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31 Dec 1994
“नये वर्ष को शुभ भावना गुण स्वरूप वर्ष के रूप में मनाओ”
31 December 1994 · हिंदी
आज नवयुग रचता बापदादा अपने नवयुग राज्य अधिकारी बच्चों को देख रहे हैं। नव वर्ष को देख अपना नवयुग याद आता है! नवयुग के आगे यह नव वर्ष कोई बड़ी बात नहीं। जिस नवयुग में हर वस्तु, हर व्यक्ति, प्रकृति सब नया है। नया वर्ष जब शुरु होता है तो पुरानी वस्तु वा व्यक्ति के पुराने स्वभाव, संस्कार, चाल-चलन कुछ नये होते हैं, कुछ पुराने होते हैं। लेकिन आपके नवयुग में पुराने का नाम-निशान नहीं। व्यक्ति भी नया अर्थात् सतोप्रधान है और प्रकृति भी सतोप्रधान अर्थात् नई है। प्रकृति में भी आजकल जैसा पुरानापन नहीं होगा। तो नवयुग की मुबारक के साथ नव वर्ष की मुबारक।
आज विशेष नया वर्ष मनाने के उमंग-उत्साह से, खुशी-खुशी से सभी पहुँच गये हैं। तो बापदादा भी दिल से दिल की दुआओं सहित नव युग की और नये वर्ष की डबल मुबारक देते हैं। आप सभी को भी डबल याद है या सिंगल याद है? अपना नया युग नयनों के आगे बुद्धि में स्पष्ट है ना? जैसे कहेंगे कल से नया वर्ष शुरु है, ऐसे ही कहेंगे कल नवयुग आया कि आया इतना स्पष्ट है? नशा है? सभी नवयुग के राज्य अधिकारी हैं? सभी राजा बनेंगे तो प्रजा बनाई है? आप सब तो राजा हो लेकिन राज्य किस पर करेंगे? अपने ऊपर! तो बापदादा नवयुग और नया वर्ष डबल देख रहे हैं। कल की बात है ना, वो भी कल और ये भी कल की बात है। फिर नवयुग होगा ना! अपने नवयुग की ड्रेस (शरीर) सामने दिखाई देती है? बस, पुरानी ड्रेस छोड़ेंगे और नई ड्रेस धारण करेंगे। तो वो ड्रेस अच्छी, चमकीली, सुन्दर है ना! अभी तो देखो हर व्यक्ति में कोई ना कोई नुक्स होगा। कोई की नाक टेढ़ी होगी, किसकी आंख टेढ़ी होगी, किसके हों” ऐसे होंगे और नवयुग में सब नम्बरवन, हर कर्मेन्द्रिय एक्यूरेट। तो ऐसी ड्रेस सामने खूटी पर लगी हुई है ना! बस पहननी है। अपनी ड्रेस अच्छी, पसन्द है? देख रहे हो ना?
बापदादा सदैव जब हर एक बच्चे को देखते हैं तो क्या देखते हैं? एक तो हर एक के मस्तक की चमकती हुई मणि श्रेष्ठ आत्मा को देखते हैं और साथ-साथ हर एक बच्चे के भाग्य की श्रेष्ठ लकीर को देखते हैं। हर एक का भाग्य कितना श्रेष्ठ है! सभी का भाग्य श्रेष्ठ है ना! कि किसका मध्यम भी है? सभी वन हैं? सेकेण्ड, थर्ड और आने वाले हैं? अच्छा है, दुनिया वाले कहते हैं आपके मुख में गुलाब और बापदादा कहते हैं आपके मुख में गुलाब-जामुन। गुलाब-जामुन सबको बहुत अच्छा लगता है ना? गुलाब-जामुन या मिठाई खाने के लिये ही बापदादा ने हर गुरुवार भोग का रखा है। भोग में खुद भी खाते हो और बापदादा को भी स्वीकार कराते हो। घर में बनाये, नहीं बनाये, लेकिन गुरुवार को तो मीठा मिलेगा ना। और जब कभी खुशी का उत्सव होता है तो मुख ही मीठा कराते हैं। मीठा मुख अर्थात् मीठा मुखड़ा। मुख मीठा तो सब करते हैं लेकिन आप सबका मुख भी मीठा है तो मुखड़ा (फेस) भी मीठा है, या थोड़ा-थोड़ा कड़ुवा भी है? अगर एक लकीर भी कड़ुवे की हो तो आज वर्ष