

यही बहार है दुनिया को भूल जाने की, प्रभु से मधुर-मधुर मिलन मनाने की। ग़म के थे छाए बादल, उदासी की थी घटाएं, दुनिया ये लग रही थी, अनजानी सी पराई। दिल में थी चाहत प्रभु को पाने की, यही बहार है दुनिया को भूल जाने की, प्रभु से मधुर-मधुर मिलन मनाने की। प्रभु के संग है रहना, उनके जैसा है बनना, ज्ञान रत्नों से है सजना, गुणों की खान है बनना। उनसे बातें करने की, मुलाकातें करने की, तमन्नाएं थीं जो दिल में, अब सब हुई हैं पूरी। यही बहार है दुनिया को भूल जाने की, प्रभु से मधुर-मधुर मिलन मनाने की। अजनबी सी है ये दुनिया, पराए से हैं लोग, चेहरे से लगते हैं अपने, पर दिल में भरी है खोट। ऐसी स्वार्थी दुनिया से युक्ति मिली है दूर रहने की, बस प्रभु के संग है रहना, नहीं ज़रूरत है और किसी की। यही बहार है दुनिया को भूल जाने की, प्रभु से मधुर-मधुर मिलन मनाने की। जीवन में अंधकार था, ज्ञान का अभाव था, भटकता चहुं ओर, पाने को प्रकाश था। मन में थी खोज सत्य को पाने की, अब तो घड़ी है ज्ञान मुरली गुनगुनाने की। यही बहार है दुनिया को भूल जाने की, प्रभु से मधुर-मधुर मिलन मनाने की। तन का भान मिटा, मन का अभिमान छंटा, स्मृति को स्वमान मिला, अज्ञान अंधकार हटा। यही तो ऋतु है आत्मा के जागरण की, दिल में सदा बसी सूरत प्रभु की। यही बहार है दुनिया को भूल जाने की, प्रभु से मधुर-मधुर मिलन मनाने की।