

मुख्य बिंदु - बाबा सैंपल बने: त्याग, तपस्या, सेवा करके सभी बच्चों को अपने समान बनाएं। - दिव्य दृष्टि व निश्चय बुद्धि: बाबा को जो दिव्य दृष्टि और दिव्य बुद्धि का वरदान मिला, उससे अनेक माताएं, बहनें और भाई तुरंत निश्चयबुद्धि बन गए और पवित्रता की धारणा पक्की हो गई। वह प्रैक्टिकल में भी साकार रूप में उतर आई। - हंगामों से पार: पवित्रता की धारणा के कारण जो हंगामे ईश्वरीय विश्वविद्यालय और ब्रह्मा बाबा के सामने हुए, वे एक वर्ष के भीतर ही ज्ञान, योग और पवित्रता के बल से शांत हो गए। बाबा ने कराची जाने का निर्णय लिया क्योंकि हैदराबाद में अनेक विघ्न आए। कराची में बाबा के कई सिकीलधे बच्चे थे, जिन्होंने बाबा को आमंत्रित किया — "आप यहां आकर ज्ञान-योग की पढ़ाई पढ़ाओ, बाकी प्रबंध हम करेंगे।" - कराची आगमन (1938): कराची में आकर शिवबाबा ने ब्रह्मा के पहले जन्म, कृष्ण के बारे में पूरा राज़ बताया। ब्रह्मा को 'प्रजापिता ब्रह्मा' नाम भी यहीं मिला। वे जगत के कल्याण के निमित्त हैं। उनके और बच्चों के सभी जन्मों का ज्ञान शिवबाबा को ही है। सतयुग, त्रेता, द्वापर, कलियुग का राज़ और गोले का चित्र समझाया गया। - समर्पण और चार बंगले का जीवन: समर्पण मुख्यतः कराची में ही हुआ, क्योंकि हैदराबाद में हंगामे थे। चार बंगले: एक छोटे बच्चों के लिए एक मम्मा के साथ रहनेवाली कन्याओं के लिए एक बड़े बच्चों व शिक्षकों के लिए एक बाबा के साथ रहनेवाले भाईयों एवं परिवार के लिए सप्ताह में 2–3 बार बाबा कुंज बंगले में मुरली सुनाने आते थे। कभी बाबा भवन में मुरली चलती थी। मुरली सुनने के बाद पुनरावृत्ति का अभ्यास होता था। सभी का भोजन एक स्थान पर बनता था, जिसे लेकर अपने-अपने बंगलों में ले जाया जाता था। - योग का अभ्यास: मम्मा के साथ रहते हुए गहन योग अभ्यास होता था — कई बार रात 2 से 5, 12 से 5, या 3 से 5 बजे तक। 2–3 बहनें चारों ओर पहरा देती थीं। पाकिस्तान में 3 वर्षों तक बहुत शांत और शक्तिशाली वातावरण बना रहा। बाबा बार-बार कहते थे — "अगर देह-अभिमान में आओगे तो माया वार करेगी।" - अनुशासन और धारणा: मम्मा-बाबा सिखाते थे — रोना नहीं, ग्लानि नहीं, सेवा में श्रेष्ठता, मुरली के बिंदु लिखना, गुणों पर दृष्टि रखना, श्रीमत पर चलना। रात को मम्मा कचहरी लगाती थीं, बच्चों से दिन भर का हाल पूछती थीं। किसी ने भूल की हो, तो प्रेमपूर्वक स्वीकार करने की शिक्षा दी जाती थी — "सच्चे दिल पर साहेब राज़ी।" - लेखन अभ्यास: बाबा सप्ताह में 2–3 बार टॉपिक देते थे: जैसे गीता का भगवान कौन है — सभी बच्चे अपनी कॉपियाँ लेकर मंथन करते थे। जो अच्छा लिखते थे, उन्हें बाबा के घर भोजन का अवसर मिलता था। छोटे-छोटे ग्रुप बनाकर टीचर की तरह सेवा का अभ्यास करवाया जाता था। - व्यावहारिक शुद्धता व दिनचर्या: - चलना, बोलना, सोना — सब फरिश्ता भाव में। नींद भी योगयुक्त हो — रात्रि में बाबा को गुड नाइट कहकर सोते थे। भोजन बाबा की याद में धीरे-धीरे और शांति से करना। सफ़ाई, पुराना कपड़ा पहनना, वेस्ट न करना, समय का पालन, दूसरों को डिस्टर्ब न करना — ये सूक्ष्म बातें सिखाई जाती थीं। जो गलती करता, उसे भी सिखाया जाता — "जिसने रोया उसने खोया।"