

वृत्ति से वायुमंडल बनता है और वायुमंडल से वाइब्रेशन्स बनते हैं। जैसे मधुबन में ज्ञान गंगा बहती रहती है, तो वायुमंडल में ज्ञान होता ही है। यहां मधुबन में वायुमंडल, वातावरण, वाइब्रेशन्स की मदद है, तो उस हिसाब से देखना है कि जमा का खाता कितना हुआ है। इसी जन्म में (जबकि थोड़ा समय ही रहा है) हमें जमा का खाता बढ़ाना है। बाबा ने दो शब्द कहे — “अचानक” और “एवररेडी”। सब सीन अचानक होने हैं, इसलिए एवररेडी रहना है — अचानक भी होगा और अति में होगा। क्योंकि नियम है — अति में जाकर ही अंत होगा। हमारे पुराने संस्कार भी अति में इमर्ज होंगे, क्योंकि विदाई ले रहे हैं। जैसे वैद्य भी कहते हैं कि बीमारी अति में जाकर निकलेगी। बल्ब भी जब जाने वाला होता है, तो तेज चमकता है, फिर चला जाता है। कुछ बच्चे चार्ट रखते हैं कि हमने किसी को दुख नहीं दिया, कुछ व्यर्थ नहीं सोचा। लेकिन बाबा कहते हैं — कितनों को सुख दिया? कितने शुभ संकल्प किए? यह चार्ट में लिखो। जमा करना अर्थात व्यर्थ से बचना, समय को बचाना, संकल्प को बचाना। अब संकल्प को कंट्रोल करना सीखना है। यदि एक मिनट में दस संकल्प चलें, तो पाँच संकल्प करो। यही जमा का खाता हुआ, जो हमें ही काम में आएगा। बाबा की लहर है — जमा का खाता बढ़ाओ और वाइब्रेशन्स फैलाओ। दोनों में अटेंशन चाहिए। फिर बाबा पूछेंगे — कितना प्रतिशत बचत किया? रोज अपना खुद का चार्ट देखना है। ऐसे नहीं कि केवल सुबह और रात को ही चेक किया, बल्कि बीच-बीच में भी चेक करना है। चेक करना है — काम करते हुए स्वमान की स्मृति रही या नहीं। जैसे रोटी बेलते हैं तो याद करो — चक्र भी गोल है, हमारा पार्ट भी गोल है। ऐसे-ऐसे याद करना चाहिए। किसी भी रीति से स्वमान में रहना आना चाहिए। बाबा कहते हैं — स्वमान में हैं तो स्व-परिवर्तन स्वतः ही होता है, क्योंकि देहभान नहीं रहता। दूसरे केवल अटेंशन खींचवा सकते हैं। हर मुरली में रोज बाबा स्वमान के नशे की बात बताते हैं, तो अपने मन-बुद्धि को उस नशे में रखना है, ताकि व्यर्थ संकल्प, चाहे स्वभाव-संस्कार के रूप में हों, समय न गवा दें। आलस्य या अलबेलापन न आए। जैसे वी.आई.पी. होते हैं, वे पाँच मिनट भी नहीं गवाते — इतना एक्यूरेट टाइमटेबल रखते हैं। ऊँचे तो ऊँचा भगवान है, और हम उनके बच्चे हैं — तो हम भी ऊँचे-से-ऊँचे हैं। इसलिए हमें भी अपना खुद का टाइमटेबल बनाना चाहिए। अमृतवेला से पूरे दिन का मन का टाइमटेबल बनाना है। मुरली में से कोई भी एक पॉइंट या स्वमान को बार-बार याद करना — (स्थिति में स्थित होना) — आवश्यक है। जब मन-बुद्धि फ्री होती है, तो माया आती है, इसलिए मन को बिज़ी रखना है। अंतर्मुखी रहना है — अंतर्मुखी अर्थात आत्मा की स्टेज में स्थित होना। बाह्यमुखी नहीं, बल्कि ऐसी स्टेज पर रहना है। हमने माया को चैलेंज किया है, तो वह भी रॉयल रूप में आएगी। जिस रूप में हमने उसे परखा है, उस रूप में नहीं आएगी — नए रूप में आएगी, जहाँ गलत बात सही लगेगी। मधुबन में सेवा का चांस मिलना भी तपस्या का फल है। यदि हमने सिर्फ कर्म किया, तो कुछ फायदा नहीं — वो तो बाहर वाले साइंटिस्ट भी करते हैं। हम कर्मयोगी हैं। कर्म के साथ योग भी होना चाहिए। नष्टोमोहा बनना है — हर कर्मेंद्रिय से संबंध हो, लेकिन बंधन में नहीं आना चाहिए। इसलिए यह चेकिंग करनी है कि हम वास्तव में बंधनमुक्त हैं या नहीं। मुरली में मुझे भगवान ने कहा है — यह कोई कम बात नहीं। भगवान और भाग्य को याद करो। अगर कोई भी भाग्य की बात याद रहे, तो हम उड़ते रहेंगे। देहभान की मिट्टी में हमारी बुद्धि जाएगी ही नहीं, यदि हम भगवान और भाग्य को याद करते रहेंगे।