जाग उठो ओ वीरों,
अब न झुको, न रुको।
क्रांति का बिगुल बजा है,
मुक्ति का द्वार खुला है!
निर्भय हो...निडर हो तुम
निर्भय हो...निडर हो तुम
निर्भय हो...निडर हो तुम
उत्सव हैं क्रांति का
पर्व हैं संघर्ष का
गीत है विद्रोह का
संगीत है विप्लव का
बाहर नहीं कोई शत्रु
चिरशत्रु भीतर हैं विराजित
वासनामयी चेतना
प्रदुष्ट विवेक
क्षीनकाय आत्मबल
बोझिल स्मृति
वेला आयी नवजागरण की
मोहनिद्रा से पुनर्जागरण की
खिंची हैं तलवारें
सज उठा है लश्कर
रणचण्डी रक्त की प्यासी खड़ी
मुक्ति मुक्ति पुकारती खड़ी
विजयी हो तुम वीर हो
निरामय हो तुम निर्विकार हो !
निर्भय हो...निडर हो तुम
निर्भय हो...निडर हो तुम
निर्भय हो...निडर हो तुम