को विदाई देने के साथ-साथ इस थोड़े से कड़ुवे-पन को भी विदाई दे देना। विदाई देना आता है कि पास में रखना अच्छा लगता है? या विदाई देकर फिर बुला लेंगे? फिर कहेंगे हम तो छोड़ना चाहते हैं लेकिन माया नहीं छोड़ती है! ऐसे तो नहीं कहेंगे कि हमने छोड़ दिया लेकिन माया आ गई? वहाँ जाकर फिर ऐसे पत्र लिखेंगे? विदाई, तो सदाकाल के लिये विदाई। विदाई देने का अर्थ ही है फिर आने नहीं देना। कि कभी-कभी आ जाये तो कोई हर्जा नहीं? क्योंकि पुराने संस्कार कइयों को बहुत अच्छे लगते हैं। आज कहेंगे कल से नहीं होगा और फिर परसों परवश हो जायेंगे। तो उसको विदाई नहीं कहेंगे ना। तो विदाई देना भी सीखो। वर्ष को विदाई देना तो कॉमन बात है लेकिन आप सबको अंश, वंश सहित माया को विदाई देना है। अंश मात्र भी नहीं रहे। कई बच्चे कहते हैं 75 प्रतिशत तो फर्क पड़ गया है, और भी पड़ जायेगा। लेकिन माया अंश से वंश बहुत जल्दी पैदा करती है। 25 प्रतिशत अंश मात्र भी रहा तो 25 से 50 तक भी बहुत जल्दी पहुँच सकता है। इसीलिये अंश सहित समाप्त करना है। तो नये वर्ष में क्या करेंगे? पुराने वर्ष को विदाई देने के साथ-साथ माया के अंश को भी विदाई देना। और विदाई के साथ बधाई भी देते हो ना! कल सभी एक-दो को मिलेंगे तो कहेंगे नये वर्ष की मुबारक हो, बधाई हो। तो विदाई दो और विदाई के साथ-साथ अपने को भी और दूसरों को भी सदा फरिश्ते स्वरूप की बधाई दो। हैं ही फ़रिश्ता। ऊपर से नीचे आये, अपना कार्य किया और उड़ा। फरिश्ते यही करते हैं ना! उड़ती कला की निशानी पंख दिखाये हैं। कोई आर्टीफिशियल पंख नहीं हैं। लेकिन ये फ़रिश्तों को जो पंख दिखाते हैं उसका अर्थ है फ़रिश्ता अर्थात् उड़ती कला वाले। तो फ़रिश्ते स्वरूप की बधाई स्वयं को भी दो और दूसरों को भी। सदा फ़रिश्ते स्वरूप के स्मृति में भी रहो और दूसरे को भी उसी स्वरूप से देखो। फलानी है, फलाना है...। नहीं, फ़रिश्ता है। ये फ़रिश्ता सन्देश देने के निमित्त है। समझा? तो सभी को फ़रिश्ते स्वरूप की मुबारक दो। चाहे कोई कैसा भी हो लेकिन दृष्टि से सृष्टि बदल सकती है। जब दृष्टि से सृष्टि बदल सकती है तो क्या ब्राह्मण नहीं बदल सकता? आपकी दृष्टि-स्मृति हर आत्मा को बदल देगी।
बापदादा को कभी-कभी बच्चों पर हंसी आती है। आप लोगों को भी अपने ऊपर आती है? एक तरफ कहते हैं कि हम विश्व परिवर्तक हैं, विश्व कल्याणकारी हैं... और फिर विश्व परिवर्तक आकर कहता है कि ये मेरे से बदली नहीं होता! अपने प्रति भी कभी रुहरिहान में कहते हैं चाहते हैं ये नहीं करें, फिर भी कर लेते हैं... तो विश्व परिवर्तक और स्वयं के लिए ही कहे कि मैं चाहता हूँ लेकिन कर नहीं पाता हूँ तो उसका टाइटल क्या होना चाहिये? उसको विश्व परिवर्तक कहना चाहिये या कमजोर कहना चाहिये? गीत सुनाते हैं ना क्या करें, कैसे करें, पता नहीं कब होगा... यह गीत बापदादा तो सुनते हैं ना! जब विश्व परिवर्तक हैं, विश्व कल्याणकारी हैं तो क्या कोई आत्मा को नहीं बदल सकते? स्वयं को नहीं बदल सकते? अगर स्व परिवर्तक भी नहीं तो विश्व परिवर्तक कैसे होंगे?
