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21 Jan 1971
“अव्यक्त वतन का अलौकिक निमंत्रण”
21 January 1971 · हिंदी
आज मिलने के लिए बुलाया है। यह अव्यक्त मिलन अव्यक्त स्थिति में स्थित होकर ही मना सकते हो। आज देख रहे हैं - कौन-कौन कितने शक्ति स्वरूप बने हैं? आप लोगों के चित्रों में नम्बरवार शक्तियों का यादगार दिखाया हुआ है। शक्तियों की परख किन चित्रों द्वारा कर सकते हैं, मालूम है? आपको अपने शक्तियों को परखने का चित्र मालूम नहीं है! भिन्न-भिन्न नम्बरवार शक्तियों का यादगार बना हुआ है। अपना चित्र भूल गये हो! शक्तियों के चित्रों में भिन्न-भिन्न रूप से और फिर भुजाओं के रूप में नम्बरवार शक्तियों का यादगार है। उन चित्रों में कहाँ कितनी भुजायें, कहाँ कितनी दिखाते हैं। कोई अष्ट शक्तियों को धारण करने वाली बनती हैं, कोई उससे अधिक, कोई उससे कम। कहाँ 4 भुजाएं, कहाँ 8 भुजाएं कहाँ 16 भी दिखाते हैं, नम्बरवार। तो आज देख रहे हैं - हरेक ने कितनी शक्तियों की धारणा की है। मास्टर सर्वशक्तिमान कहलाते हैं ना। मास्टर सर्वशक्तिमान अर्थात् सर्व शक्तियों को धारण करने वाले। अपने शक्ति-स्वरूप का साक्षात्कार होता है? अव्यक्त वतन में हरेक का शक्ति रूप देखते हैं तो क्या दिखाई देता होगा? वतन में भी बापदादा की अलौकिक प्रदर्शनी है। उनके चित्र कितने होंगे? आप के चित्र गिनती में आ सकते हैं लेकिन बापदादा के प्रदर्शनी के चित्र गिन सकते हो? बापदादा निमन्त्रण देते हैं। निमन्त्रण देने वाला तो निमन्त्रण देता है, आने वालों का काम है पहुँचना। बापदादा आप सभी से करोड़ गुणा ज्यादा खुशी से निमन्त्रण देते हैं। हरेक को अनुभव हो सकता है। अव्यक्त स्थिति का अनुभव कुछ समय लगातार करो तो ऐसे अनुभव होंगे जैसे साइन्स द्वारा दूर की चीजें सामने दिखाई देती हैं, ऐसे ही अव्यक्त वतन की एक्टिविटी यहाँ स्पष्ट दिखाई देगी। बुद्धिबल द्वारा अपने सर्वशक्तिमान के स्वरूप का साक्षात्कार कर सकते हैं। वर्तमान समय स्मृति कम होने के कारण समर्थी भी नहीं है। व्यर्थ संकल्प, व्यर्थ शब्द, व्यर्थ कर्म हो जाने कारण समर्थ नहीं बन सकते हो। व्यर्थ को मिटाओ तो समर्थ हो जायेंगे। पुरुषार्थ के भिन्न-भिन्न स्वरूप वतन में हरेक के देखते रहते हैं। बहुत अच्छा लगता है। हरेक अपने आप को इतना नहीं देखते होंगे जितना वतन में हरेक के अनेक रूप देखते हैं। आप लोग भी एक दिन खास अटेन्शन देकर देखना कि सारे दिन में मेरे कितने और कैसे रूप हुए। फिर बहुत हँसी आयेगी - भिन्न-भिन्न पोज़ देखकर। आजकल एक के ही बहुत पोज़ निकालते हैं। तो अपने भी देखना। अपने बहु रूपों का साक्षात्कार करना। वतन में आने की दिल तो सभी की होती है लेकिन अपने आप से पूछो - जो ब्राह्मणपन के कर्तव्य करने हैं वह सभी किये हैं? सर्व