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3 Nov 2022
"सन्तुष्टमणि बन विश्व में सन्तुष्टता की लाइट फैलाओ , सन्तुष्ट रहो और सबको सन्तुष्ट करो"
3 November 2022 · हिंदी
03-11-2022 मधुबनअव्यक्त बापदादा ओम् शान्ति 03-11-2022
आज बापदादा अपने सदा सन्तुष्ट रहने वाले सन्तुष्ट मणियों को देख रहे हैं। एक-एक सन्तुष्टमणि की चमक से चारों ओर कितनी सुन्दर चमक, चमक रही है। हर एक सन्तुष्टमणि कितनी बाप की प्यारी, हर एक की प्यारी, अपनी भी प्यारी है। सन्तुष्टता सर्व को प्यारी है। सन्तुष्टता सदा सर्व प्राप्ति सम्पन्न है क्योंकि जहाँ सन्तुष्टता है वहाँ अप्राप्त कोई वस्तु नहीं। सन्तुष्ट आत्मा में सन्तुष्टता का नेचरल नेचर है। सन्तुष्टता की शक्ति स्वत: और सहज चारों ओर वायुमण्डल फैलाती है। उनका चेहरा, उनके नयन वायुमण्डल में भी सन्तुष्टता की लहर फैलाते हैं। जहाँ सन्तुष्टता है वहाँ और विशेषतायें स्वत: ही आ जाती हैं। सन्तुष्टता संगम पर विशेष बाप की देन है। सन्तुष्टता की स्थिति परस्थिति के ऊपर सदा विजयी है। परस्थिति बदलती रहती है लेकिन सन्तुष्टता की शक्ति सदा प्रगति को प्राप्त करती रहती है। कितनी भी परिस्थिति सामने आये लेकिन सन्तुष्टमणि के आगे हर समय माया और प्रकृति एक पपेटशो माफिक दिखाई देती है, इसलिए सन्तुष्ट आत्मा कभी परेशान नहीं होती। परिस्थिति का शो मनोरंजन अनुभव होता है। यह मनोरंजन अनुभव करने के लिए, अपने स्थिति की सीट सदा साक्षीदृष्टा की चाहिए। साक्षीदृष्टा स्थिति में स्थित रहने वाले यह मनोरंजन अनुभव करते हैं। दृश्य कितना भी बदलता है लेकिन साक्षी दृष्टा की सीट पर स्थित रहने वाली सन्तुष्ट आत्मा साक्षी हो, हर परिस्थिति को स्व स्थिति से बदल देती है। तो हर एक अपने को चेक करे कि मैं सदा सन्तुष्ट हूँ? सदा? सदा हैं वा कभी कभी हैं?
बापदादा हमेशा हर शक्ति के लिए, खुशी के लिए, डबल लाइट बन उड़ने के लिए यही बच्चों को कहते कि सदा शब्द सदा याद रहे। कभी-कभी शब्द ब्राह्मण जीवन के डिक्शनरी में है ही नहीं क्योंकि सन्तुष्टता का अर्थ ही है सर्व प्राप्ति। जहाँ सर्व प्राप्ति है वहाँ कभी-कभी शब्द है ही नहीं। तो सदा अनुभूति करने वाले हो वा पुरुषार्थ कर रहे हो? हर एक ने अपने आपसे पूछा, चेक किया? क्योंकि आप सभी विशेष बाप के स्नेही, सहयोगी, लाडले, मीठे मीठे स्व-परिवर्तक बच्चे हो। ऐसे हो ना? है ऐसे? जैसे बाप देख रहे हैं ऐसे ही अपने को अनुभव करते हो? हाथ उठाओ, जो सदा, कभी-कभी नहीं, सदा सन्तुष्ट रहते हैं। सदा शब्द याद है ना। हाथ थोड़ा धीरे धीरे उठा रहे हैं। अच्छा, बहुत अच्छा। थोड़े-थोड़े उठा रहे हैं और सोच-सोच के उठा रहे हैं। लेकिन बापदादा ने बार-बार अटेन्शन खिंचवाया है कि अब समय और स्वयं दोनों को देखो। समय की रफ्तार और स्वयं की रफ्तार दोनों को चेक करो। पास विद आनर तो होना ही है ना। हर एक सोचो कि मैं बाप की राजदुलारी या राजदुलारा हूँ। अपने को राजदुलारा समझते हो ना! रोज़ बापदादा आपको क्या याद प्यार देते हैं? लाडले बच्चे। तो लाडला कौन होता है? लाडला वही होता है जो फॉलो फादर करता है और फॉलो करना बहुत-बहुत-बहुत सहज है, कोई मुश्किल नहीं है। एक ही बात को फॉलो किया तो सहज सर्व बातों में फॉलो हो ही जायेगा। एक ही लाइन है जो बाप हर रोज़ याद दिलाते हैं। वह याद है ना? अपने को आत्मा समझ मुझ बाप को याद करो। एक ही लाइन है ना और याद करने वाली आत्मा जिसको बाप का खजाना मिल गया, वह सेवा के बिना रह ही नहीं सकता क्योंकि अथाह प्राप्ति है, अखुट खजाने हैं। दाता के बच्चे हैं, वह देने के बिना रह नहीं सकते।