बापदादा कहते हैं इस वर्ष की विशेष दृढ़ प्रतिज्ञा स्वयं से करो। प्रतिज्ञा का अर्थ ही है कि शरीर चला जाये लेकिन जो प्रतिज्ञा की है, वह प्रतिज्ञा नहीं जाये। तो प्रतिज्ञा करने की इतनी हिम्मत है? करेंगे? डरेंगे तो नहीं? तो यही प्रतिज्ञा स्वयं से करो कि “कभी भी किसी की कमजोरी वा कमी को नहीं देखेंगे। किसी की कमजोरी-कमी को नहीं सुनेंगे, नहीं बोलेंगे।'' न सुनेंगे, न बोलेंगे, न देखेंगे। तो ये वर्ष क्या हो जायेगा? ये वर्ष हो जायेगा शुभ भावना गुण स्वरूप वर्ष। हर वर्ष को अपना-अपना नाम देते हो ना। जब ये प्रतिज्ञा सभी कर लेंगे तो ये वर्ष हुआ - शुभ भावना गुण स्वरूप वर्ष। मंज़ूर है? फिर वहाँ जाकर नहीं बदल जाना! फिर कहेंगे मधुबन में तो वायुमण्डल अच्छा था ना और यहाँ तो वायुमण्डल का संग है ना! परिवर्तक किसी के संग में नहीं आता, किसी के प्रभाव में नहीं आता। अगर परिवर्तक ही प्रभाव में आ जायेगा तो परिवर्तन क्या करेगा? इसलिये इस वर्ष को गुण मूर्त, शुभ भावना वर्ष के रूप में मनाओ। किसकी अशुभ बात को भी आप अपने पास शुभ करके उठाओ। अशुभ देखते हुए भी आप शुभ दृष्टि से देखो। जब प्रकृति को बदल सकते हो तो मनुष्यात्माओं को नहीं बदल सकते हो? और उसमें भी ब्राह्मण आत्मायें हैं, उनको नहीं बदल सकते हो? जब सबके प्रति शुभ भावना होगी तो ‘कारण' शब्द समाप्त होकर ‘निवारण' शब्द ही दिखाई देगा। इस कारण से ये हुआ, इस कारण हुआ...। नहीं, कारण को निवारण में परिवर्तन करो। हिम्मत है? अच्छा! बापदादा जब टी.वी. खोलते हैं तो बड़ा मजा आता है। ये कलियुगी टी.वी. नहीं देखते। ब्राह्मणों की टी.वी. देखते हैं। ऐसे नहीं, आप लोग वह टी.वी. खोल लो, ऐसे नहीं करना। तो जब बच्चों का खेल देखते हैं तो बहुत मजा आता है। मिक्की माउस का खेल तो करते हो ना! थोड़े टाइम के लिये कोई शेर बन जाता, कोई कुत्ता बन जाता। जिस समय क्रोध करते हो उस समय क्या हो? जिस समय किससे डिस्कस करते हो, उसके ऊपर वार करते जाते हो, सिद्ध करते जाते हो तो उस समय क्या हो? मिक्की माउस ही बन जाते हो ना। तो इस वर्ष मिक्की माउस नहीं बनना। फ़रिश्ता बनना। मिक्की माउस का खेल बहुत किया। तो ये वर्ष ऐसे शक्तिशाली वर्ष मनाना। क्योंकि समय तो समीप आना भी है और लाना भी है। ड्रामानुसार आना तो है ही लेकिन लाने वाले कौन हैं? आप ही हो ना?
दूसरी विशेषता इस वर्ष में क्या करेंगे? नये वर्ष में एक तो बधाइयाँ देते हो और दूसरा गिफ्ट देते हो। तो इस नये वर्ष में सदैव हर एक को, जो भी जब भी सम्बन्ध-सम्पर्क में आये, चाहे ब्राह्मण परिवार, चाहे और आत्मायें हो, उन सबको एक तो मधुर बोल की गिफ्ट दो, स्नेह के बोल की सौगात दो और दूसरा सदैव कोई न कोई गुण की, शक्ति की सौगात दो। यह सौगात सेकेण्ड में भी दे सकते हो। ऐसे नहीं कह सकते हो कि टाइम ही नहीं मिला, न लेने वाले को टाइम था, न देने वाले को टाइम था। लेकिन अगर अपनी श्रेष्ठ भावना, श्रेष्ठ कामना की वृत्ति है तो सेकेण्ड के संकल्प से, दृष्टि से अपने दिल के मुस्कराहट से सेकेण्ड में भी किसी को बहुत कुछ दे सकते हो। जो भी आवे उसको गिफ्ट देनी है, खाली हाथ नहीं जावे। तो इतनी गिफ्ट आपके पास है? कि दो दिन देंगे तो खत्म हो जायेगी? सभी का स्टॉक भरपूर है? कि कोई का स्टॉक थोड़ा कम हो गया है? जिसके पास कम हो वो हाथ उठा लो। भर देंगे। जिसके पास कमी हो वो चिटकी लिखकर जनक (दादी जानकी) को