हे महावीर अब जागो,
आलस्य की निद्रा को त्यागो,
तमस की रात्रि से अब जागो।
रूहें कलप रही हैं,
दुख-दर्द से तड़प रही हैं,
दर-दर भटक-भटक कर नाउम्मीद हो गई हैं,
दिलशिकस्त होकर हिम्मतहीन हो गई हैं।
हे मंदिर के चैतन्य बुत कहलाने वाले,
क्या बुत की तरह दिल रखते हो?
दर्द भरी आहें नहीं सुनते हो,
दुख भरी चीखें नहीं सुनते हो।
हे महावीर अब जागो,
आलस्य की निद्रा को त्यागो,
तमस की रात्रि से अब जागो।
हे कल्पवृक्ष के पूर्वजों,
कुछ तो रहम करो,
हे दयालु, कृपालु कहलाने वाले,
कुछ तो दया करो।
रोग-शोक पीड़ाओं से जन्म-जन्म के दुखियारे हैं,
इस भीड़ भरी दुनिया में कोई दिखते नहीं सहारे हैं।
बेसहारों को सहारा दे दो,
बेचारों को किनारा दे दो।
हे महावीर अब जागो…
तमस की रात्रि से अब जागो…