बापदादा हर बच्चे को आज विशेष यही वरदान दे रहे हैं कि हे लाडले प्यारे बच्चे, सदा सन्तुष्टमणि बन विश्व में सन्तुष्टता की लाइट फैलाओ। सन्तुष्ट रहना और सन्तुष्ट करना। कई बच्चे कहते हैं सन्तुष्ट रहना तो सहज है लेकिन सन्तुष्ट करना यह थोड़ा मुश्किल लगता है। बापदादा जानते हैं अगर हर एक आत्मा को सन्तुष्ट करना है तो उसकी विधि बहुत सहज साधन है, अगर कोई आपसे असन्तुष्ट होता है या असन्तुष्ट रहता है तो वह भी असन्तुष्ट लेकिन आपको भी उसकी असन्तुष्टता का प्रभाव कुछ तो पड़ता है ना। व्यर्थ संकल्प तो चलता है ना। जो बापदादा ने शुभ भावना, शुभ कामना का मंत्र दिया है, अगर अपने आपको इस मंत्र में स्मृति स्वरूप रखो तो आपके व्यर्थ संकल्प नहीं चलेंगे। अपने को जानते हुए भी कि यह ऐसा है, यह वैसा है लेकिन अपने को सदा न्यारा, उसके वायब्रेशन से न्यारा और बाप का प्यारा अनुभव करो। तो आपके न्यारे और बाप के प्यारे पन की श्रेष्ठ स्थिति के वायब्रेशन अगर उस आत्मा को नहीं भी पहुंचे तो वायुमण्डल में फैलेगा जरूर। अगर कोई परिवर्तन नहीं होता और आपके अन्दर उस आत्मा का प्रभाव व्यर्थ संकल्प के रूप में पड़ता रहता है तो वायुमण्डल में सबके संकल्प फैलते हैं। इसलिए आप न्यारा बन बाप का प्यारा बन उस आत्मा के भी कल्याण के प्रति शुभ भावना, शुभ कामना रखो। कई बार बच्चे कहते हैं कि उसने गलती की ना, तो हमको भी फोर्स से कहना पड़ता है, थोड़ा अपना स्वभाव भी, मुख भी फोर्स वाला हो जाता है। तो उसने गलती की लेकिन आपने जो फोर्स दिखाया क्या वह गलती नहीं है? उसने और गलती की, आपने अपने मुख से जो फोर्स से बोला, जिसको क्रोध का अंश कहेंगे तो वह राइट है? क्या गलत, गलत को ठीक कर सकता है? आजकल के समय अनुसार अपने बोल को फोर्सफुल बनाना, यह भी विशेष अटेन्शन रखो क्योंकि जोर से बोलना या तंग होके बोलना, वह तो बदलता नहीं लेकिन यह भी दूसरे नम्बर के विकार का अंश है। कहा जाता है - मुख से बोल ऐसे निकले जैसे फूलों की वर्षा हो रही है। मीठे बोल, मुस्कराता चेहरा, मीठी वृत्ति, मीठी दृष्टि, मीठा सम्बन्ध-सम्पर्क यह भी सर्विस का साधन है। इसलिए रिजल्ट देखो अगर मानो कोई ने गलती की, गलत है और आपने समझाने के लक्ष्य से और कोई लक्ष्य नहीं है, लक्ष्य आपका बहुत अच्छा है कि इसको शिक्षा दे रहे हैं, समझा रहे हैं लेकिन रिजल्ट में क्या देखा गया है? वह बदलता है? और ही आगे के लिए, आगे आने से डरता है। तो जो लक्ष्य आपने रखा वह तो होता नहीं है इसलिए अपने मन्सा संकल्प और वाणी अर्थात् बोल और सम्बन्ध-सम्पर्क को सदा मीठा, मधुरता सम्पन्न अर्थात् महान बनाओ क्योंकि वर्तमान समय लोग प्रैक्टिकल लाइफ देखने चाहते हैं, अगर वाणी से सेवा करते हो तो वाणी की सेवा से प्रभावित हो नज़दीक तो आते हैं, यह तो फायदा है लेकिन प्रैक्टिकल मधुरता, महानता, श्रेष्ठ भावना, चलन और चेहरे को देख स्वयं भी परिवर्तन के लिए प्रेरणा ले लेते हैं और जैसे जैसे आगे समय की हालातें परिवर्तन होनी हैं तो ऐसे समय पर आप सबको चेहरे और चलन से ज्यादा सेवा करनी पड़ेगी। इसलिए अपने आपको चेक करो - सर्व आत्माओं के प्रति शुभ भावना, शुभ कामना की वृत्ति और दृष्टि के संस्कार नेचर और नेचरल हैं?