कर्तव्य सम्पन्न करने के बाद ही सम्पूर्ण बनेंगे। अब का समय ऐसा चल रहा है जो एक एक कदम अटेन्शन रखकर चलने का है। अटेन्शन न होने के कारण पुरुषार्थ के भी टेन्शन में रहते हैं। एक तरफ वातावरण का टेन्शन रहता है, दूसरे तरफ पुरुषार्थ का भी टेन्शन रहता है। इसलिए सिर्फ एक शब्द ऐड करो - अटेन्शन। फिर यह बहुरूप एक ही सम्पूर्ण रूप बन जायेगा। इसलिए अब कदम-कदम पर अटेन्शन। सुनाया था कि आजकल सर्व आत्मायें सुख और शान्ति का अनुभव करने चाहती हैं। ज्यादा सुनने नहीं चाहती हैं। अनुभव कराने के लिए स्वयं अनुभव स्वरूप बनेंगे तब सर्व आत्माओं की इच्छा पूर्ण कर सकेंगे। दिन प्रतिदिन देखेंगे - जैसे धन के भिखारी भिक्षा लेने के लिए आते हैं वैसे शान्ति के अनुभव के भिखारी आत्मायें भिक्षा लेने के लिए तड़पेंगी। अब सिर्फ एक दु:ख की लहर आयेगी तो जैसे लहरों में लहराती हुई आत्मायें वा लहरों में डूबती हुई आत्मा एक तिनके का भी सहारा ढूँढ़ती है। ऐसे आप लोगों के सामने अनेक भिखारी आत्मायें यह भीख मांगने के लिए आयेंगी। तो ऐसी तड़फती हुई या भिखारी प्यासी आत्माओं की प्यास मिटाने के लिए अपने को अतीन्द्रिय सुख वा सर्व शक्तियों से भरपूर किया हुआ अनुभव करते हो? सर्व शक्तियों का खज़ाना, अतीन्द्रिय सुख का ख़ज़ाना इतना इकट्ठा किया है जो अपनी स्थिति तो कायम रहे लेकिन अन्य आत्माओं को भी सम्पन्न बना सको। सर्व की झोली भरने वाले दाता के बच्चे हो ना। अब यह दृश्य बहुत जल्दी सामने आयेगा।
डॉक्टर लोग भी कोई को इस बीमारी की दवाई नहीं दे सकेंगे। तब आप लोगों के पास यह औषधी लेने के लिए आयेंगे। धीर-धीरे यह आवाज़ फैलेगा कि सुख-शान्ति का अनुभव ब्रह्माकुमारियों के पास मिलेगा। भटकते-भटकते असली द्वार पर अनेकानेक आत्मायें आकर पहुँचेंगी। तो ऐसे अनेक आत्माओं को सन्तुष्ट करने के लिए स्वयं अपने हर कर्म से सन्तुष्ट हो? सन्तुष्ट आत्मायें ही अन्य को सन्तुष्ट कर सकती हैं। अब ऐसी सर्विस करने के लिए अपने को तैयार करो। ऐसी तड़पती हुई आत्मायें सात दिन के कोर्स के लिए भी ठहर नहीं सकेंगी। तो उस समय उन आत्माओं को कुछ-न-कुछ अनुभव की प्राप्ति करानी होगी। इसलिए कहा कि अब अपने ब्राह्मणपन के कर्तव्य को सम्पन्न करने के लिए अपने को सम्पूर्ण बनाते रहो। अब समझा - कौनसी सर्विस करनी है? जब तक आप व्यक्त में बिज़ी हो, बापदादा अव्यक्त में भी मददगार तो हैं ना। हिम्मते बच्चे मददे बाप। तो बताओ ज्यादा बिज़ी कौन होगा? जैसे शुरू में वतन का अनुभव कराते थे ना। ऐसा अनुभव करते थे जो ध्यान में जाने वालों से भी अच्छा होता था (बाबा आप अभी भी अनुभव कराओ) अनुभव करो। बुद्धि का विमान तो है ही। कोई-कोई बच्चे कोई बात की ज़िद्द करते हैं तो बाप को कहना मानना पड़ता है। अब अनुभव करने की ज़िद्द करो। अच्छा।
