मैं देवकुल की परम पवित्र आत्मा हूँ। इसी दिव्य नशे और आत्म-स्मृति में स्वयं को स्थित करें। अब किसी भी प्रकार की कमजोरी का प्रभाव मुझ पर नहीं है। मैं अपने वास्तविक स्वरूप में स्थित हूँ।
अब अपने सामने अपने देव स्वरूप को स्पष्ट देखें। यह दिव्य, पवित्र और निर्विकारी स्वरूप ही मेरा वास्तविक स्वरूप है। पूरे सच्चे दिल से संकल्प करें—"यह मैं हूँ। यह मेरा ही वास्तविक स्वरूप है। मैं ऐसा ही था और पुनः ऐसा ही बनूँगा।"मैं उन्हें पूरी तरह स्वीकार कर रहा हूँ।
अब अपनी दृष्टि ऊपर ज्ञान-सूर्य की ओर ले जाएँ। वे पवित्रता के सागर हैं। उनसे निकलती हुई सुनहरी, पवित्र किरणें निरंतर मुझ पर बरस रही हैं। अनुभव करें कि ये दिव्य किरणें मेरे भीतर समाती जा रही हैं।
ऐसा अनुभव करें कि ऊपर से पवित्रता की मधुर वर्षा हो रही है। पवित्र Vibrations मेरे संपूर्ण अस्तित्व में समा रहे हैं। मैं भीतर से पूर्णतः पवित्र, शांत और शक्तिशाली बनता जा रहा हूँ।
ओम् शान्ति।
