
मन्सा सेवा करने के लिए एकाग्रता के अभ्यास द्वारा सर्व शक्तियों का स्टॉक जमा करो
मधुबन में सभी आते ही हैं अपने को ज्ञान रत्नों से भरपूर | करने और शक्तियों द्वारा शक्ति स्वरूप बनने क्योंकि हम सबको बाबा ने विश्व-कल्याणकारी बनाया है। तो विश्व का कल्याण करना है और विश्व में जो भी आत्मायें हैं उन्हों को अभी चाहिए क्या? उन्हों की आवश्यकता क्या है? किसी से भी पूछो तो हर मनुष्य आत्मा की चाहना यही है कि हमें शक्ति मिले, खुशी मिले, शान्ति और सुख मिले। तो हम विश्व-कल्याणकारी आत्मायें, जिन्हें बाबा ने निमित्त बनाया है, उन्हों को सभी की जो आवश्यकयता है उसे पूर्ण करना है। तो सबकी जो चाहनायें, आवश्यकतायें हैं, उसको पूर्ण करने के लिये पहले अपने आपसे पूछें कि दुनिया को जो चाहिए, क्या वो सब प्राप्तियां बाबा द्वारा हमें हुई हैं? हमारे पास शान्ति, सुख, शक्तियों, गुणों का इतना स्टॉक है जो हम किसको दे सकें क्योंकि दे वही सकता है जिसके पास स्टॉक इकट्ठा होगा। तो अपने आपको चेक करें, कि सर्वशक्तिवान बाबा के समान मास्टर सर्वशक्तिवान बने हैं? अगर नहीं हैं, जिस भी शक्ति की थोड़ी भी कमी हो तो यहाँ से भरकर जाना। नहीं तो माया को पता पड़ जाता है कि यह शक्ति इसके पास कम है फिर वहाँ से ही चमाट लगाती है। जैसे वह मल्लयुद्ध करते हैं, तो उन्हों को पता पड़ जाता है कि इसकी यहाँ कमजोरी है तो वहाँ से ही उसको हार दिला देते हैं। तो माया को भी पता पड़ जाता है कि इसमें सहनशक्ति की कमी है। भले समाने, सामना करने वा निर्णय करने की शक्ति हो लेकिन सहन शक्ति कम हो। तो माया वही रूप धारण करके आपके पास आयेगी। और जिन आत्माओं को सहनशक्ति चाहिए उनको आप अगर निर्णय शक्ति भी दे दो तो वो खुश होंगे क्या? अभी किसको पानी की प्यास है और आप उसको 36 प्रकार के भोजन दे दो तो क्या वह व्यंजन अच्छे लगेंगे! वह कहेगा पहले एक बूंद पानी तो दे दो फिर मैं देखूँगा। तो जिसको सहनशक्ति चाहिए उसको और कोई शक्ति आप देंगे भी तो भी वह कहेगा कि मेरी तृप्ति नहीं हुई। जो मुझे प्राप्ति चाहिए वह आपने नहीं दी, इसलिए बाबा हमको टाइटल देता है मास्टर सर्वशक्तिवान। सर्व शब्द है शक्तिवान नहीं है। सर्वशक्तिवान का अर्थ ही है सर्व शक्तियाँ हों।
तो मन्सा सेवा बहुत बड़ी सेवा है और बड़ी सूक्ष्म सेवा है। पहले हमारे मन में सब शक्तियाँ हों! हमारे मन में अगर कोई भी शक्ति कम है तो हम दूसरों की मन्सा सेवा क्या कर सकेंगे और मन्सा सेवा तब हो सकती है जब पहले हमारे मन में एकाग्रता हो। हम जब चाहे जैसे चाहे जितना समय चाहें उतना मन को जहाँ टिकाना चाहे, वहाँ टिका लें। ऐसे नहीं कि हम कहें हे मन अव्यक्त फरिश्ते रूप में स्थित हो जाओ और वह कहाँ कहाँ भागदौड कर रहा हो, यदि हमारा मन ही हमारे कन्ट्रोल में नही होगा तो मन से सेवा कैसे कर सकते हैं। तो चेक करो पहले एकाग्रता की शक्ति हमारे मन में है? जो बाबा कहता है कि मन्सा सेवा के लिए एक तो स्टॉक चाहिए सर्व शक्तियों का और दूसरा स्टॉप करने की शक्ति चाहिए। अगर हम मन को ऑर्डर करते हैं क्योंकि मन मेरा है, मैं मन की मालिक हूँ तो मालिक जैसे सेवाधारी को ऑर्डर करता है, लेकिन अगर वह नहीं माने तो वह सेवाधारी क्या हुआ! अगर मन को मैं ऑर्डर करती हूँ बस इस समय तुमको फरिश्ते रूप