बापदादा हर एक बच्चे को विजयी माला का मणका देखने चाहते हैं। तो आप सभी भी अपने को समझते हो कि हम माला के मणके बनने ही वाले हैं। सिर्फ स्वयं को मन्सा-वाचा-कर्मणा और चलन चेहरे में विजयी बनाओ। पसन्द है, बनेंगे? विजयी माला में लाना बाप का काम है लेकिन आपका काम है विजयी बनना। सहज है ना कि मुश्किल है? मुश्किल लगता है? जिसको मुश्किल लगता है वह हाथ उठाओ। लगता है? थोड़े-थोड़े, कोई-कोई हैं। बापदादा कहता है - जब बापदादा कहते हो तो बाबा कहने से क्या बाप का वर्सा नहीं मिलेगा! जब सभी वर्से के अधिकारी हो और कितना सहज बाप ने वर्सा दिया, सेकण्ड की बात है, आपने माना, जाना मेरा बाबा और बाप ने क्या कहा? मेरा बच्चा। तो बच्चा तो स्वत: ही वर्से के अधिकारी है। बाबा कहते हो ना सभी एक ही शब्द बोलते हो मेरा बाबा। है ऐसे? मेरा बाबा है? इसमें हाथ उठाओ। मेरा बाबा है, तो मेरा वर्सा नहीं है? जब मेरा बाबा है तो मेरा वर्सा भी बंधा हुआ है और वर्सा क्या है? बाप समान बनना, विजयी बनना।
ब्रह्मा बाप को देखा, प्रैक्टिकल सबूत देखा कि हर कदम श्रीमत प्रमाण चलने से सम्पूर्ण फरिश्तेपन की मंजिल में पहुंच गया ना! अव्यक्त फरिश्ता बन गया ना। तो फालो फादर, हर एक श्रीमत, उठने से लेकर रात तक हर कदम की श्रीमत बापदादा ने बता दी है। उठो कैसे, चलो कैसे, कर्म कैसे करो, मन में संकल्प क्या-क्या करो और समय को कैसे श्रेष्ठ बिताओ। रात को सोने तक श्रीमत मिली हुई है। सोचने की भी जरूरत नहीं, यह करूं या नहीं करूं, फॉलो ब्रह्मा बाप। तो बापदादा का जिगरी प्यार है, बापदादा एक बच्चे को भी विजयी नहीं बनें, राजा नहीं बनें, यह नहीं देखने चाहते। हर एक बच्चा राजा बच्चा है। स्वराज्य अधिकारी है इसलिए अपना स्वराज्य भूल नहीं जाना। समझा।
बापदादा ने कई बार इशारा दिया है कि समय अचानक और नाज़ुक आ रहा है इसलिए एवररेडी, अशरीरीपन का अनुभव आवश्यक है। कितना भी बिजी हो लेकिन बिजी होते हुए भी एक सेकण्ड अशरीरी बनने का अभ्यास अभी से करके देखो। आप कहेंगे हम बहुत बिजी रहते हैं, अगर मानो कितने भी बिजी हो आपको प्यास लगती है, क्या करेंगे? पानी पियेंगे ना! क्योंकि समझते हो प्यास लगी है तो पानी पीना जरूरी है। ऐसे बीच-बीच में अशरीरी, आत्मिक स्थिति में स्थित रहने का अभ्यास भी जरूरी है क्योंकि आने वाले समय में चारों ओर की हलचल में अचल स्थिति की आवश्यकता है। तो अभी से बहुतकाल का अभ्यास नहीं करेंगे तो अति हलचल के समय अचल कैसे रहेंगे! सारे दिन में एक-दो मिनट निकालके भी चेक करो कि समय प्रमाण आत्मिक स्थिति द्वारा अशरीरी बन सकते हैं? चेक करो और चेंज करो। सिर्फ चेक नहीं करना, चेंज भी करो। तो बार-बार इस अभ्यास को चेक करने से, रिवाइज़ करने से नेचरल स्थिति बन जायेगी। बापदादा से