पार्टियों से :-
प्रजा तो त्रेता के अन्त वाली चाहिए। द्वापर युग के लिए भक्त चाहिए। भक्त भी बनाओ और प्रजा भी बनाओ। अब तो ऐसा समय आयेगा - देते जाओ, झोली भरते जाओ। इतनी तड़पती हुई आत्मायें आयेंगी, उन्हें बूँद भी देंगे तो खुश हो जायेंगी। ऐसा समय अब आने वाला है। जैसे वह सुनाते हैं मिनट मोटर, ऐसी मशीनरी चलेगी। दृष्टि, वृत्ति, स्मृति, वाणी सभी से सर्विस चलेगी। आप का घर भी आश्रम है। उनमें से जो भी निकलेंगे वह स्वयं सेन्टर पर जाने के लिए रूक नहीं सकेंगे। इन्होंने तो सर्विस की स्थापना में धक्के खाये हैं। आप लोग तो बने बनाये पर आये हो। इन्होंने मेहनत कर मक्खन निकाला, आप खाने पर आ गये लेकिन मक्खन खाने वाले कितने शक्तिशाली चाहिए। सदैव यह ख्याल रखो कि जो भी आत्मायें सम्पर्क में आती हैं उनको जो आवश्यकता है वह मिले। रोटी की आवश्यकता वाले को पानी दे दो तो... किसको मान देना पडता है, उसको कहो जाकर दरी पर बैठो तो कैसे बैठेगा! कोई को दरी पर बिठाकर कोर्स कराया जाता है कोई को सोफे पर। अभी गवर्नर आया तो क्या किया? रिगार्ड दिया ना। अगर रिवाजी रीति से चलाओ तो चल न सके। कहाँ रिगार्ड देकर लेना पड़ता है। सभी को एक जैसा डोज़ देने से बीमार भी पड़ जाते हैं। आजकल डॉक्टर्स के पास पेशेन्ट्स जाते हैं तो लम्बा कोर्स नहीं चाहते हैं। आया इन्जेक्शन लगाया और खलास। यहाँ भी ऐसे है, आया और उनको उड़ाया। ऐसी सर्विस करते हो? स्वभाव से भी सर्विस कर सकते हो। ड्रामा अनुसार किसको स्वभाव भी अच्छा मिलता है तो उस स्वभाव की भी मदद है। सहेली बनाकर किसको अनुभव से भी प्रभावित कर सकते हैं। छोड़ न दो कि यह ज्ञान सुनते नहीं हैं। पहले सम्पर्क में लाकर फिर सम्बन्ध में लाओ। स्वभाव से भी किसको समीप ला सकते हो। इसका प्रयोग करो।
तुम सभी विश्व के कल्याण के आधारमूर्त हो। अपने को आधारमूर्त समझेंगे तो बहुतों का उद्धार कर सकेंगे। जो ऐसी सर्विस करते हैं वह उस खाते में, जैसे बैंक में भिन्न-भिन्न खाते होते हैं, जो जो जिसकी सर्विस करने के निमित्त बनते हैं वह उस समय ऐसे ही खाते में जमा होते हैं। फाउण्डेशन जितना गहरा डालेंगे उतना मज़बूत होगा। फाउन्डेशन तो डालते हैं लेकिन गहराई में डालने से, जैसे सुनाया कि सम्पर्क में तो लाया है परन्तु सम्बन्ध में लाना है। जो अनेकों को सम्बन्ध में लाता है वह नज़दीक सम्बन्ध में आयेगा। जो अनेकों को सम्पर्क में लाते हैं वह वहाँ भी नज़दीक सम्पर्क में आयेगा।