में स्थित होना है और फरिश्ते के बजाए संसार की बातों में वह घूमने चला जाए तो क्या होगा, मन्सा सेवा हम कर सकेंगे? तो हमारे मन में पहले कन्ट्रोलिग पॉवर है, हम मेरा मन कहते हैं लेकिन मेरे को मेरा बनाया है या मेरे के फेरे में ही रहते हैं? कभी कहाँ, कभी कहाँ फेरा लगाते, फेरे में हैं। अगर मेरा मन है तो एक सेकण्ड में बाबा कहते हैं बिन्दी लगाओ। तो क्या हम एक सेकण्ड में बिन्दी लगा सकते हैं कि लगाते हैं बिन्दी और बन जाता है क्वेश्चन मार्क? कई भाई बहनें ऐसे कहते हैं, हम सोचते हैं बस, बिन्दी लगा दें लेकिन फिर भी क्यों, क्या, कैसे, कौन... यह कै कै आ जाती है। तो जब मेरे मन के ऊपर मेरा कन्ट्रोल नहीं है, मैं मन की मालिक पूरी नहीं बनी हूँ, अपने मन को वश करने की मैं खुद ही सेवा नहीं कर सकती हूँ, तो मन्सा सेवा दूसरों की कैसे करेंगे? तो मन्सा सेवा के लिये पहले अपनी स्टेज तैयार करनी पडे कि कन्ट्रोलिग पॉवर कहाँ तक है? अगर आपके गाड़ी की ब्रेक ठीक नहीं होगी तो मानो मैं यहाँ ब्रेक लगाने चाहती हूँ और यहाँ के बजाए यहाँ ब्रेक लगे, तो इतने देरी में तो एक्सीडेन्ट हो ही जायेगा। तो जो हम चाहते हैं वह तो नहीं होगा ना। स्टॉप कहा तो स्टॉप हो जाना चाहिए तब हम मन्सा सेवा कर सकते हैं।
और दूसरी बात है कि एक तो अपने मन की कन्ट्रोलिंग पॉवर चाहिए और दूसरा हमें मन में सर्व शक्तियों का स्टॉक चाहिए और तीसरा जब हम सम्बन्ध सम्पर्क में आते हैं तो वैसे तो अपनी रीति से रहते हैं, ठीक हैं लेकिन हम लोगों का परिवार है, हमारा संन्यास मार्ग नहीं है, हमारा यह परिवार कितना बड़ा है। दुनिया वालों को हमारे घर-बार, धन्धा-धोरी छोड़ने का ही डर लगता है लेकिन हम कहते हैं हमारे इतने घर हैं जो हमको अपने साथ कहाँ भी जाते हैं तो एड्रेस की कॉपी रखनी पड़ती है। कितने घर हैं, पता है आपको। लाखों के अंदाज में हैं, जो भी बाबा के घर सो हमारे घर हैं इसलिए हम फलक से कहते हैं, लाखों की अन्दाज में हमारे घर हैं। सारे विश्व में है कोई ऐसा, जिसका लाखों की अन्दाज में परिवार हो? कोई तो ढूँढके दिखाओ, इतना हमारा बड़ा परिवार है। तो हमने परिवार छोड़ा या परिवार मिला? फारेन में भी हमारे बाबा का घर सो हमारा घर है। तो हमारा परिवार होने के कारण हमको सम्बन्ध-सम्पर्क में, सेवा के सम्बन्ध में भी आना पड़ता है और मन्सा सेवा के लिए हमारे पहले मन में हर आत्मा के प्रति शुभ भावना शुभ कामना जरुर होनी चाहिए। इमर्ज रूप में, मर्ज में नहीं। एक होता है शुभभावना रखनी है, नहीं। प्रैक्टिकल रूप में इमर्ज रूप में दिखाई दे। जब कोई अशुभ भावना वाला हमारे सामने आता है तो मैने ट्रायल किया, उसके प्रति भी हमारी शुभ भावना है। शुभ के साथ शुभ रहना यह तो कॉमन बात है, वह तो स्वतः ही वैसे रहेंगे लेकिन कोई अशुभ भावना वाला आपके सामने आवे और आप उसके प्रति शुभ भावना रखें तब कहेंगे शुभ भावना की मन्सा है। तो वह चेकिग चाहिए और शुभ भावना तब आ सकती है जब आपको उसके आत्मिक स्वरूप के तरफ ही दृष्टि जावे। अगर आप देह भान से उसको देखेंगे तो कभी शुभ भावना नहीं आ सकती है। उसकी कमियां आपके लिस्ट में आ जायेंगी, वह कमियां भी बड़े रूप में दिखाई देंगी। तो मन्सा सेवा के लिये पहले हम अपने आपको चेक करें कि हमारी शुभ भावना और शुभकामना है?