देना वो क्लास करा लेगी। कमी तो नहीं रहनी चाहिये ना! दाता के बच्चे और कमी हो तो अच्छा नहीं है ना! इसलिये भरपूर होकर जाना। कमी को लेकर नहीं जाना। वर्ष के साथ कमियों को भी विदाई देकर जाना। ऐसे नहीं, कि सिर्फ कल एक दिन ही गिफ्ट देना है। नहीं, सारा वर्ष सबको गिफ्ट बांटते जाओ। बिना गिफ्ट के कोई नहीं जाये। तो कितना अच्छा लगेगा। अगर कोई आता है उसको छोटी-सी प्यार से गिफ्ट दे दो तो कितना खुश होता है। चीज़ को नहीं देखते हैं लेकिन गिफ्ट अर्थात् स्नेह के स्वरूप को देखते हैं। गिफ्ट से कोई मालामाल नहीं हो जाते हैं लेकिन स्नेह से मालामाल हो जाते हैं। तो स्नेह देना और स्नेह लेना। अगर कोई आपको स्नेह नहीं भी दे, तो भी आप उनसे ले लेना। लेना आयेगा कि शर्म करेंगे कैसे लें? इस लेने में कोई हर्जा नहीं है। वो आप पर क्रोध करे, आप स्नेह के रूप में ले लेना। आप विश्व परिवर्तक हो ना। तो विश्व परिवर्तक किसी के निगेटिव को पॉजिटिव में नहीं बदल सकता! तो ये वर्ष सदा स्नेह देना और स्नेह लेना। ऐसे नहीं कहना कोई ने दिया ही नहीं, क्या करुँ...। वो दे या न दे, आप ले लो। कुछ तो देगा ना, निगेटिव दे या पॉजिटिव दे कुछ तो देगा ना! लेकिन हे विश्व परिवर्तक, आप निगेटिव को पॉजिटिव में परिवर्तन कर लेना। समझा, इस वर्ष क्या करना है! अच्छा। डबल विदेशी क्या करेंगे? गिफ्ट देंगे? दाता बन गये हो? वाह, दातापन की मुबारक हो।
बापदादा रोज़ बच्चों की एक बात देखते हैं। कौन-सी? कि ये ‘मैं' और ‘मेरा' ये परेशान कर देता है। कभी ‘मेरा' आ जाता है, कभी ‘मैं' आ जाता है, जो बीच-बीच में परेशान करता है। तो जब वर्ष परिवर्तन हो रहा है तो इस ‘मैं' और ‘मेरे' को भी परिवर्तन करो। शब्द भले ‘मैं' बोलो लेकिन मैं कौन? ओरीजनल ‘मैं' किसको कहते हैं? शरीर को या आत्मा को? मैं आत्मा हूँ। तो जब भी ‘मैं' शब्द यूज़ करते हो तो क्यों नहीं ‘मैं' शब्द का ओरीजनल स्वरूप, ओरीजनल अर्थ स्मृति में रखते हो। और सारे दिन में कितने बार ‘मैं' शब्द यूज़ करते हो? करना ही पड़ता है ना। ‘मेरा' भी कई बार यूज़ करते हो और ‘मैं' भी कई बार यूज़ करते हो। तो जितने बार ‘मैं' शब्द यूज़ करते हो उतने बार अगर वास्तविक अर्थ से ‘मैं' स्मृति में लाओ तो ‘मैं' धोखा देगा या उड़ायेगा? तो जब भी ‘मैं' शब्द यूज़ करते हो उस समय यही सोचो मैं आत्मा हूँ। क्योंकि ‘मैं' और ‘मेरे' शब्द के बिना रह भी नहीं सकते हो। बोलना ही पड़ता है और आदत भी है, ‘मैं' ‘मेरे' के पक्के संस्कार हो गये हैं। तो जिस समय ‘मैं' शब्द यूज़ करते हो उस समय ये सोचो कि मैं कौन? मैं शरीर तो हूँ ही नहीं ना। बॉडी-कॉन्सेसनेस तब आवे जब मैं शरीर हूँ। शरीर तो मेरा कहते हो ना? कि मैं शरीर कहते हो? कभी गलती से कहते हो कि मैं शरीर हूँ? गलती से भी नहीं कहेंगे ना कि मैं शरीर हूँ। तो ‘मैं' शब्द और ही स्मृति और समर्थी दिलाने वाला शब्द है, गिराने वाला नहीं है। तो परिवर्तन करो। विश्व परिवर्तक पक्के हो ना? देखना कच्चे नहीं बनना। तो ‘मैं' शब्द को भी अर्थ से परिवर्तन करो। जब भी ‘मैं' शब्द बोलो, तो उस स्वरूप में टिक जाओ और जब ‘मेरा' शब्द यूज़ करते हो तो सबसे पहले मेरा कौन? सारे दिन में मेरा-मेरा तो बहुत बनाते हो! मेरा स्वभाव, मेरा संस्कार, मेरी ये चीजें, मेरा परिवार, मेरा सेन्टर, मेरा जिज्ञासु, मेरी सेवा, मेरी सेवा इसने क्यों की? ये कहते हो ना? खेल तो