सारे दिन के पोतामेल को ठीक रीति से निकाल सकते हो? यह मालूम पड़ता है कि मेल गाड़ी की रफ्तार है? बापदादा के संस्कारों से मेल करना है। आप लोगों को, जिन्होंने साकार रूप से साथ रहकर सेकेण्ड के संकल्प, संस्कार का अनुभव किया है, उनसे मेल करना है। औरों को बुद्धियोग से खींचना पड़ता है। आप लोगों को सिर्फ सामने लाना पड़ता है। इसलिए संकल्प, संस्कार को मिलाते जाना है। समय नष्ट नहीं करना है, फौरन निर्णय करना है कि क्या करना है, क्या नहीं करना है? इसमें समय की भी बचत है और बुद्धि की शक्ति भी जो नष्ट होती है उसकी भी बचत है। अपने पुरुषार्थ से सन्तुष्ट हो? सम्पूर्ण होने का क्या प्लैन बनाया है? अपने को जब बदलेंगे तब औरों की सर्विस करेंगे। सन्तुष्टता में सर्टीफिकेट मिला है? मनपसन्दी के साथ-साथ लोक पसन्द बनना है। सर्टीफिकेट एक तो जो रेसपॉन्सिबुल हैं उन्होंने दिया तो लोकपसन्द हुए, रचना को भी सन्तुष्ट रखना है। उन्हों की चलन से ही कैच करना है कि सन्तुष्ट हैं? जब कोई मधुबन में आते हैं तो निमित्त बनी हुई बहनों द्वारा अपना सर्टीफिकेट ले जावें। यह सभी सर्टीफिकेट धर्मराज पुरी में काम आयेंगे। जैसे रास्ते में कार चलाने वाले को सर्टीफिकेट होता है तो दिखा देने से रास्ता पार कर लेते हैं। ऐसे धर्मराजपुरी में भी यह सर्टीफिकेट काम में आयेगा। इसलिए जितना हो सके सर्टीफिकेट लेते जाओ। क्योंकि ट्रिब्युनल में भी यही महारथी बैठते हैं। इन्हों की सर्टीफिकेट काम में आयेगी। यहाँ से सर्टीफिकेट ले जाने से दूसरी आत्माओं को सेटिस्फाय करने की विशेषता आयेगी। अनुभवी बहनें अनेकों को सेटिस्फाय करने की शिक्षा देती हैं। अनेकों को सेटिस्फाय करने की युक्ति है सर्टीफिकेट।
स्नेही बनना आता है या शक्ति बनना आता है? शक्ति भरने वाले जो रचयिता हैं उनकी रचना भी शक्तिशाली होने के कारण पुरुषार्थ में कब कैसे, कब कैसे डगमग नहीं होंगे। अगर स्टूडेन्ट डगमग होते हैं तो उससे परख सकते हैं कि शक्ति भरने की युक्ति नहीं है। समीप लाना यही विशेषता है। शक्तिशाली बनाना जो माया से मुकाबला कर लें। यह ऐड कर देना। विघ्न आवे भी लेकिन ज्यादा समय न चले। आया और गया - यह है शक्ति रूप की निशानी। जो अपने से सन्तुष्ट होता है वह दूसरों से भी सन्तुष्ट रहता है। और कोई असन्तुष्ट करे भी परन्तु स्वयं सन्तुष्ट हैं, तो सभी उनसे सन्तुष्ट हो जायेंगे। दूसरे की कमी को अपनी कमी समझ कर चलेंगे तो खुद भी सम्पूर्ण बन जायेंगे। यह कभी नहीं सोचो कि इस कारण से मेरा पुरुषार्थ ठीक नहीं चलता। मेरी कमजोरी है, ऐसा समझने से उन्नति जल्दी हो सकती है। नहीं तो दूसरे की कमी के फैसले में ही समय बहुत जाता है।
साकार स्नेही हो या निराकार स्नेही हो? निराकार स्नेही जो होते हैं उनकी यह विशेषता ज्यादा होती है कि वह निराकारी स्थिति में ज्यादा स्थित होंगे, साकार स्नेही चरित्रवान होंगे। उनका एक-एक चरित्र सर्विसएबुल होगा। दूसरा वह औरों को भी स्नेह में ज्यादा ला सकेंगे। निराकारी, निरहंकारी दोनों समान चाहिए।
