की रूद्राणी, शिव की आदिशक्ति है, तू महाकाल की महाकाली, महादेव की रणचंडी है। आसुरी वृत्तियों ने जब मन की रणभूमि में, विकारी आँधीयों ने जब कोहराम मचाया था, तब तूने ही अपने हाथों में खड्ग उठाया था। तू रूद्र की रूद्राणी, शिव की आदिशक्ति है, तू महाकाल की महाकाली, महादेव की रणचंडी है। जय भवानी के जयघोष से, आज भी रणभूमि सजती है। कालरात्रि खप्परवाली से, असुर निशाचर अब भी डरते हैं। तेरी एक प्रचंड हुंकार से, दैत्यों के प्राण काँप थर्राते हैं। तू रूद्र की रूद्राणी, शिव की आदिशक्ति है, तू महाकाल की महाकाली, महादेव की रणचंडी है। तेरी हिम्मत को देखकर सब तुझे शेरावाली कहते हैं। तेरे प्रताप को याद कर तुझे पहाड़ावाली कहते हैं। तेरी एक झलक पाने लिए भक्त भी तरसते रह जाते हैं। तू रूद्र की रूद्राणी, शिव की आदिशक्ति है, तू महाकाल की महाकाली, महादेव की रणचंडी है। अब फिर से अपने हाथों में ज्ञान का खप्पर उठा ले। योग का कवच धारण कर, वैराग्य की मुंडमाला पहन ले। ज्वालामुखी तप करके पाप की आँधी मिटा दे। घर-घर में यह गूँज सुना दे— जय भवानी! जय शिवशक्ति! जय रणचंडी! जय महाकाली! जय पार्वती! जय जगदम्बे! जय दुर्गे! जय अम्बे! तू रूद्र की रूद्राणी, शिव की आदिशक्ति है, तू महाकाल की महाकाली, महादेव की रणचंडी है।