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085 Avyakt Sthiti Kaise Banaye
Spiritual Classes

085 Avyakt Sthiti Kaise Banaye

Dadi Gulzar Ji
Avyakt Maas
44:13300
085 Avyakt Sthiti Kaise Banaye
Spiritual Classes
085 Avyakt Sthiti Kaise Banaye
Dadi Gulzar Ji
Avyakt Maas
44:13300 plays

Essence

बाबा हमारे साथ हैं, हमारे साथी हैं और वही हमें साथ ले जाएंगे। बाबा निराकार हैं और बापदादा अव्यक्त फरिश्ता हैं, इसलिए बाबा के साथ चलने के लिए हमें भी बाप समान अव्यक्त फरिश्ता बनना है।

अमृतवेला में सभी ने अव्यक्त स्थिति का अनुभव किया होगा — मन का मौन और मुख का मौन। अव्यक्त का अर्थ है व्यक्त भाव से परे रहना। शरीर में रहते हुए, चलते-फिरते भी शरीर का भान, अभिमान, मन और बुद्धि अपनी ओर खींच न सकें — यही अव्यक्त स्थिति है।

हम शरीर में पार्ट बजाते हैं, लेकिन कर्मेंद्रियाँ हमें आकर्षित न करें। यदि कर्मेंद्रियों में हलचल हुई तो स्थिति नीचे आ जाएगी और मन-बुद्धि उसी ओर झुक जाएगी। फिर बार-बार व्यक्त भाव में आकर संघर्ष करना पड़ेगा। जहाँ युद्ध है, वहाँ योग नहीं। योग का अर्थ है बाबा की याद में रहना, बाबा के प्यार में लीन रहना।

जब हम बाबा के रूह-रिहान, याद, प्यार और मिलन में मग्न रहते हैं, तो बाहर की हलचल हमें प्रभावित नहीं करती। यह भाग्य बाबा ने हमें दिया है। कोई आए या जाए — देखना हमारी ज़िम्मेदारी नहीं; मन का हलचल में आना एकाग्रता की कमी है।

अंत में एक सेकंड का ही पेपर होगा — नष्टोमोहा स्मृति स्वरूप और शिव बाबा की याद। पास वही होंगे जिनका मन अभी से एकाग्र है। बाबा मददगार हैं, लेकिन मदद उसी को मिलती है जो हिम्मत करता है। सफलता की चाबी है — एकाग्रता।

बाबा ने पाँच बार ट्रैफिक कंट्रोल की श्रीमत दी है। अमृतवेला, मुरली और पूरे दिन की श्रीमत को सही रूप से फॉलो करने से मन स्वतः एकाग्र हो जाता है। अमृतवेला जैसा होगा, पूरे दिन का प्रभाव वैसा ही पड़ेगा।

मुरली में यह अनुभव करो कि बाबा मुझसे पर्सनल बात कर रहे हैं, मैं ही अर्जुन हूँ। परमधाम और सतयुग के वर्णन को अनुभव करो — मुरली के बाद आत्मा फ्रेश हो जाती है। परमात्मा के साथ रहने से माया दूर भाग जाती है।

कर्म तो करना ही है, लेकिन हम कर्मयोगी हैं। कर्म करते हुए स्मृति रहे — मैं आत्मा करावनहार हूँ, इन कर्मेंद्रियों द्वारा कर्म करा रही हूँ। आत्मा का संसार तो शिव बाबा ही है। आत्मा-परमात्मा का कनेक्शन ही फाउंडेशन है।

क्रोध या अशांति में किया गया कर्म अलग फल देता है और शांत, योगयुक्त स्थिति में किया गया कर्म अलग। अभ्यास करो कि आत्मिक स्थिति में रहकर कर्म हो। नहीं तो व्यर्थ के महीन धागे अव्यक्त बनने नहीं देंगे।

श्रीमत पर चलना ही कायदा है — जितना कायदा, उतना फायदा। कर्म के वश नहीं, अपने वश में रहकर कर्म करना — यही अव्यक्त भाव है। योग ठीक होगा तो शक्ति, टचिंग और यथार्थता आएगी।

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