करते हो ना। तो जब ‘मेरा' शब्द बोलते हो तो ‘मेरा' कहने से पहले ये याद करो कि मेरा कौन? पहले ‘मेरा बाबा' याद करो। फिर मेरा और याद करो। तो जहाँ बाप होगा वहाँ देह अभिमान वा गिरावट नहीं आयेगी। तो ‘मैं' और ‘मेरा' इन दोनों शब्दों को उस वृत्ति से, उस दृष्टि से, उस अर्थ से देखो और बोलो। ‘मेरा' शब्द मुख से निकले और पहले ‘मेरा बाबा' याद आये। तो निरन्तर योगी तो हो जायेंगे ना! क्योंकि हर घण्टे में ‘मेरा' और ‘मैं' शब्द यूज़ करते हो। कारोबार में भी करना पड़ता है ना! तो जितने बार ये रिपीट करो, मुख से बोलो वा मन से सोचो - मैं या मेरा, तो अर्थ का परिवर्तन करो। हद से बेहद में जाना है ना। जब बेहद सृष्टि की परिवर्तक आत्मायें हो तो हद में क्यों जाते हो? सिर्फ भारत परिवर्तक तो नहीं हो ना? या डबल विदेशी सिर्फ फॉरेन परिवर्तक तो नहीं हो ना? विश्व परिवर्तक हो। विश्व अर्थात् बेहद। विश्व परिवर्तक हैं - यह पक्का याद है ना? तो ऑटोमेटिकली निरन्तर योगी सहज बन जायेंगे। मेहनत नहीं करनी पड़ेगी। क्योंकि भाव और भावना बदल जायेगी। जब मैं आत्मा सोचेंगे तो हर कर्म या बोल में भाव भी बदल जायेगा, भावना भी बदल जायेगी। क्योंकि भाव और भावना ही धोखा भी देती है, सुख भी देती है। तो यह परिवर्तन करेंगे ना? फिर यह पत्र नहीं लिखना क्या करें, कैसे करें...? ओ.के. का पत्र आयेगा या ये हुआ, वो हुआ... हुआ-हुआ तो नहीं आयेगा ना? बापदादा के पास सबके पत्रों के फाइल हैं। कभी देखते हैं शुरु से लेकर क्या-क्या पत्र हैं, जो मन में सोचते हैं, वो भी सबका टेप रिकॉर्ड है।
तो नया वर्ष अर्थात् नवीनता लाना। नवीनता सभी को प्रिय लगती है ना? पुरानी चीज़ शो में रखने के लिये तो पसन्द करेंगे लेकिन यूज़ करने के लिये नहीं। यूज़ करने के लिये तो सोचेंगे नया। तो हर बात में नवीनता हो, संकल्प भी नया हो। रमणीकता से पुरुषार्थ करो। कभी-कभी कोई-कोई बच्चे इतना हठ से पुरुषार्थ करते हैं जो बापदादा को देखकर के तरस पड़ता है। बहुत युद्ध करते हैं। आवश्यकता नहीं है लेकिन करते हैं, क्यों? अपनी कमजोरी के कारण। तो मेहनत का पुरुषार्थ नहीं करो। पुरुषार्थ भी मौज-मौज से करो। करना भी क्या है? याद कोई ना कोई तो रहता ही है, कोई नई बात तो है नहीं। एक घड़ी भी बिना याद के रहते हो क्या? कोई न कोई तो याद रहता ही है। चाहे बात याद रहे, चाहे कोई व्यक्ति याद रहे, चाहे कोई वस्तु याद रहे लेकिन याद तो रहती है ना। बिना याद के होता है क्या? किसी को तो याद करना ही है। तो जो मतलब की बात है उसको याद करो। याद करना किसे नहीं आता है? कोई है जिसको याद करना नहीं आता हो? छोटी कुमारियों को याद करना आता है? अच्छा। तो जब याद करना ही है तो क्यों नहीं जिससे फायदा है, प्राप्ति है उसको करें, जिससे नुकसान है उसको क्यों करें? याद भी करते हैं और फिर परेशान भी होते हैं। क्यों याद आया, नहीं याद आना चाहिये... तो अपने आपको परेशान क्यों करते हो? बस मेरा बाबा। मेरेपन की अनेक हद की भावनायें एक ‘मेरे बाबा' में समा दो। खिलौने होते हैं ना, एक में एक, एक में एक होते हैं ना? एक खोलो तो दूसरा होता है, दूसरा खोलो तो और होता है। तो एक ‘मेरे बाबा' में सब समा लो। अन्दर बन्द कर दो। लेकिन एक होता है मुख से कहना ‘मेरा बाबा', एक होता है दिल से लग जाये ‘मेरा बाबा', जो दिल से मेरा मान लेते हैं वो कभी नहीं भूलते हैं। देखो, सम्बन्ध