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"ये हमारा स्वरूप है पांचों स्वरूप बनाना है संपन्न हमको याद करके उनके रूप शांति की शांति है प्रकाश पुंज का ये भंडार हम आत्माएं यही पे रहते यही हमारा है संसार मोर मुकुटधारी है वैकुंठ वासी है हम ताज तख्त तिलक दे देवकुल के है हम दिव्य नयन पावन मूरत मंदिरों का ये अनोखा रूप जगको शीतल छाया देते कितना विचित्र ये स्वरूप तन मन और सांस संकल्प पवित्रता से महक रहा पाकर ये ब्राम्हण जीवन खुशियोंसे दिल हरश रहा प्यारे प्यारे रूप निराले हम फरिश्ते वतन के बाबा के संग उड़ते रहते उस रूहानी चमन में ये हमारा स्वरूप है पांचों स्वरूप बनाना है संपन्न हमको याद करके उनके रूप ________________________________"