अपने सामने अपना देव स्वरूप देखें। सतयुग के प्रथम जन्म के उस महान, दिव्य स्वरूप को अपने सामने साकार अनुभव करें। वह संपूर्ण पवित्र, सर्वगुणों से सम्पन्न और दिव्य आभा से प्रकाशित है। उसके चारों ओर अत्यंत शक्तिशाली प्रकाशमय आभामंडल फैला हुआ है।Source Of Energy हूँ। मुझसे चारों ओर रंग-बिरंगी दिव्य किरणें फैल रही हैं।
अब उस दिव्य स्वरूप को देखते हुए संकल्प करें—यह मैं हूँ। मेरे वास्तविक संस्कार यही हैं। वर्तमान के जो नकारात्मक संस्कार दिखाई देते हैं, वे माया की देन हैं; वे मेरे वास्तविक संस्कार नहीं हैं। मैं उन्हें पूरे दिल से अस्वीकार करता हूँ। काम का संस्कार मेरा नहीं है। क्रोध का संस्कार भी मेरा नहीं है। मेरे वास्तविक संस्कार तो अत्यंत दिव्य, पवित्र और श्रेष्ठ हैं।
मेरे सामने मेरा देव स्वरूप खड़ा है, जो मेरे श्रेष्ठ संस्कारों का साकार स्वरूप है। अब सच्चे दिल से पाँच बार यह संकल्प करें, जिसे प्रतिदिन प्रातःकाल इक्कीस बार दोहराना है। "तुम पवित्रता की शक्ति से भरपूर हो। युग परिवर्तन के महान कार्य में मैंने तुम्हें अपना साथी बनाया है। तुम बहुत जिम्मेदार और महान आत्मा हो। मैंने तुम्हें अपनी दिव्य शक्तियाँ प्रदान की हैं। तुम वही हो, जिनकी स्मृति में आज भी मंदिरों में पूजा होती है। तुम्हारे प्रत्येक शुभ संकल्प, शुभ भावना और दुआ का प्रभाव संसार की प्रत्येक आत्मा तक पहुँचता है।"
मैं आत्मा हूँ। स्वयं को आत्मा के रूप में देखें और संकल्प करें—"मैं क्रोध से मुक्त हूँ। मैं शांत हूँ।" इसे पूरे विश्वास और अनुभव के साथ पाँच बार दोहराएँ।
मैं क्रोध से मुक्त हूँ। मैं शांत हूँ।मैं एक पूर्वज आत्मा हूँ। मेरे माध्यम से फैलती हुई ये दिव्य शक्तियाँ समस्त आत्माओं की पालना, सहयोग और कल्याण का माध्यम बन रही हैं।
मैं क्रोध से मुक्त हूँ। मैं शांत हूँ।
मैं क्रोध से मुक्त हूँ। मैं शांत हूँ।
मैं क्रोध से मुक्त हूँ। मैं शांत हूँ।
मैं क्रोध से मुक्त हूँ। मैं शांत हूँ।
कुछ क्षण इस दिव्य चिंतन में स्थित रहें।
ओम् शान्ति।