में भी अगर कोई नजदीक परिवार का शरीर भी छोड़ता है और ज्ञान नहीं है तो कितना मेरा-मेरा कहते हैं। उसकी चीज़ देखेंगे, उसका चित्र देखेंगे, और मेरा-मेरा कह परेशान होंगे। तो जाने वाले को भी याद करते हैं। पता भी है जाने वाला आना नहीं है फिर भी मेरा है तो याद आता है। तो जब दिल से मान लिया ‘मेरा बाबा' तो इससे बड़ी बात और है ही क्या? तो जो कॉमन शब्द बोलते हो, उसे ही उड़ती कला का साधन बना लो मैं और मेरा। पुरुषार्थ भी रमणीक करो। कई याद में बैठते हैं सोचते हैं “मैं ज्योति बिन्दु, मैं ज्योति बिन्दु'' और ज्योति टिकती नहीं, शरीर भूलता नहीं। ज्योति बिन्दु तो हैं ही लेकिन कौन-सी ज्योतिबिन्दु हैं! हर रोज़ अपना नया-नया टाइटल याद रखो कि ज्योति बिन्दु भी कौन है? रोज़ सर्व प्राप्तियों में से कोई न कोई प्राप्ति को याद करो। प्राप्तियों की लिस्ट तो बुद्धि में है ना? अगर नहीं हो, याद नहीं पड़ती हो तो अपने टीचर से लिस्ट ले लेना, अगर टीचर के पास भी नहीं हो तो मधुबन से ले लेना। तो रोज़ एक नया टाइटल परिवर्तन करो। आज नूरे रत्न हैं तो कल मस्तक मणि हैं... कितना अच्छा लगेगा। और हर रोज़ वैराइटी प्राप्तियों को सामने रखो बाप ने क्या दिया, क्या मिला! तो जब अविनाशी प्राप्ति सामने रहेंगी तो प्राप्ति से खुशी होती है ना? अगर मानों किसी को बहुत दर्द हो रहा है और कोई ऐसी प्राप्ति की सूचना आ जाये कि एक करोड़ लॉटरी में आ गये हैं तो दर्द याद रहेगा कि लॉटरी याद आयेगी? तो प्राप्ति दु:ख को, परेशानी को भुला देती है। तो रोज़ नई प्राप्ति की प्वॉइन्ट को याद रखो। अपने टाइटल याद रखो। टाइटल की सीट पर सेट होकर बैठो। छोटे बच्चे की तरह घड़ी-घड़ी नीचे नहीं आओ। जैसे छोटे बच्चे को कुर्सी पर बिठाओ तो नीचे आ जाता है। मन भी नटखट होता है, तो कितना भी सीट पर बिठाओ नीचे आ जाता है। तो अपने टाइटल के नशे की सीट पर अच्छी तरह से सेट होना आता है ना? प्लेन में भी देखो कोई नीचे नहीं आ जाये तो बेल्ट बांध देते हैं। तो दृढ़ संकल्प की बेल्ट सबके पास है! जब देखो थोड़ा हलचल में आते हैं तो बेल्ट बांध लो।
तो इस वर्ष की नवीनता यह है कि किसी का भी निगेटिव समाचार नहीं आयेगा। ठीक है? हाँ जी या ना जी? अभी ये आपका आवाज़ भी टेप में भर रहा है। आप सभी भी चाहते हो, सिर्फ बाप नहीं चाहता लेकिन आप सभी भी चाहते हो कि बस अभी-अभी फरिश्ते बन जायें, चाहते हो ना? (सभी ने हाँ जी की) हाँ बहुत अच्छी करते हो। हाँ सुनकर बाप भी खुश हो जाता है। परन्तु ऐसे-ऐसे पत्र आते हैं जो वेस्ट पेपर बॉक्स में डालने वाले होते हैं, ऐसे भी पत्र आते हैं जो पढ़ने की भी दिल नहीं होती। ल़िफ़ाफे से ही समझ जाते हैं कि ये ऐसा ही कोई समाचार है। अच्छे भी आते हैं। प्यार के भी आते हैं, उमंग के भी आते हैं, खुशी के भी आते हैं लेकिन फालतू भी आते हैं। वेस्ट मनी, वेस्ट टाइम, अपना भी और दूसरों का भी। आपके सेवाकेन्द्र पर ऐसे पत्र लिखने वाले हों तो उन्हें भी परिवर्तन करना। फिर ये वर्ष कौन-सा वर्ष होगा? मौज का वर्ष। फ़रिश्ता स्वरूप, फ़रिश्तों की दुनिया में रहने वाले। जहाँ देखो वहाँ फ़रिश्ता ही फ़रिश्ता। कोई फ़रिश्ता उड़ रहा है, कोई सन्देश दे रहा है, कोई नीचे धरनी पर आकर कर्मेन्द्रियों से कर्म कर रहा है ऐसे ही दिखाई दे। सृष्टि बदल जाये। जहाँ भी देखो फ़रिश्तों की दुनिया। दृष्टि परिवर्तन, वृत्ति परिवर्तन। अच्छा!