बालक बनना अच्छा है या मालिक बनना अच्छा है? जितना हो सके सर्विस के सम्बन्ध में बालकपन, अपने पुरुषार्थ की स्थिति में मालिकपन। सम्पर्क और सर्विस में बालकपन, याद की यात्रा और मंथन करने में मालिकपन। साथियों और संगठन में बालकपन और व्यक्तिगत में मालिकपन - यह है युक्तियुक्त चलना।
सदा उमंग उल्लास में एकरस रहने के लिए कौन सी पॉइन्ट याद रहे? उसके लिए जो सदैव सम्बन्ध में आते - चाहे स्टूडेन्ट, चाहे साथी सभी को सन्तुष्ट करने की उत्कंठा हो। उत्साह में रहने से जो ईश्वरीय उमंग उत्साह है वह सदा एकरस रहेगा। जिसको देखो उससे हर समय गुण उठाते रहो। सर्व के गुणों का बल मिलने से सदा काल के लिए उत्साह रहेगा। उत्साह कम होने का कारण औरों के भिन्न-भिन्न स्वरूप, भिन्न-भिन्न बातें देखना, सुनना, गुण देखने की उत्कण्ठा हो तो एकरस उत्साह रहे। गुण चोर होने से और चोर भाग जायेंगे। सर्व पर विजयी बनने की युक्ति क्या है? विजयी बनने के लिए हरेक के दिल के राज़ को जानना है। जब हरेक के मुख के आवाज़ को देखते हो, तो आवाज़ देखने से उनके दिल के राज़ को नहीं जान सकते। दिल के राज़ को जानने से सर्व के दिलों के विजयी बन सकते हो। दिल के राज़ को जानने के लिए अन्तर्मुखता चाहिए। जितना राज़ को जानेंगे उतना सर्व को राज़ी कर सकेंगे। जितना राज़ी करेंगे उतना राज़ को जानेंगे। तब विजयी बन सकेंगे।
सरलचित्त की निशानी क्या है? जो स्वयं सरलचित्त रहता है वह दूसरों को भी सरलचित्त बना सकता है। सरलचित्त माना जो बात सुनी, देखी, की, वह सार-युक्त हो और सार को ही उठाये और जो बात वा कर्म स्वयं करे उसमें भी सार भरा हुआ हो। तो पुरुषार्थ भी सरल होगा और जो सरल पुरुषार्थी होता है वह औरों को भी सरल पुरुषार्थी बना देता है। सरल पुरुषार्थी सब बातों में आलराउन्ड होगा। कोई भी बात की कमी दिखाई नहीं देगी। कोई भी बात में हिम्मत कम नहीं होगी। मुख से ऐसा बोल नहीं निकलेगा कि यह अभी नहीं कर सकते हैं। यह एक मुख्य अभ्यास प्रैक्टिकल में लाने से सब बातों में सैम्पुल बन सकते हैं। सर्व बातों में सैम्पुल बनने से पास विद् ऑनर बन सकते हैं। ऐसा कभी कोई बात में कहते हो, अभ्यास नहीं है। आलराउन्ड बनना दूसरी बात है, यह हुई कमाई। आलराउन्ड एग्जाम्पुल बनना दूसरी बात है। हर बात में अन्य के आगे सैम्पुल बनकर दिखाना। हर बात में कदम आगे बढ़ाना अपने द्वारा सभी को कमाई में उल्लास दिलाना - यह है आलराउन्ड एग्जाम्पुल बनना।
सेन्स में ज्यादा रहते हो या इसेन्स में? सेन्सीबुल जो होते हैं वह इतने सफलतामूर्त नहीं बन सकते हैं, इसेन्स में रहने वालों की खुशबू अधिक समय चलती है। उनका प्रभाव सदा काल चलता है। जो सिर्फ सेन्स में रहते हैं उनका प्रभाव तो रहता है परन्तु हर समय नहीं। सभी के गले में विजय माला पड़ी है लेकिन नम्बरवार। कोई के गले में बड़ी तो कोई के गले में छोटी। इसका कारण क्या है? जितना-जितना