संस्कृत
... स्वयं ही अपनी कमजोरियों में गिरते रहते वे विश्व परिवर्तक कैसे बनेंगे। तो अपने बन्धनों की सूची सामने रखो। सूक्ष्म-स्थूल सबको अच्छी रीति चैक करो ... (अव्यक्त मुरली - 26 April 1977)
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