सेवा क्या करेंगे? इस वर्ष में कोई विशेष सेवा भी करेंगे? क्या करेंगे? मेला करेंगे, प्रदर्शनियाँ करेंगे, कॉन्फ्रेन्स करेंगे? ये तो करते ही रहते हो। नवीनता क्या लायेंगे? बापदादा का एक संकल्प अभी बच्चों ने पूरा नहीं किया है। बापदादा बार-बार इशारा देते हैं कि वर्तमान समय क्वान्टिटी तो बढ़ाते जाते हो लेकिन क्वालिटी अर्थात् वारिस, लिस्ट में तो आ जाता है इतने बढ़ गये, प्राइज़ भी ले ली ना। बापदादा ने सुना था कि चान्दी का गिलास भी गिफ्ट में ले लिया। वो भी अच्छी बात है। क्योंकि राजधानी में सब प्रकार के चाहिये। लेकिन अभी बहुत समय से वारिस क्वालिटी बहुत कम निकलती है। सम्पर्क वाले बढ़ रहे हैं, संख्या बढ़ रही है। वो भी ड्रामानुसार होनी ही है और आवश्यक है लेकिन ये मिस है। अब वारिस क्वालिटी प्रत्यक्ष करो। क्वान्टिटी को देखकर बापदादा भी खुश होते हैं लेकिन साथ-साथ इसके ऊपर भी अण्डरलाइन करो। और दूसरी बात, अभी ज्ञान सरोवर भी तैयार हो जाना है और इसे विशेष बनाया ही है सम्पर्क वालों को वारिस बनाने के लिये। बापदादा ने पहले भी कहा है कि ज्ञान सरोवर है ही सेवा के वृद्धि की खान। तो जब सेवा का स्थान तैयार हो ही रहा है और होना ही है, हुआ ही पड़ा है तो सेवा भी तो करेंगे? कि सिर्फ देखकर खुश होंगे कि बहुत अच्छा बना, बहुत अच्छा बना? तो एक ऐसा विशाल प्रोग्राम करो - जैसे कोई विशेष स्थान बनाते हैं तो विशेष स्थान की सेरीमनी में अलग-अलग देश वाले सभी, या पानी डालते हैं, या मिट्टी डालते हैं। तो आप पानी या मिट्टी तो नहीं डलवायेंगे लेकिन सारे विश्व में एक भी स्टेट खाली नहीं रहे, सब तरफ के आवें, चाहे विदेश, चाहे देश की जो भिन्न-भिन्न स्टेट हैं उसका एक-एक जरूर आवे। तो इन्टरनेशनल इसको कहेंगे ना। या दो चार लण्डन के आ गये, अमेरिका का आ गया तो इन्टरनेशनल हो गया क्या? तो इन्टरनेशनल प्रोग्राम बनाओ। अब डबल स्थान हो गया ना। नहीं तो सोचते हैं स्थान चाहिये, वो चाहिये, सैलवेशन चाहिये। तो अभी ज्ञान सरोवर का स्थान भी मिला है। इसलिये इस वर्ष में ऐसा देश-विदेश दोनों मिलकर, दोनों की राय से, दोनों के प्लैन से, दोनों के हाँ जी से, दोनों की समानता से ऐसा प्रोग्राम बनाओ जो विदेश वाले भी कहे कि हाँ, हमारे योग्य है और देश वाले भी कहें कि हमारे योग्य है। विदेश की भी विधि और देश की भी विधि दोनों विधि को सम्मिलित करके एक-दो को आगे रखकर, देश विदेश को आगे रखे, विदेश देश को आगे रखे, और ऐसा अच्छा प्रोग्राम बनाओ जो कोई एक देश भी वंचित नहीं रह जाये। विदेश वाले बताओ, हो सकता है? होना ही है ना! देश वाले बताओ, करना है? अच्छा, इनका (दादी का) तो संकल्प है। दादी को संकल्प बहुत आते हैं, सेवा के अच्छे संकल्प नींद नहीं करने देते हैं। अच्छा है। शुद्ध संकल्पों से नींद की कमजोरी का प्रभाव नहीं पड़ता। वैसे नींद खुल जाये तो कमजोरी या कमी महसूस होती है। तो अच्छा है, सबकी मिट्टी नहीं लाना लेकिन सबके विचारों की मिट्टी इकट्ठी करेंगे। दुनिया वाले तो मिट्टी, मिट्टी कर देते हैं ना, मिट्टी मिट्टी में मिल जाती है। और ये सभी के विचार, सब तरफ विश्व में आवाज़ फैलायेंगे। कोई भी देश वंचित क्यों रह जाये। और अगर एक कोई आता है तो अपने देश में अपने अखबार में तो डालेगा। तो हरेक विश्व के चारों कोनों की सेवा भी हो जायेगी।। लेकिन बापदादा इस वर्ष देश-विदेश की विधि का मिला हुआ प्रोग्राम चाहते हैं। विदेश वाले भी पीछे नहीं हटें और देश वाले भी पीछे नहीं हटें। विचार भी तो मिलाने हैं ना। एक-दो को कहो पहले आप। अच्छा हो सकता है ना।
तो ज्ञान सरोवर का ऐसा प्रोग्राम बनाओ जो विश्व में ऐसा सेवा समाचार किसी स्थान का नहीं हो। चाहे यू.एन. हो या उससे भी बड़ा स्थान हो, उससे भी बड़ा हो जाये। इसमें सबका तन भी लगा है, मन भी लगा है और छोटे बच्चों से लेकर बूढ़ों तक सभी का धन भी लगा है। तो जैसे सबके सहयोग की अंगुली लगी है तो सेवा में भी सबके सहयोग की अंगुली लगनी ही है। प्लैन देते रहो लेकिन प्लैन बनाने के टाइम, देने के टाइम, मालिक बनकर दो और जब फाइनल मैजारिटी करे तो बालक बन जाना। बालक क्या करता है? हाँ जी। और मालिक क्या कहता है? नहीं, ऐसा करो। तो बालक और मालिक। प्लैन देना अच्छा है लेकिन प्लैन होना ही चाहिये, ये सोच के नहीं। जो होगा वो अच्छा। किनारा नहीं करो, प्लैन दो लेकिन बालक भी बनो, मालिक भी बनो। बनाने के टाइम मालिक और फाइनल के टाइम बालक। बालक और मालिक बनना आता है? कि सिर्फ मालिक बनना आता है? क्योंकि सभी होशियार हो गये हैं ना। मालिक जल्दी बन जाते हैं। अभी समझा, नये वर्ष में क्या करना है? सेवा भी करनी है और सेवा के पहले स्वयं परिवर्तक। दोनों ही चाहिये ना!
