देखें अपने स्वरूप को भृकुटी के मध्य में... मैं एक चमकती हुई मणि हूँ। भृकुटी की कुटिया में विराजमान मैं बहुत तेजस्वी हूँ, Source Of Energy हूँ। मुझसे चारों ओर रंग-बिरंगी दिव्य किरणें फैल रही हैं।
मैं आत्मा, निराकार हूँ। कुछ क्षणों के लिए उस दिव्य अनुभूति में आ जाएँ, जैसे शरीर है ही नहीं। शरीर लोप हो गया है, केवल मैं, निराकार, चमकती हुई आत्मा शेष हूँ।
चिंतन करें। मैंने अनेक शरीर लिए और छोड़े हैं। कभी मैं देव रूप में थी। अब इस शरीर में हूं। Exercise करें। आत्मा एक शरीर में आ गई। उसे छोड़ दूसरे में आ गई। उसे छोड़ तीसरे में आ गई। इस तरह देह लेते छोड़ते मैं अब अंत में आ गई हूं। अब पार्ट पूरा हो रहा है। मुझे घर वापिस चलना है। मैं इतनी भाग्यवान हूं कि स्वयं भगवान मुझे ले जाने के लिए आ गए हैं।
मैं कितनी भाग्यवान हूँ कि स्वयं भगवान मुझे अपने साथ ले जाने के लिए आ गए हैं।
ओम् शान्ति।
