

यज्ञ इतिहास – (चैप्टर 6) दादी मनोहर इंद्र जी की ज़ुबानी बाबा की पहचान और हमारा स्वरूप बाबा ने हमारे आदि-अनादि स्वरूप की पहचान कराई, सृष्टि चक्र में हमारा पार्ट बताया। अपनी और हमारी पहचान समझाई — “मैं तुम्हारा अनादि अविनाशी बाप हूं, जैसा बाप वैसे बच्चे।” भक्ति में जिसे दूर समझते थे, अब ठिकाना मिला — निराकार, अशरीरी, सुखधाम का निवासी। पतित से पावन की यात्रा बाबा ब्रह्मा तन में आकर रूहानी दृष्टि से जगाने आए। हमें पतित से पावन बनाने, अंतिम जन्म में कैसा बनना है — यह सिखाने और ब्रह्मा बाबा को फॉलो कराने आए। योग और स्मृति का महत्व बापदादा को याद करना ही योग है — निर्विकारी, निराकारी, निरहंकारी बनना। आत्मा, परमात्मा और परमधाम का ज्ञान देकर आत्म-निश्चय की ज्योति जगाने का अभ्यास करवाया। राजयोग और सहज योग की शिक्षा राजयोग का राज बताया — क्या सुनना, देखना, बोलना है, यह समझाया। सहज योग का अर्थ बताया और स्मृतियां देकर सब कुछ सहज कर दिया। श्रेष्ठ कर्म करने और कर्मयोगी बनने की शिक्षा दी। धारणा और श्रीमत पर चलना भोग लगाकर शुद्ध अन्न खाना, कुसंग और सिनेमा से बचना, श्रीमत पर चलना। सच्चा बच्चा बनने के लिए सगे-लगे का भेद बताया, क्षत्रिय का धनुष बाण छोड़ बाबा का सच्चा बच्चा बनो। निडर और अटल स्थिति अखंड, अटल योगी वही जो गलत काम न करे और धर्मराज से न डरे। स्मृति रहे कि हम ईश्वरीय संतान और गॉडली स्टूडेंट हैं — बाबा सदा देख रहे हैं। न्यारेपन और निराकारी स्थिति बाबा पवित्र दृष्टि से साकाश, शिक्षा देते हैं, खामियां निकलवाते हैं, निराकारी स्थिति की ड्रिल करवाते हैं। लक्ष्य स्पष्ट रहे — कैसा बनना है और कोई भूल न हो। बेहद की सेवा और कल्याण परमात्म-निश्चय में बंधे रहना, विश्व कल्याण में साथी बनना। गंगा समान ज्ञान गंगा बनकर पतितों को पावन बनाना, वाणी से ज्ञान-घृत डालना। आंतरिक सफाई और नशा “मैं बाबा की, बाबा मेरा” का धागा बांधना, लौकिक मेरेपन का कचरा निकालना, मन का झाड़ू रोज़ लगाना। विकारों से दूर रहना और सदा नशा रहे कि मैं बाबा की बच्ची हूं। सेवा, स्मृति और योगमूर्ति जीवन कुमारका दादी, जानकी दादी जैसे निमित्त बनकर सेवा में लगे रहना — थकान के बिना। स्मृति स्वरूप कर्म करना, बुराई करने वाले का भी भला सोचना, कांटे हटाकर फूलों के संस्कार जगाना, विस्मृति को स्मृति में बदलना।