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22 Jul 1969
“संस्कारों में निराधार रहते, नियमों में परिपक्व बनो”
22 July 1969 · हिंदी
सब खुशराजी हैं? खुश-खैराफत पूछने की आवश्यकता है? बापदादा तो समझते हैं - अब यह पूछने की आवश्यकता नहीं होनी चाहिए, क्योंकि सब बालिग बच्चे बन गये हैं। हर एक ने नर्क से स्वर्ग बनाने की जिम्मेवारी का ताज तो पहन ही लिया है। ताजधारी खुद औरों से खुश खैराफत पूछते हैं। सतयुग में आप जब राज़े बनेंगे तो अपनी प्रजा से खुश खैराफत पूछेंगे। तो वह संस्कार यहाँ ही भरने हैं ना। अभी जो संस्कार भरे जाते हैं वही फिर अनेक जन्म चलेंगे। उसमें मुख्य संस्कार है - जिसको कहा जाता है ‘निराधार'। निर-आधार का मतलब यह नही कि दैवी सम्बन्ध के नियमों का भी आधार नहीं लेना है। नियमों में पूरा ही परिपक्व रहना है। नियमों में भी पूरे रहें और निराधार भी पूरा रहें। ऐसी अवस्था कब और कहाँ देखी है? साकार रूप का सबूत सबने देखा। जितना ही नियमों में सम्पूर्ण उतना ही निराधार। निराधार होते हुए भी कोई भी बात को रखने लिए बच्चों की राय बिना नहीं करते थे। यह है नियमों का पालन कर सिखलाना। कई बच्चे निराधार तो हो जाते हैं लेकिन निराधार होते-होते कहाँ छोटे-छोटे नियमों से छूट जाते हैं। लेकिन दोनों ही बातें एक साथ चलना यह है ब्राह्मण कुल की मर्यादा के अन्दर रहना। ब्राह्मणों का मुख्य काम क्या होता है? दूसरे को भी बन्धन में बांधना। दूसरों को बांधना अर्थात् खुद भी उसमें बन्धे रहें। जितना ही मर्यादा में बन्धे हुए रहते उतना ही फिर न्यारे और प्यारे भी रहते। ब्राह्मण कुल की मर्यादाओं पर कहाँ तक चल रहे हैं - यह हर एक को देखना है। ब्राह्मणों की मुख्य मर्यादा कौन सी है? मर्यादा जो होती है उनके अन्दर रहना पड़ता है। तो श्रीमत पर चलना ही मुख्य मर्यादा पूर्ण रीति चल रही हैं? अगर कोई मर्यादा से छूट जाता है तो उनको कुल से निकाला जाता है। कलियुग में कुल से निकाल देते हैं। लेकिन यहाँ निकाला नहीं जाता है, यहाँ स्वयं ही निकल जाते हैं। तो इस मुख्य मर्यादा में कहाँ तक हम चल रहे हैं, उसकी भी पूरी जांच रखनी चाहिए। सारे दिन में जो भी कर्म होते हैं, उनकी चेकिंग होनी चाहिए। ब्राह्मण कुल की मर्यादा अनुसार हमारी मन्सा-वाचा-कर्मणा चली? अगर ब्राह्मण कुल की मर्यादा प्रमाण नहीं चलते तो जिस समय ऐसा कर्म होता है, उस समय जैसे कुल से बाहर निकल जाते हैं। ब्राह्मण पने का का नशा नहीं रहता है। विस्मृति हो जाती है। समझना चाहिए कि हम मर्यादा में रहेंगे तब औरों को मर्यादा सिखला सकेंगे? नामधारी जो ब्राह्मण हैं उनका यही कर्तव्य चलता है। जो भी कर्तव्य होता है उसकी मर्यादायें ब्राह्मण ही आकर सिखलाते हैं और कराते हैं। तुम ब्राह्मण अभी मर्यादाओं में चले हो तब यह यादगार अब तक चलता आ रहा है। जो खुद सीखे हुए होंगे वही औरों को सिखलायेंगे। श्रीमत है एक शब्द। लेकिन उनका रहस्य बहुत है। श्रीमत प्रमाण संकल्प उठें, श्रीमत ने यह भी बताया है संकल्प क्या करना है, देखना कैसे है, बोलना क्या है, कर्म किस स्थिति में स्थित होकर करना है, भोजन कैसे करना है, अगर सोना है तो भी कैसे? यह सब श्रीमत मिली हुई है। याद में रहकर सोना, अपना चार्ट देखकर सोना। यह भी श्रीमत की मर्यादा है। संकल्प तक मर्यादायें क्या हैं, सब पता है। उसमें सब आ जाता है। तो हर कर्म को चेक करो। वृत्ति, दृष्टि, स्मृति कैसे रहती है। हर बात मर्यादा के अन्दर होनी चाहिए। किन बातों से छूटना होता है, किन बातों में फिर बंधना भी होता है। यह थोड़े समय का मीठा बन्धन अनेक बन्धनों से मुक्त करने वाला है। अभी यह आधार न रखो कि कोई हमारा चार्ट देखकर रिजल्ट पूछेगा तब हम आगे बढ़ेंगे। नहीं। अब अपने आपको ही देखते आगे बढ़ते चलो। बापदादा का सहारा तो है ही लेकिन फिर भी छोटी-छोटी बातों में अपने आपको ही ध्यान रखना है। रोज का चार्ट अपना देख खुद ही चेकिंग कर आगे बढ़ना हैं। सब होवनहार राज्य सम्भालने वाले हो। तो जो औरों को सम्भालने वाला होता है वह अपने को नहीं सम्भाल सकेंगे? अगर अपना पोतामेल नहीं सम्भाल सकेंगे तो राजधानी कैसे सम्भालेंगे। अच्छा, कुमारियाँ सोच रही हैं, हमारी रिजल्ट कब निकलेगी? रिजल्ट निकालने योग्य हो? ऐसी रिजल्ट है जो आधे पास हों। कैसा भी कड़ा इम्तहान लेवें तो आधा अन्दाज पास हो जायेगी? इम्तहान भी बड़ा लेना है। यूँ इम्तहान का पेपर सुनाया नहीं जाता है लेकिन यहाँ सुना भी देते हैं। एक इम्तहान तो यह लेंगे कि 8 घण्टा याद में रह सकते हैं? वाचा का भी इम्तहान लेंगे। तीन मिनट में सारे ज्ञान की मुख्य प्वॉइन्ट्स कैसे स्पष्ट हो जाएं। तीन मिनट में सारे ज्ञान का सार ऐसा किसको समझाओ जो दूसरे दिन इच्छुक हो जरूर सुनने आये। कर्मणा का भी कड़ा इम्तहान लेंगे। फिर रिजल्ट निकालेंगे। न सिर्फ यहाँ तक लेकिन जहाँ भी जायेंगी वहाँ से एक मास की रिजल्ट का पता पड़ेगा। तब फाइनल मार्क्स मिलेगी। ऐसी तैयारी करनी है फिर देखेंगे रिजल्ट में कितने पास हुए। अच्छा!