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10 Mar 1969
“अपने पुराने संस्कारों पर विन करने वाले ही नम्बरवन बन सकेंगे”
10 March 1969 · हिंदी
(कुमारियों के पहले ग्रुप की टीचर्स ट्रेनिंग में अव्यक्त बापदादा की मधुर शिक्षायें)
जो भी सब कुमारियाँ आई हुई हैं, उन सबके अन्दर लक्ष्य क्या है? क्या लक्ष्य रखकर आई हो? (कोई ने कहा भट्ठी का अनुभव करने) अनुभव करने का भी लक्ष्य क्या है? क्यों यह अनुभव करने चाहती हो? टीचर्स का लक्ष्य क्या है? भट्ठी में तो पकेंगी लेकिन भट्ठी में पक करके क्या बनना है! वह लक्ष्य तो क्लीयर जरूर होना चाहिए ना। क्या बनना है और कैसा बनना है! जैसे साकार रूप में मात पिता कर्म करके दिखलाने के एक एक्जाम्पुल बने हैं, इसी रीति एक शब्द में यही कहेंगे कि सम्पूर्ण और श्रेष्ठ टीचर कैसे होना चाहिए। न सिर्फ टीचर लेकिन जैसे तीन रूप हैं पिता, शिक्षक और गुरू। इस ही रीति से जगत माता और जगत के प्रति निमित्त टीचर, साथ-साथ सतगुरु। सतगुरू खुद नहीं बन सकते लेकिन सतगुरू के साथ पूरा सम्बन्ध जुटाने वाले। श्रीमत पर चलकर चलने वाली बनना है। यह मुख्य बातें हर टीचर में जब आ जाती हैं तो उस टीचर की रिजल्ट सर्वोत्तम निकलती है। टीचर बनना तो सहज है लेकिन टीचर पन की क्वालिफिकेशन में मुख्य सब संस्कार जो ज्ञान और योग के भरने हैं, वह बहुत जरूरी हैं। और जगत माता पन का, शक्ति पन का, दिव्य गुणधारी दैवी पन का और साथ-साथ योद्धे पन का यह सब संस्कार हरेक जब अपने में ठीक रीति भरेंगे तब दुनिया में नाम बाला होगा। ऐसा लक्ष्य रखा है? कन्या होते हुए भी जगत माता हैं। अगर कन्या समझेंगे तो फिर कुछ-कुछ बातों में सर्विस करते हुए अनासक्त रहेंगे। कन्यापन अर्थात् प्युरिटी। तो कुमारी पन भी पूरा रखना है लेकिन कुमारी पन के साथ-साथ बेहद जगत माता हूँ, यह भी समझना है। यह सब आत्मायें जो तरस रही हैं, दु:खी हो चिल्ला रही हैं उन्हों की ज्ञान और योग से पालना करनी है। जब ऐसी अपनी वृत्ति स्मृति और दृष्टि रखेंगे तब दृष्टि में रूहानियत होगी। जिस्मानी पन निकल जायेगा और रूहानी दृष्टि होती जायेगी। हरेक को यही लक्ष्य रखना है कि नम्बरवार होते भी नम्बर वन बनकर दिखाऊंगी लेकिन वन नम्बर कैसे बनेंगी? जब अपने सर्व पुराने संस्कारों के ऊपर विन करेंगी, वही वन बनेंगी। इतनी हिम्मत और हुल्लास हरेक को अपने में रखना है। और अगर इतनी कुमारियाँ सम्पूर्ण टीचर बनकर निकले फिर तो विनाश कितना जल्दी होगा? क्योंकि आप सम्पूर्ण बनेगी तो फिर सृष्टि भी सम्पूर्ण चाहिए। यह अपूर्ण सृष्टि जल्दी-जल्दी खत्म हो सम्पूर्ण सृष्टि आ जायेगी। फिर शक्तियों का नाम कोने-कोने में बाला होगा। सबको मुख्य यही सोचना चाहिए कि कब भी अपने अन्दर पुराने संस्कारों को प्रगट होने नहीं देना है। संकल्प से ही उनको खत्म करना है। अगर संकल्प आता भी है तो संकल्प को स्थान देकर उनकी पालना नहीं करना। संकल्प को संकल्प तक ही खत्म करना है। फिर आखरीन यह हो जायेगा - संकल्प में ही पुराने संस्कार इमर्ज नहीं होंगे।
एक दो के स्वभाव भिन्न-भिन्न तो होंगे ही लेकिन स्वभाव से बचने के लिए अपने में क्या धारणा करनी चाहिए? सरलता। जितनी सरल बुद्धि, सरल दृष्टि, सरल वाणी होगी उतना ही स्वभावों का टक्कर नहीं होगा।
