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081 Yog Ki Gaherai
Spiritual Classes

081 Yog Ki Gaherai

Dadi Gulzar Ji
Yog
38:58337
081 Yog Ki Gaherai
Spiritual Classes
081 Yog Ki Gaherai
Dadi Gulzar Ji
Yog
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Essence

याद के अभ्यास में भिन्न-भिन्न अनुभव होते हैं। यही याद हमें परिवर्तन करती है। लौकिक अनुभव तो सबको है, लेकिन अब अलौकिक अनुभव करना है। इसके लिए बाबा ने सहज बताया है कि याद हमें बाप को ही करना है, क्योंकि बच्चे की सर्व प्राप्तियाँ बाप से ही होती हैं।

बाबा कौन है – यह सब बच्चे जानते तो है। बाबा कहते हैं – पहले जानो, फिर मानो और फिर उसी नशे में चलो। इसी में सभी नम्बरवार हो जाते हैं।

63 जन्मों की विस्मृति के संस्कार पक्के होने के कारण, बाबा को जानते-मानते तो हैं लेकिन बार-बार भूल जाते हैं। विस्मृति के संस्कारों को मिटाने के लिए स्मृति स्वरूप को इमर्ज करो।

जितना बाबा में निश्चय होगा, उतना नशा होगा। निश्चय का प्रत्यक्ष स्वरूप आत्मा के निजी गुणों को स्वरूप में लाने से प्रकट होता है।

हमारी कथनी और करनी एक होनी चाहिए।

सारे दिन में हमे अपने अनादि स्वरूप का अनुभव करना है। निजी स्वरूप और "मेरा बाबा कौन है", यही चिंतन करना है। जिससे हमें प्राप्तियाँ होती हैं, उसे याद करना नहीं पड़ता। याद भुलाना मुश्किल होता है।

मुरली बाबा का याद-पत्र है। ऐसा प्यारा बाबा कभी मिल नहीं सकता। बाबा अपनी ड्यूटी कभी नहीं छोड़ते—बच्चों को मुरली सुनाते ही हैं, चाहे बच्चे पढ़ें या न पढ़ें। ऐसा प्यार सिर्फ बाबा ही कर सकते हैं।

जब से हम ब्राह्मण बने हैं, बाबा ने हमें ज्ञान, आनंद, सुख और शांति की जायदाद दे दी है। यह बाबा का प्यार ही है जो रोज हमें "मीठे बच्चे", "सिकीलधे बच्चे" कहकर पुकारते हैं।

दिमाग से बाबा को जानने में कोई विशेष प्राप्ति नहीं होती, लेकिन अगर दिल से अनुभव करते हैं तो फिर भूलते नहीं। ऐसे बच्चों की दिल की बात बाबा जान भी लेते हैं और उन्हें उत्तर भी देते हैं। उनकी शुभ चाहना भी बाबा पूरी करते है।

सच्चे दिल पर साहिब राज़ी होता है—दिल स्वच्छ होना चाहिए। बाबा जैसे हैं, जो हैं—उन्हें वैसे ही याद करना है।

बाबा को अलग अलग संबंधों से याद करो। "बाबा" शब्द को भूलना नहीं चाहिए।
जहाँ बाप है, वहाँ पाप नहीं हो सकता। और जहाँ पाप है, वहाँ बाप नहीं होता। बाबा सागर हैं, जिसमें हमें समा जाना है।

हमारा ब्राह्मण परिवार रमणीक है। यहाँ बाबा भी हैं और बच्चे भी। निराकार बाबा सभी संबंध निभाते हैं।

सहजयोगी बनना है तो अपने निजी स्वरूप को इमर्ज करो।

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