शुरू से लेकर मनसा में, वाचा में, कर्मणा में आई हुई समस्याओं या विघ्नों के ऊपर विजयी बने हैं, उस अनुसार विजय माला हरेक की बनती है। शुरू से लेकर देखो तो मालूम पड़ सकता है कि मेरी विजय माला कितनी बड़ी है! आजकल छोटी माला भी बनाते तो बड़ी भी बनाते हैं। जो जितना-जितना विजयी बनते हैं उतना ही बड़ी विजयमाला पहनते हैं। यह जो चतुर्भुज में विजय माला की निशानी है सिर्फ एक की नहीं, यह विजयी रत्नों की निशानी है। तो हरेक अपनी-अपनी विजय माला का साक्षात्कार कर सकते हो। जितना विजय माला पहनने के अधिकारी बनेंगे उतना ही ताज तख्त उस प्रमाण प्राप्त होगा। तो इस समय विजय माला के प्रमाण अपना भविष्य तख्त भी समझ सकते हो। यहाँ ही अब सभी को साक्षात्कार होना है। साक्षात्कार सिर्फ दिव्य दृष्टि से नहीं, प्रत्यक्ष साक्षात्कार भी होना है। प्रत्यक्ष का प्रमाण यह भी साक्षात्कार है। इसलिए पूछा कि कितनी बड़ी है - विजय माला। एक है सर्विस का बल, दूसरा है स्नेह का बल, इसलिए एक्स्ट्रा बल मिलने कारण विशेष सर्विस हो रही है। जो स्वयं में शारीरिक के हिसाब से शक्ति नहीं समझते हैं लेकिन यह बल होने के कारण जैसे और कोई चला रहा है। ऐसा अनुभव करते हैं। निमित्त बनने से बहुत एक्स्ट्रा बल मिलता है। जैसे साकार रूप में निमित्त बनने से एक्स्ट्रा बल था। ऐसे इसमें भी है। अतीन्द्रिय सुख का अनुभव होने से क्या होता है? अतीन्द्रिय सुख मिलने से जो इन्द्रियों के सुख का आकर्षण है वह समाप्त हो जाता है। जो दु:ख देने वाली चीज है, वह कौन सी है? इन्द्रियों का आकर्षण, सम्बन्ध का आकर्षण वा कोई भी कर्मेन्द्रियों के वश होने से जो भिन्न-भिन्न आकर्षण होते हैं वह अतीन्द्रिय सुख वा हर्ष दिलाने में बन्धन डालते हैं। एक ठिकाने बुद्धि टिक जाने से एकरस अवस्था रहती है। इसलिए सदैव बुद्धि को एक ठिकाने में टिकाने की जो युक्ति मिली है वह स्मृति में रखो। हिलने न दो। हिलना अर्थात् हलचल पैदा करना। फिर समय भी बहुत व्यर्थ जाता है। युद्ध में समय बहुत जाता है। शक्तियों के चित्र में शक्तियों की निशानी क्या दिखाते हैं? एक तो वह अलंकारी हैं, दूसरा संहारी भी हैं। अलंकार किसलिए हैं? संहार करने के लिए। ऐसे ही अलंकारी संहारकारी मूर्त अपने को समझ कर चलते चलो। जब यह स्मृति में रहेगा कि मैं संहार मूर्त हूँ तो वे माया के वश कभी नहीं होंगे। सदैव यह चेक करना है कि अलंकार सभी ठीक रीति से धारण किये हुए हैं! कोई भी अलंकार अगर धारण नहीं किये हुए हैं तो विजयी नहीं बन सकते हैं। जैसे सुहागिन होती है, वह सदैव अपने सुहाग की निशानी को कायम रखती है। इसलिए जब शक्तियाँ हो तो शक्तिपन के अलंकार वह निशानी कायम है? जैसे देखो कभी भी अपना स्थूल श्रृंगार कम हो जाता है, नीचे ऊपर होता है तो उसको बार-बार ठीक करते