कुमारियाँ भट्ठी नाम से घबराती तो नहीं हो? यह तो मीठी भट्ठी है, इसमें ही तो सोना बनना है। कोई भी मन में मुश्किलात महसूस हो तो मन की बातें मन में नहीं रखना। मन की बातें वाणी में भल लाना है, लेकिन कहाँ? स्थान देखकर लाना है। यह भी किचड़ा है ना। किचड़े को कहाँ डाला जाता है? जो स्थान मुकरर होता है। यहाँ वहाँ किचड़े को डाला तो फिर वह वायुमण्डल में फैल जायेगा। इसलिए कोई भी मन में ऐसा संकल्प आये जिसको व्यर्थ संकल्प, विकल्प कहें वह निमित्त बने हुए स्थान के सिवाए किसी से नहीं करना। नहीं तो वायुमण्डल को बिगाड़ने के निमित्त बनने से पुरुषार्थ में यह बाधा पड़ जाती है। इसलिए जैसा लक्ष्य रखा है तो कोई भी अपने सामने रूकावट डालने की बातें नहीं रखना। मिटाते हटाते चलते चलो। तब लक्ष्य को पा सकती हो। हर मुरली में लक्ष्य तो दिया ही है। क्या करना है, क्या देखना है, क्या सोचना है। जैसे डायरेक्शन है उस प्रमाण ही चलते चलना है।
घर में सिकीलधे होते हैं तो बाप उनको श्रृंगारते हैं ना। तो आप कुमारियाँ कौन सा श्रृंगार करेंगी? गहने पहने हुए हैं? हर वक्त अपने गहनों से सजी हुई रहना। उतारना नहीं। जो रॉयल फैमिली वाले होते हैं वह कब गहने उतारते नहीं हैं। जो गरीब होते हैं वह कब-कब पहनते हैं। आप सब तो किसके बच्चे हो? कौन से गहने पहने हुए हैं? तिलक कौन सा है? (राजतिलक) राजतिलक तो आपके सतयुगी माँ बाप देंगे। संगमयुग का नया तिलक कौन सा है? विजयी बनने की विक्टरी। आज विजयी रत्न बनने की निशानी तिलक रूप में कुमारियों को दे रहे हैं। अच्छा, चिन्दी पहनी है। कौन सी चिन्दी पहननी है? चिन्दी है - स्वदर्शन चक्र की। यह भी कब भूलना नहीं हैं। कुण्डल कौन से पहनेंगी? (शंख) शंखध्वनी होती रहती। अच्छा, कंगन कौन से पहनेगी? नियम रूपी कंगन बांधना हैं। लेकिन जितने जो नियम पालन करेंगे उतने कंगन पड़ेंगे। कोई दस-दस कंगन भी पहनते हैं, कोई एक भी पहनते हैं। ज्यादा कंगन जब होते हैं तब शोभनिक होती हैं। जितने नियमों की पालना करते हैं उतने ही कंगन पड़े हुए हैं। अच्छा, घुंघरू कौन से पहनेंगी? घुंघरू में आवाज होता हैं ना तो ज्ञान घुंघरू का आवाज सब सुनें। कृष्ण के लिए कहते हैं घुंघरू की आवाज से गोपिकायें आती थी। तुम्हारी ज्ञान घुंघरू की आवाज से कौन आयेंगे? आपके भक्त और प्रजा। जितना-जितना सुरीली आवाज होगा वैसे-वैसे आकर्षण होगी। यह सब गहनें हर वक्त पहने ही रहना है। कहाँ माया उतार न दे। उतारने वाले भी बड़े तेज हैं। प्यार-प्यार से उतार भी देते हैं। इसलिए कब उतारने नहीं देना।
कुमारियाँ हैं तो उम्मीदवार लेकिन कौन सी परसेन्टेज में उम्मींद पूरी करनी है वह मालूम पड़ जायेगा। हरेक को यही सोचना है कि हम कोई कमाल करके दिखाऊं। बापदादा की जो उम्मींद हैं वह उम्मींद का सितारा अपने मस्तक के बीच चमका के दिखाना है। कुमारियों का ग्रुप तो अच्छा है। टीचर भी अच्छी मिली है। जहाँ भी जिसका गुण देखो वह जल्दी से उठाना। क्योंकि हरेक में कोई न कोई विशेष गुण होता है। तो हरेक से गुण उठाते-उठाते सर्वगुण सम्पन्न बनना है। अगर अवगुण देखो तो पीठ कर लेना। खिलौना देखा है ना। सीता के सामने रावण करते हैं तो पीठ कर देती। राम सामने आता तो राम के सम्मुख हो जाती है। आप भी सीता तो हो ही। गुण देखो तो धारण करना। अवगुण को देखते हुए भी नहीं देखना। सुनते हुए नहीं सुनना। न सोचना। सुनना और देखना तो दूसरी स्टेज है। सभी कुमारियों को विक्टरी का टीका दिया और ऊपर में बिन्दी देते हुए मुख मीठा कराया? इस टीके को कायम रखने की हिम्मत हैं ना। आज जैसे मस्तक चमक रहे हैं ऐसे अविनाशी चमकते हैं। अच्छा! ओम् शान्ति।