संस्कृत
... इस भाग्य को मैंपन में सीमित रखेंगे तो बढ़ेगा नहीं। सदा त्याग के भाग्य के फल को औरों को भी सहयोगी बनाए बांटके आगे बढ़ो ... (अव्यक्त मुरली - 30 March 1985)
सीमाओं से बंधा हुआ
Confine
పరిమితము