"तपते मन को मेरे आत्म तृप्ती मिली
बुझ रहे दीप को जैसे दीप्ती मिली
तपते मन को मेरे आत्म तृप्ती मिली
बुझ रहे दीप को जैसे दीप्ती मिली
जब पडी आपकी दृष्टी हमपर प्रभु
जब पडी आपकी दृष्टी हमपर प्रभु
जैसे जीवन मिला ज्योती जगती मिली
जैसे जीवन मिला ज्योती जगती मिली
जैसे जीवन मिला ज्योती जगती मिली
तपते मन को मेरे
रात अंधियारी थी राह भटकन भरी
नन्ही सी नाव थी वो भी टूटी हुई
पार करना आगम को सुगम था नाही
पतवार मेरी मुझसे छूटी हुई
पार सागर हुये
पार सागर हुये
पार सागर हुये
पार सागर हुये ऐसी शक्ती मिली
बुझ रहे दीप को जैसे दीप्ती मिली
तपते मन को मेरे
तप का फल है मिला प्रभु कृपा हो गई
छट गया अंधियारा नई सुबह हो गई
जन्मों के पुण्य मेरे आज उदय हो गए
जीवन की हर डगर उजियारी हो गई
ज्ञान चक्षु खुले दिव्य दृष्टि मिली
ज्ञान चक्षु खुले दिव्य दृष्टि मिली
बुझ रहे दीप को जैसे दीप्ती मिली
जब पडी आपकी दृष्टी हमपर प्रभु
जब पडी आपकी दृष्टी हमपर प्रभु
जैसे जीवन मिला ज्योती जगती मिली
जैसे जीवन मिला ज्योती जगती मिली
जैसे जीवन मिला ज्योती जगती मिली
तपते मन को मेरे आत्म तृप्ती मिली
बुझ रहे दीप को जैसे दीप्ती मिली
तपते मन को मेरे आत्म तृप्ती मिली
बुझ रहे दीप को जैसे दीप्ती मिली
तपते मन को मेरे आत्म तृप्ती मिली
बुझ रहे दीप को जैसे दीप्ती मिली
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