संगमयुग की ये थोड़ी-सी घड़ियाँ बहुत कीमती हैं। यही समय हमें बाबा की स्मृति दिलाता है। अतीन्द्रिय सुख का अनुभव और अचल, परिपक्व अवस्था अभी ही बनानी है।
दिलाराम बाप मिलने से दिल को सच्चा आराम मिलता है। कर्म करते हुए बाबा के प्यार की शक्ति से न्यारे बन जाते हैं। अगर दिल में बाप के सिवाय कुछ और होगा, तो मन भारी रहेगा। दिल हल्का और बाप के पास होना चाहिए।
दिल से सेवा वही कर सकते हैं, जिन में बाबा के प्यार की शक्ति हो। वही शक्ति सेवा कराती है। हमारा पुरुषार्थ भी उसी शक्ति से चलता है।
सर्वशक्तिमान की शक्ति से स्वयं को विक्रमाजीत बनाना है। हमारे लिए विक्रमाजीत संवत अभी से शुरू हो गया है, न कि केवल सतयुग से। सेवाधारियों को साधना से विजय प्राप्त करनी है, साधनों के वश नहीं होना है। साधना की सिद्धि से खुशी और शक्ति जमा होती रहती है।
बाबा ने स्नेह की शक्ति से हमें अपना बनाया है। बाप हमें भी रूहानी शक्ति से भरपूर कर देते है। ऐसे जीवन से ही हम दूसरों को भी उनकी शक्तियों का अनुभव करा सकते हैं।
जो केयरलेस और सुस्त होते हैं, उन्हें अधिक मेहनत करनी पड़ती है और फिर वे निराश हो जाते हैं। सुस्ती रावण की बहन है — इसे कभी आने न दें। अलर्ट रहना एक बड़ा गुण है।
पुरुषार्थ में बहाना बनाना, अपने आप को धोखा देना है। कोमल स्वभाव भी जल्दी दुखी और अशांत बना देता है। जब व्यर्थ समाप्त हो जाता है, संकल्प समर्थ और कर्म श्रेष्ठ होते हैं, तब फरिश्ता अवस्था बनती है।
