उठो हे बागी, जाग उठो,
हाथ में मशाल ले, विजय का शंखनाद कर।
शक्ति भर भुजाओं में, तूफ़ान के हाथ बाँध चल।
तू वो नहीं जो झुक गया, आँधियों के आने से;
खामोश हो मुड़ चली, तुमसे जो टकराने से।
लगा छलांग आसमान में, खुद को तू आज़ाद कर।
उठो हे बागी, जाग उठो...
हाथ में मशाल ले, विजय का शंखनाद कर।
तोड़ फेंक बेड़ियाँ जो पैरों में पड़ी हुई,
तोड़ दे कुरीतियाँ समाज की गढ़ी हुई।
खुद को ऊँचा तू उठा, आसमान झुक जाएगा;
भेड़ियों के झुंड पर आज तू ललकार कर।
उठो हे बागी, जाग उठो...
हाथ में मशाल ले, विजय का शंखनाद कर।
तू जो आगे न बढ़ा,
कारवाँ रुक जाएगा।
उम्मीदों के जो रास्तों का सिलसिला थम जाएगा।
दे के ज्योति हर हृदय में, जीत का पैग़ाम कर।
उठो हे बागी, जाग उठो...
हाथ में मशाल ले, विजय का शंखनाद कर।