अच्छा, कोई ने हमारी इनसल्ट कर दी, गाली दे दी या जो मैं नहीं चाहती हूँ वह मेरा पूरा नहीं किया, यह संगठन में तो हो ही जाता है। और उसके प्रति मेरे को बाबा कहता है शुभ भावना रखो। शुभ भावना आयेगी? लेकिन शुभ भावना तब आ सकती है जब आपको यह स्मृति हो कि इस समय यह आत्मा किसी भी कमजोरी के परवश है। मानो आप पर कोई क्रोध कर रहा है, आप कहेंगे समझता क्या है अपने आपको, इतना क्रोध क्यों करता है! मैं भी तो ब्रह्माकुमार हूँ, यह फिर क्या बड़ा ब्रह्माकुमार है क्या ! यह क्यों क्रोध करता है लेकिन वह बिचारा तो परवश है, क्रोध के वश है और आप उस फीलिंग में आ गये तो आप भी फेल हो गये ना! उसको क्रोध आया आपको फीलिंग आ गयी या उसको क्रोध आया आपको अभिमान आया, यह क्या समझते हैं, कौन हैं यह? इस प्रकार आपमें अभिमान आ गया। तो कोई मुरली ऐसी आयी है जिसमें क्रोध खराब है लेकिन फीलिंग भले करो उसकी छुट्टी है, ऐसी कोई मुरली है? तो फीलिंग भी तो खराब बात है ना। और फीलिग तो सचमुच ऐसी चीज़ है, जैसे कि फ्लू की बीमारी। उसमें क्या होता है कि सारा बदन टूटता है, मुख कडुआ हो जाता है, कुछ अच्छा नहीं लगता है, न सोना अच्छा लगेगा, न बैठना अच्छा लगेगा। ऐसे ही जब कोई भी बात की फीलिंग आती है तो उस समय मन को चैन नहीं होता है। मन चक्कर लगाता रहता है। इसलिए अगर मेरे मन में पहले शुभभावना, शुभ कामना है ही नहीं तो मैं मन्सा सेवा कैसे कर सकूँगी। क्यों? सभी तो एक जैसे हमको मिलने ही नहीं हैं। हम झाड़ दिखाते हैं झाड़ में सिर्फ तना हो तो क्या आपको बढ़िया लगेगा? जिस झाड़ में विस्तार बहुत होगा, पत्ते बहुत होंगे, फूल होंगे और शाखायें होंगे, वह झाड़ अच्छा लगेगा या सिर्फ एक ही सीधा तना वाला अच्छा लगेगा? तो यह भी वैराइटी वृक्ष है, चाहे ब्राह्मणों के संसार में, चाहे लौकिक परिवार में, चाहे विश्व की आत्माओं में भी... कई भाई बहनें ज्ञान में आने के बाद ऐसे सोचते हैं कि दैवी परिवार में भी ऐसे होता है क्या? देखने में आ रहा है फिर भी कहते हैं ऐसा होता है क्या? हमने तो समझा ही नहीं ऐसा भी होता है। अरे समझा या नहीं समझा लेकिन प्रैक्टिकल तो देख रहे हो ना। बाबा हमेशा कहता है कि यहाँ सिर्फ धर्म स्थापन नहीं हो रहा है। धर्म के साथ राज्य भी स्थापन हो रहा है। तो राजधानी में सब प्रकार के चाहिए ना! तो जरुर उनकी अवस्था में कोई अन्तर होगा, कोई दासी बनेगा, कोई राजा बनेगा। अगर सभी राजा बनें तो पानी का ग्लास कौन देगा! नम्बरवार तो होंगे ही, राजधानी स्थापन हो रही है इसमें यह क्वेश्चन नहीं उठ सकता है कि यहाँ भी ऐसे होता है क्या! क्या बोला, क्वेश्चन आया और गये। हमको बाबा ने त्रिकालदर्शी बना दिया है, आप त्रिकालदर्शी स्टेज पर स्थित हो जाओ, आपका कोई क्वेश्चन नहीं उठेगा। सब उत्तर मिल जायेगा। क्वेश्चन मार्क देखो कितना टेड़ा बांका होता है और बिन्दी कितनी सहज होती है। तो बिन्दी लगाना सहज है या क्वेश्चन मार्क लगाना सहज है? (बिन्दी) लेकिन क्वेश्चन ज्यादा लगाते