"प्रभु पिता के प्यार में दादी मां के दुलार में
संत जन सादर पधारे श्रद्धा और सत्कार में
श्रद्धा और सत्कार में
प्रकाश स्तम्भ बन प्रकाश देना जिनका काम
प्रकाश स्तम्भ बन प्रकाश देना जिनका काम
दादी प्रकाशमणिजी उस नक्षत्र का है नाम
परम पुनीत उस प्रकाश पुंज को प्रणाम
परम पुनीत उस प्रकाश पुंज को प्रणाम
दादी प्रकाशमणिजी उस विभूति का है नाम
प्रकाश स्तम्भ बन प्रकाश
धर्म ग्लानि का समय प्रभु लिए अवतार
ब्रम्हा के मानवीय तन में शिव हुए साकार
शिव शक्तियो के द्वारा शिव की सृष्टि हो ललाम
शिव शक्तियो के द्वारा शिव की सृष्टि हो ललाम
दादी प्रकाशमणिजी उस विभूति का है नाम
प्रकाश स्तम्भ बन प्रकाश
होवनहार बिलुवाके चिकने होते पाव
पूर्ण चरित्रार्थ वो थी दादी की ही बात
सत्य स्नेह सुचिता के शिखर को है सलाम
सत्य स्नेह सुचिता के शिखर को है सलाम
दादी प्रकाशमणिजी उस विभूति का है नाम
प्रकाश स्तम्भ बन प्रकाश
ओम मंडली में आप आई जिस घड़ी
पिताश्री की वो प्रथम दृष्टि ही पड़ी
बड़ी दादी वो बन गई बाबा की बाहें थाम
बड़ी दादी वो बन गई बाबा की बाहें थाम
दादी प्रकाशमणिजी उस विभूति का है नाम
प्रकाश स्तम्भ बन प्रकाश
नन्हे पौधो को बनाया वृक्ष एक विशाल
नजतोसे निहाल किया कर्मो से कमाल
तप त्याग और सेवा का सुखद मिला परिणाम
तप त्याग और सेवा का सुखद मिला परिणाम
दादी प्रकाशमणिजी उस विभूति का है नाम
प्रकाश स्तम्भ बन प्रकाश
संसार की सेवा में सब तो स्वाहा कर दिया
साए में लेके ममता के सुखो से भर दिया
है चारो धाम गा रहे गुण गान आठो याम
है चारो धाम गा रहे गुण गान है आठो याम
दादी प्रकाशमणिजी उस विभूति का है नाम
परम पुनीत उस प्रकाश पुंज को प्रणाम
परम पुनीत उस प्रकाश पुंज को प्रणाम
दादी प्रकाशमणिजी उस विभूति का है नाम
प्रकाश स्तम्भ बन प्रकाश
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