

यथार्थ याद का अर्थ है—बाप के सच्चे स्वरूप को पहचानकर, अटल निश्चय के आधार पर उनसे जुड़ना। जब यह निश्चय पक्का होता है कि, परमात्मा हमारा पिता है—सर्वशक्तिमान, जानी -जाननहार है, तो याद स्थिर और शक्तिशाली बन जाती है। पहले ज्ञान का विस्तार कम था, लेकिन निश्चय का बल इतना था कि याद और भावनाएँ ऊँची रहती थीं। बाबा का साधारण रूप भी याद को सहज बनाए रखता था। यथार्थ याद का आधार है—निश्चय, धैर्य, गंभीरता और समझ। “मैं आत्मा हूँ, सर्वशक्तिमान की संतान हूँ”—इस स्मृति में रहकर, देह से न्यारे होकर कर्म करना ही सच्ची याद है। आत्मा-आत्मा भाई-भाई का भाव इस स्थिति को मजबूत बनाता है। निराकार बाप हमें सरल और स्पष्ट ज्ञान देते हैं, जिससे हमारी बुद्धि दिव्य बनती है। दिव्य बुद्धि के लिए धैर्यता और गंभीरता आवश्यक है। याद में बैठने से अवस्था अटल और अचल हो जाती है, इसलिए बाबा कहते हैं—आत्म-अभिमानी और देही-अभिमानी बनो, यही अंत समय में काम आएगा। पवित्रता के बल और बाप पर अटल विश्वास से यह रूहानी यात्रा सहज बनती है। चलते-फिरते, उठते-बैठते भी बुद्धि-योग बना रह सकता है। मन में सच्ची लगन हो—हमें परमात्मा मिला है। यह सृष्टि-परिवर्तन का समय है, इसलिए स्वयं को बदलना आवश्यक है। बाप के साथ बुद्धि की लगन बढ़ाते हुए, अनादि, आदि, और फरिश्ता स्वरूप का अभ्यास करना चाहिए। स्मृति में रहने से आत्मा को शक्ति, खुशी और आत्मविश्वास मिलता है। वर्तमान परिस्थितियों से ऊपर उठकर, अपने सत्य स्वरूप में स्थित रहना ही सच्चा पुरुषार्थ है। बाबा सहज विधियाँ बताते हैं—अमृतवेला, योग, निरंतर आत्मा अभिमानी रहने का अभ्यास और अटेंशन। जो शक्तियाँ मिली हैं, उन्हें कर्म में लाना है। स्व-परिवर्तन से ही विश्व-परिवर्तन होता है। बाबा सर्वशक्तिमान हैं—प्रेम, ज्ञान, सुख और शांति के सागर हैं—और हम उनके बच्चे भी उसी स्वरूप के हैं। यह ईश्वरीय ज्ञान हमें जीवन का पूरा पाठ समझाता है।