चल निडर हो, ओ अग्निवीर,
अग्निपथ ही तेरी तक़दीर।
हर श्वास में बस एक ही पुकार—
मैं अग्निवीर…मैं अग्निवीर…
अग्निपथ…अग्निपथ…
जलता रहे ये अंतर पथ…
हर सांस बने तप की लकीर,
मैं अग्निवीर… मैं अग्निवीर…
ना रुकना है, ना झुकना है,
बस आगे ही बढ़ना है…
सत्य-ज्योति का बनकर वीर,
मैं अग्निवीर… मैं अग्निवीर…
यह गुप्त साधना का है पथ,
हर श्वास यहाँ अग्नि की कसौटी।
कभी तपस्या, कभी संघर्ष,
तो कभी आत्मा की मौन ज्योति।
अग्निपथ पर कदम बढ़ाना है,
भय और मोह सब त्याग जाना है।
काँटे चुभें या आँधियाँ उठें,
सत की इस ज्योति को हर दिल में जगाना है।
अग्निपथ…अग्निपथ…
जलता रहे ये अंतर पथ…
हर सांस बने तप की लकीर,
मैं अग्निवीर… मैं अग्निवीर…
ना रुकना है, ना झुकना है,
बस आगे ही बढ़ना है…
सत्य-ज्योति का बनकर वीर,
मैं अग्निवीर… मैं अग्निवीर…
ये योग अग्नि नहीं केवल जलाती,
ये शुद्ध भी करती है हर कण-कण।
जो भीतर के अंधकार को मिटा दे,
है यहीं, अग्निपथ का अमर प्रण।
ये अग्नि करती वासनाओं को भस्म,
ये अग्नि करती अहंकार का अंत।
जो इस मार्ग पर चलता दृढ़ता से,
वो पा लेता परमात्मा का अंत।
अग्निपथ… अग्निपथ…
जलता रहे ये अंतर पथ…
हर सांस बने तप की लकीर,
मैं अग्निवीर… मैं अग्निवीर…
ना रुकना है, ना झुकना है,
बस आगे ही बढ़ना है…
सत्य-ज्योति का बनकर वीर
मैं अग्निवीर… मैं अग्निवीर…
अग्निपथ पर तू नहीं अकेला,
भगवान स्वयं संग-संग चलते।
हर आँसू को मोती बनाते,
हर पीड़ा को सहज ही हरते।
यह पथ कठिन है, पर है अमर,
यही मुक्ति का सच्चा द्वार।
अग्निपथ ही साधक की पहचान है,
यही तपस्वी जीवन का आधार।
अग्निपथ… अग्निपथ…
जलता रहे ये अंतर पथ…
हर सांस बने तप की लकीर,
मैं अग्निवीर… मैं अग्निवीर…
ना रुकना है, ना झुकना है,
बस आगे ही बढ़ना है…
सत्य-ज्योति का बनकर वीर
मैं अग्निवीर… मैं अग्निवीर…
चल निडर हो, ओ अग्निवीर,
अग्निपथ ही तेरी तक़दीर।
जहाँ अंत में न कोई दुख, न भय—
केवल परमात्मा का अमर आश्रय…
मैं अग्निवीर… मैं अग्निवीर…
