जब जब पाप बढ़ा धरती पर
हुइ धरम की ग्लानि भारी
जब जब पाप बढ़ा धरती पर
हुइ धरम की ग्लानि भारी
तब तब आए भारत में
तब तब आए भारत में
हे परमपिता शिव स्वस्ति तुम्हारी
जब जब पाप बढ़ा धरती पर
हुइ धरम की ग्लानि भारी
हो बिजरूप मानव सृष्टिके ज्योतिबिंदु तुम अविनाशी
सुक्ष्म से सुक्ष्म अणु सम हो करुणा सम हो सुखराशी
किया सदा कल्याण जगतका शिव सुखकारी नाम तुम्हारा
चेतन बीज रूप हो जगके नाम रूप से हो सबसे न्यारा
ज्ञान ज्योति आनंद शांति के एक तुम्ही सच्चे भंडारी
जब जब पाप बढ़ा धरती पर
हुइ धरम की ग्लानि भारी
तब तब आए भारत में
हे परमपिता शिव स्वस्ति तुम्हारी
जब जब पाप बढ़ा धरती पर
हुइ धरम की ग्लानि भारी
किम कर्तव्य विमुख जब मानव अंधकार में थे भरमाए
तुमने गीता ज्ञान सुनाकर हे शिव श्रेष्ठ कर्म सिखलाए
विष विकारको पी जब मानव पतित बना अचेत हो गया
पतितो को पावन करने तब तुमने ज्ञानामृत बरसाया
हे दुख हरता हे सुखकर्ता
तुम जग के सच्चे हितकारी
जब जब पाप बढ़ा धरती पर
हुइ धरम की ग्लानि भारी
तब तब आए भारत में है
परमपिता शिव स्वस्ति तुम्हारी
जब जब पाप बढ़ा धरती पर
हुइ धरम की ग्लानि भारी
झुलस गई सृष्टि जब फैली काम क्रोधके विषकी ज्वाला
पांच विकारोंकी सृष्टिसे हे शिव तुमने विष पी डाला
दानव सम मानव जीवन को तुमने देवतुल्य बनाया
स्वर्ग लोक में परिवर्तन की नर्क लोग की तुमने काया
मुक्ति जीवनमुक्ति दाता कर्म तुम्हारे सब सुखकारी
जब जब पाप बढ़ा धरती पर
हुइ धरम की ग्लानि भारी
तब तब आए भारत में
तब तब आए भारत में है
परमपिता शिव स्वसती तुम्हारी
जब जब पाप बढ़ा धरती पर
हुइ धरम की ग्लानि भारी
जब जब पाप बढ़ा धरती पर
हुइ धरम की ग्लानि भारी
हुइ धरम की ग्लानि भारी
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