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"प्रकाश ज्ञान का ज्योति है मणि सी प्रकाश ज्ञान का ज्योति है मणि सी मां जैसी वो सुखदाई हाए शिव की गोद समाई हाए शिव की गोद समाई मम्मा बाबा का संगम थी मधु और वन का संगम थी वो मम्मा बाबा का संगम थी मधु और वन का संगम थी वो संगम की वो अनुपम थी उसने ये ज्योति जगाई हाए उसने ये ज्योति जगाई ममता मूरत वो दादी प्यारी शिव की गोद समाई हाए शिव की गोद समाई उस शिव से तुम नित करती थी अंतर्मन की मीठी बातें उस शिव से तुम नित्य करती थी अंतर्मन की मीठी बातें आरती जिसकी हम सब गाते उसने ही राह दिखाई हाए उसने ही राह दिखाई फूलों से सज कर बाबा से मिलकर शिव की गोद समाई हाए शिव की गोद समाई योग ज्ञान का दिव्य वरण थी पावनता का उदाहरण थी योग ज्ञान का दिव्य वरण थी पावनता का उदाहरण थी ब्रह्मावात्सो की पथ दर्शक थी उसकी ये महिमा गाई हाए उसकी ये महिमा गाई ममता मूरत वो दादी प्यारी शिव की गोद समाई हाए शिव की गोद समाई देश ,धर्म और जाति रंगों का बंधन दादी तुमने तोड़ा देश ,धर्म और जाति रंगों का बंधन दादी तुमने तोड़ा हर मानव को मानवता और परम पिता से जोड़ा हाए परम पिता से जोड़ा श्रद्धा से तुमको देते विदाई शिव की गोद समाई हाए शिव की गोद समाई"