हैं। इसलिए कोई भी अलंकार रूपी श्रृंगार बिगड़ा हुआ है तो उसको ठीक करना है। जो अति पुराने होते हैं उनको पूरा अधिकार लेकर जाना है। अधिकार लेने के लिए ही अपने ऊपर छाप लगाने लिए मधुबन में आते हैं। यह मधुबन है फाईनल ठप्पा वा छाप लगाने का स्थान। जैसे पोस्ट आफिस होती है, उसमें जब फाइनल ठप्पा लगाते हैं तब चिट्ठी जाती है। यह भी स्वर्ग के अधिकारी बनने का छाप मधुबन है। मधुबन में आना अर्थात् करोड़ गुणा कमाई करना। विघ्नों को विनाश करने वाले हो ना? जो विघ्न-विनाशक होते हैं वह विघ्नहार नहीं बन सकते। कम्बाइन्ड अपने को समझो। बापदादा तो सेकेण्ड, सेकेण्ड का साथी है। जब से जन्म लिया है तब से लेकर साथ है। यहाँ जन्म भी इस समय होता है, साथी भी इस समय मिलता है। लौकिक में जन्म पहले होता है और साथी बाद में। यहाँ अभी-अभी जन्म, अभी-अभी साथी।
बम्बई नगरी में रहते हुए प्ऱूफ हो? जो स्वयं प्रूफ नहीं हैं वह औरों के आगे प्रूफ (सबूत) भी नहीं बन सकते। धारणा वाली जीवन औरों के आगे प्रूफ बन जाती है। प्रूफ कौन बन जाता है? जो प्रूफ है। बम्बई में जास्ती पूजा किसकी होती है? गणेश की। उसको विघ्न-विनाशक कहते हैं, गणेश का अर्थ है मास्टर नालेजफुल, विद्यापति। मास्टर नालेजफुल कभी हार नहीं खा सकते। क्योंकि नालेज को ही लाइट माइट कहते हैं। फिर मंज़िल पर पहुँचना सहज हो जाता है। मंज़िल पर पहुँचने के लिए लाइट माइट दोनों चाहिए। अपनी सूरत को ऐसा करना है - जो आपकी सूरत से बापदादा दोनों दिखाई दें। जो भी कर्म करते हो वह हर कर्म में बापदादा के गुण प्रत्यक्ष हों। बापदादा के मुख्य गुण कौन से वर्णन करते हो? ज्ञान, प्रेम, आनन्द, सुख-शान्ति का सागर। जो भी कर्म करो वह सब ज्ञान सहित हों। हर कर्म द्वारा सर्व आत्माओं को सुख-शान्ति, आनन्द का अनुभव हो। इसको कहते हैं बाप के गुणों की समानता। आपको समझाने की आवश्यकता नहीं। आपके कर्म देख उन्हों के दिल में संकल्प उठे कि यह किसके बच्चे, किस द्वारा ऐसे बने। स्टूडेन्ट भी अगर पढ़ने में अच्छा स्कॉलरशिप लेने वाला होता है तो उनको देख टीचर की याद आती है। इसलिए कहावत है स्टूडेन्ट शोज़ टीचर यह भी सर्विस करने का तरीका है। अलौकिक जन्म का हर कर्म सर्विस प्रति हो। जितना सर्विस करेंगे उतना भविष्य ऊंचा। जितना अपने को सर्विस में बिजी रखेंगे उतना माया के वार से बच जायेंगे। बुद्धि को एंगेज कर दिया तो कोई डिस्टर्ब नहीं करेगा। यह भी संगमयुग का वरदान है - एकरस अवस्था, एक का ही ध्यान, एक की ही सर्विस में जितना जो कोई वरदान ले। जैसे कोई नशे में रहता है उसको और कुछ सूझता नहीं, ऐसे इस ईश्वरीय नशे में रहने से और दुनिया की आकर्षण से परे हो जायेंगे।
(कोई बांधेली ने पूछा - बाबा हम बांधेली हैं, हमको संकल्प चलता है कि हम सर्विस नहीं करती हैं?)