हैं। ऐसे क्यों किया, क्यों कहा यह क्यों क्या की क्यू लग जाती है। बाबा ने तो बता दिया है कि यह क्यों शब्द जो है उसके पीछे व्यर्थ संकल्पों की क्यू लगती है। व्यर्थ संकल्पों का दरवाजा यही है। कभी भी आपके पास कोई भी व्यर्थ संकल्प की लाइन लगी हो तो उसे चेक करो, जो बीत चुका है उसको भी याद करके देखो, चेक करो पहला क्वेश्चन क्यों होगा। तो यह मन्सा सेवा तो बहुत बड़ी बात है, पहले अपनी मन्सा को ठीक करो। हमारे मन में शुभ भावना शुभ कामना है, हम दूसरों को दोष ज्यादा देते हैं और दूसरों की कमी बहुत जल्दी देखने में आती है। बाबा ने हंसी में सुनाया था कि ब्राह्मणों की नज़दीक की आंख कमजोर है लेकिन दूर की आँख बड़ी तेज है। दूसरे की कमी को देखने के लिये दूर की आँख है। अपनी कमी को देखने के लिये नज़दीक की आँख है, वह कमजोर है।
अपना जज भले बनो लेकिन दूसरे का जज बाबा ने बनाया ही नहीं है। जब हम अपना दोष नहीं देखते हैं दूसरों का देखते हैं तो वही विघ्न रूप बनता है। मैं नहीं दुःख देता हूँ, वह मेरे को दुःख देता है। लेकिन दुःख देने और लेने वाला एक होता है या देने वाला एक होता है, लेने वाला दूसरा होता है। उसने आपको दुःख दिया, लेने वाला कौन? तो लेने वाले हम हैं तो लेते क्यों हैं? जब आपको अच्छी बात नहीं लगती, आप कहते हो कि देखो यह दुःख देता है, तो दुःख अच्छा नहीं है तब तो आप कहते हो दुःख देता है। दुःख देना नहीं चाहिए तो आपने लिया क्यों? अगर बुरी चीज़ है तो आप लो नहीं। ले लेते हो माना अन्दर धारण कर लेते हो, उसकी बातें फील कर लेते हो और फिर कहते हो मैं तो ठीक हूँ, यह बहुत दुःख देता है। अरे! सब हिसाब-किताब हमारे यहाँ ही चुक्तू होने हैं! 63 जन्मों में कितनों से आपने हिसाब-किताब बनाया होगा तो वही ब्राह्मण बनकर आपके सेवाकेन्द्र, पेपर हॉल में आये हुए हैं। जहाँ आप सेन्टर पर जाते हो, वही आपका पेपर हॉल है। उसी सेन्टर के ही आपके हिसाब-किताब चुक्तू करने वाले होंगे। तो हिसाब खुशी-खुशी से चुक्तू करो, बनाया है तो चुक्तू भी करो। धर्मराजपुरी से बचना है तो यहाँ ही चुक्तू कर लो। अगर धर्मराजपुरी में जाना है फिर तो भले जो भी करो, वहाँ सज़ा खाके चुक्तू करना लेकिन हमको धर्मराजपुरी में नहीं जाना है तो यहाँ ही चुक्तू करो। चाहे शरीर द्वारा, चाहे मन द्वारा, चाहे सम्बन्ध द्वारा, सबके द्वारा हमारे जो रहे हुए हिसाब-किताब हैं, वह चुक्तू होने ही हैं। इसीलिए खुशी-खुशी से समझदार, त्रिकालदर्शी बनके, साक्षी दृष्टा हो करके पार्ट बजाओ। जो साक्षी दृष्टा होकर पार्ट बजाता है, चाहे खराब हिसाब है, चाहे अच्छा हिसाब है। खराब को भी हम समझ से चुक्तू करें, शुभ भावना शुभ कामना रखना माना समझ से अपना हिसाब चुक्तू किया। अगर समझ से नहीं करते हैं तो हिसाब चुक्तू करते-करते और भी बनता जाता है, जमा होता है, बोझ चढ़ता जाता है। इसीलिए बाबा कहते हैं त्रिकालदर्शी बन करके हर बात को देखो। अच्छा।
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