

“बनी बनाई... बन रही है…” समय की घंटी बज रही है, भाग्य की घड़ी बीत रही है, संगम की वेला ढल रही है, पुरुषार्थ की अग्नि जल रही है… बनी बनाई… बन रही है… ये संसार की लीला चल रही है… न मानो सुनी-सुनाई बातों को, ना करो निंदा, दो सम्मान सब को, न समझो दोषी किसी को, सुनो बस एक भगवान को। बनी बनाई… बन रही है… ये भाग्य की धारा बह रही है… दुःख–सुख का ये अनुपम नज़ारा, खेल है ये कितना प्यारा। हर पात्र है यहाँ कलाकार, निभा रहा है अपना किरदार। बनी बनाई… बन रही है… ये कथा अनादी चल रही है… रचता को है ये नाटक पसंद, तुम्हें भी न हो कोई दृश्य नापसंद, स्थिति हो एकरस और इरादे बुलंद, हर्षित सदा और रोना बंद। बनी बनाई… बन रही है… ये समय की नदी बह रही है… हार–जीत का सुंदर नाटक, सुन समय की अब आहट, बढ़ आगे बिना रुकावट, बीते कल में जियोगे कब तक? बनी बनाई… बन रही है… ये ड्रामा की भावी बन रही है… जो हुआ वो होना ही था वैसे, छोड़ो अब ये क्यों, क्या और कैसे; हर दृश्य को देखो साक्षी जैसे, अवस्था बने मीठी—मधु जैसे। हर आत्मा फरिश्ता बन रही है… बनी बनाई… बन रही है…