
सुन ओ राही, थकना मना है, मार्ग कठिन है, रुकना मना है। चलते रहना — तेरी यात्रा में विश्राम मना है.... आंधी चले तो डरना मना है, तूफ़ान उठे तो भी झुकना मना है। धूप जले, तब डगमगाना मना है, काँटे चुभें तो सहमना मना है। संकट की तपीश में पिघलना मना है, आशा के फूलों को मुरझाना मना है। हवाएँ कहें — “ ठहरना मना है,” धरती कहे — “ भटकना मना है।” बादल कहें — “ बिखरना मना है,” सूरज पुकारे — “अब बुझना मना है।” चलते रहना — तेरी राह में आराम मना है.... समय के प्रवाह में बहकना मना है, संसार के जाल में रमना मना है। दुनियावी उत्सवों को मनाना मना है, यथार्थ को भूल जाना मना है। मायावी सुखों में चिपकना मना है, झूठे इंद्रजाल में फसना मना है। तू है ज्वाला — मिटना मना है, तू है हवा — थमना मना है, तू है लहर — पलटना मना है, तू है दिशा — मुड़ना मना है। चलते रहना — तेरे पथ में विराम मना है.... कलियुगी काई में फिसलना मना है, मोह की डालियों में लिपटना मना है। वायदे से मुकर जाना मना है, भगवान की नज़र से छिपना मना है। देह के दर्पण में खोना मना है, अहंकार की सीढ़ी पर चढ़ना मना है। सुन ओ राही, सिहरना मना है, जीवन है संग्राम — काँपना मना है। चलते रहना — तेरे मार्ग में ठहराव मना है.... इस वनवाह में सँवरना मना है, शोक वाटिका में सजना मना है। अर्श से फर्श पर उतरना मना है, स्वमान के तख़्त से गिरना मना है। राही है तू — किसी नगर में बसना मना है, एकला चालो रे, साथी बनाना मना है। तू तो शिवसंगी, खुदा दोस्त बना है, माटी के रिश्तों में उलझना मना है। रूठना मना है, अब रोना मना है, आँसू नहीं — अब अग्निअस्त्र बन बरसना है। सुन ओ राही, थकना मना है, मार्ग कठिन है, रुकना मना है। चलते रहना — तेरे जीवन में अवकाश मना है....