बांधेली स्वतन्त्र रहने वालों से अच्छी हैं। स्वतन्त्र अलबेले रहते हैं। बांधेली की लगन अच्छी रहती है। याद को पावरफुल बनाओ। याद कम होगी तो शक्ति नहीं मिलेगी। याद में रहते यह व्यर्थ न सोचो कि सर्विस नहीं करती। उस समय भी याद में रहो तो कमाई जमा होगी। यह सोचने से याद की पॉवर कम होगी। बन्धन से मुक्त करने के लिए अपनी चलन को चेन्ज करो। जो घर वाले देखें कि यह चेन्ज हो गई है। जो कड़ा संस्कार है वह चेन्ज करो। वह अपना काम करें आप अपना काम करो। उनके काम को देख घबराओ नहीं। जितना वो अपना काम फोर्स से कर रहे हैं, आप अपना फोर्स से करो। उनके गुण उठाओ कि वह कैसे अपना कर्तव्य कर रहे हैं, आप भी करो। सारी सृष्टि की आत्माओं की भेंट में कितनी आत्माओं को यह भाग्य प्राप्त हुआ है। तो कितनी खुशी होनी चाहिए। खुशी तो नयनों में, मस्तक में, होठों में झलकती रहनी चाहिए। जो है ही खुशी के खज़ाने का मालिक, उसके बालक हो। तो खज़ाने के अधिकारी तो हो ना। 5 हजार वर्ष पहले भी आये थे, यह अनुभव है? स्मृति आती है? स्पष्ट स्मृति की निशानी क्या है? स्पष्ट स्मृति की निशानी यह है कि किससे मिलेंगे तो अपनापन महसूस होगा और अपने स्थान पर पहुँच गया हूँ, यह वही स्थान है, जिसको ढूंढ रहा था। जैसे कोई चीज़ ढूंढ़ने के बाद मिलती है, इस रीति से यह भासना आये कि असली परिवार से मिले हैं और अपनापन का अनुभव हो। इसको कहते हैं स्पष्ट अनुभव। दूसरी बात कि जो बात सुनेगा वह उनको सहज स्पष्ट समझ में आयेगी। जैसे पवित्रता की बात लोगों को मुश्किल लगती है परन्तु जो कल्प पहले वाले होंगे, अधिकारी वह तो समझते हैं कि हमारा स्वधर्म ही है। उनको सहज लगेगा। जैसे कोई जानी-पहचानी मूर्तियाँ होती हैं उनको देखने से ऐसा अनुभव होता है कि यह तो अपने हैं। जितना समीप सम्बन्ध में आने वाले होंगे वह स्पष्ट अनुभव करेंगे। ऐसी अनुभवी आत्माओं को कर्मबन्धन तोड़ने में देरी नहीं लगेगी। नकली चीज़ को छोड़ना मुश्किल नहीं होता है। अच्छा।