स्नेह है, इसमें तो सभी हाथ उठाते हैं। हैं ना स्नेह! फुल स्नेह है, फुल या अधूरा? अधूरा तो नहीं है ना! स्नेह है तो वायदा क्या है? क्या वायदा किया है? साथ चलेंगे? अशरीरी बन साथ चलेंगे कि पीछे-पीछे आयेंगे? साथ चलेंगे? और थोड़ा टाइम वतन में साथ रहेंगे भी और फिर ब्रह्मा बाप के साथ फर्स्ट जन्म में आयेंगे। है यह वायदा? है ना! हाथ नहीं उठवाते हैं, ऐसे सिर हिलाओ। हाथ उठाते थक जायेंगे ना। जब साथ चलना ही है, पीछे नहीं रहना है तो बाप भी साथ किसको लेके जायेंगे? बाप, समान को साथ लेके जायेंगे। बाप को भी अकेला जाना पसन्द नहीं है, बच्चों के साथ जाना है। तो तैयारी है ना! स्नेह की निशानी है साथ चलना। अच्छा।
बापदादा हर एक बच्चे को दूर से भी नजदीक अनुभव कर रहा है। जब साइंस के साधन दूर को नजदीक कर सकते हैं, देख सकते हैं, बोल सकते है, तो बापदादा भी दूर बैठे हुए बच्चों को सबसे नजदीक देख रहे हैं। दूर नहीं हो, दिल में समाये हुए हो। तो बापदादा विशेष टर्न के अनुसार आये हुए बच्चों को अपने दिल में, नयनों में समाते हुए एक-एक को साथ चलने वाले, साथ रहने वाले, साथ राज्य करने वाले देख रहे हैं। तो आज से सारे दिन में बार-बार कौन सी ड्रिल करेंगे? अभी-अभी एक सेकण्ड में आत्म-अभिमानी, अपने शरीर को भी देखते हुए अशरीरी स्थिति में न्यारा और बाप का प्यारा अनुभव कर सकते हो ना! तो अभी एक सेकण्ड में अशरीरी भव! अच्छा। (बापदादा ने ड्रिल कराई) ऐसे ही बीच-बीच में सारे दिन में कैसे भी एक मिनट निकाल इस अभ्यास को पक्का करते चलो क्योंकि बापदादा जानते हैं आगे का समय अति हाहाकार का होगा। आप सबको सकाश देनी पड़ेगी और सकाश देने में ही आपका अपना तीव्र पुरुषार्थ हो जायेगा। थोड़े समय में सकाश द्वारा सर्व शक्तियां देनी पड़ेंगी और जो ऐसे नाज़ुक समय में सकाश देंगे, जितनों को देंगे, चाहे बहुतों को, चाहे थोड़ों को उतने ही द्वापर और कलियुग के भक्त उनके बनेंगे। तो संगम पर हर एक भक्त भी बना रहे हैं क्योंकि दिया हुआ सुख और शान्ति उनके दिल में समा जायेगा और भक्ति के रूप में आपको रिटर्न करेंगे। अच्छा।
चारों ओर के बापदादा के नयनों के नूर, विश्व के आधार और उद्धार करने वाली आत्मायें, मास्टर दु:ख हर्ता, सुख कर्ता, विश्व परिवर्तक बच्चों को बहुत-बहुत दिल का स्नेह, दिल का यादप्यार और पदम-पदम वरदान स्वीकार हो। अच्छा।
सेवा का टर्न इन्दौर ज़ोन का है :- यज्ञ सेवा का गोल्डन चांस मिलना यह बहुत बड़ा पुण्य जमा करने का है, हर कदम यज्ञ सेवा करना अर्थात् अपना पुण्य जमा करना। सेवा करना अर्थात् वरदान प्राप्त करना। तो सेवा में सफलतामूर्त हैं ना! कांध हिलाओ। टीचर्स, सफलतामूर्त हैं ना! कहो सफलता तो हमारा जन्म सिद्ध अधिकार है। बोलो। सफलता हमारे गले का हार है। अच्छा।