तो नया वर्ष मना लिया। मनाना अर्थात् बनना और बनाना। यही मनाना है, न कि सिर्फ डांस कर लिया तो मनाया। वो भी करो, डांस भी बापदादा को अच्छी लगती है। लेकिन मन की भी डांस करो। बापदादा सब गीत भी सुनते हैं, डांस भी देखते हैं, कोई प्रोग्राम मिस नहीं करते। क्यों? देखो, कोई भी प्रोग्राम आप करते हो तो पहले गीत में बाप को याद करते हो ना? जब बाप को याद करेंगे तो आना ही पड़ेगा, देखना ही पड़ेगा। जब प्रोग्राम करते हो तो बापदादा को भी अच्छा लगता है। अच्छा!
हॉस्टल की कुमारियों से:- हॉस्टल की कुमारियों को देखकर आदि स्थापना का समय याद आता है। पहले तो ऐसे ही हॉस्टल खोली थी ना। पहले जब ब्रह्मा बाप ने, हॉस्टल अथवा गुरूकुल वा बोर्डिंग खोला तो फाउण्डेशन निकले। आज यज्ञ के जो भी निमित्त फाउण्डेशन हैं, वो सभी बोर्डिंग के ही तो हैं। चाहे टीचर हैं, चाहे स्टूडेण्ट हैं, लेकिन हैं तो आदि स्थापना के ना। तो जहाँ भीC हॉस्टल है वहाँ से ऐसे फाउण्डेशन तैयार होने चाहिये। समझा? सिर्फ कॉलेज-स्कूल में पढ़ लिया, सेन्टर सम्भाल लिया। नहीं, इतना बड़ा कार्य करना है। अच्छा है, साधन अच्छा है।
डबल विदेशी भाई-बहनों से अव्यक्त बापदादा की मुलाकात
यू.के.-यूरोप:- यू.के. और यूरोप वाले दोनों इकट्ठे हाथ उठाओ। सेकेण्ड में देखो, हाथ नीचे कर लिये। ऐसे मन की ड्रिल भी सेकेण्ड में। अभी-अभी उड़ती कला, अभी-अभी कर्मयोगी। हाथ की एक्सरसाइज़ अच्छी है, मन की एक्सरसाइज़ भी ऐसे है? तो यू.के. या यूरोप की विशेषता क्या है? यू.के. विदेश सेवा के वृक्ष का बीज है। तो बीज की विशेषता क्या होती है? बीज में पानी दे दो तो सारे झाड़ के पत्ते-पत्ते को पानी पहुँच जाता है। तो आज भी विदेश के वृक्ष की सेवा का फाउण्डेशन यू.के. निमित्त है, विदेश के सभी देशों को पालना का पानी कहाँ से मिलता है? यू.के. से ना! तो यू.के. अपना बीज का कार्य अच्छा कर रहे हैं। ऐसे नहीं, सिर्फ एक, लेकिन सभी सहयोगी हो। आप सब भी यू.के. वाले या यूरोप वाले सहयोगी हो ना? दादियों को मदद देते हो? कि कहते हैं कि दादी का काम दादी जाने। ऐसे तो नहीं कहते ना! भुजायें अच्छी मिली है ना! तो बापदादा बीज को सदा शक्तिशाली देख हर्षित होते हैं। और दूसरी यू.के. या यूरोप की विशेषता यह है कि सेवा में तन-मन-धन तीनों में एवररेडी हैं। कोई भी कार्य जो साधारण सोचने में लगता - कैसे होगा लेकिन यू.के. की विशेषता है कि कोई भी कार्य दृढ़ संकल्प और सहयोग के अंगुली से सहज हो जाता है। सहज हो जाता है ना! म्युज़ियम बनने के पहले करने वाले तैयार है ना! तो इसको कहा जाता है विशेषता। सर्व के सहयोग की अंगुली शक्तिशाली है। अगर कोई हिम्मत भी दिलाते हैं कि हाँ कर लो, कर लो, कर लो तो वो हिम्मत भी सहयोग की अंगुली है। लेकिन रिजल्ट में देखा गया है कि तन-मन-धन तीनों में सदा जी हाँ करने वाले हैं, सोचने वाले नहीं हैं। इसलिये सब कार्य सहज हो जाता है। अगर सोचने वाले होते हैं ना तो वो सूक्ष्म वायब्रेशन, वो अंगुली कम हो जाती है। तो सर्व के अंगुली से सफलता होती है। अगर थोड़ा भी सोचने वाले होते हैं कि कैसे होगा, क्या होगा तो संगठन की स्नेह की अंगुली न होने के कारण सफलता में कमी पड़ जाती है। इसलिये यू.के. वा यूरोप वालों को विशेष और सर्व विदेश के सहयोगी आत्माओं को कार्य में आगे बढ़ने की मुबारक हो। समझा!
आस्ट्रेलिया - बापदादा जब आस्ट्रेलिया का नाम सुनते हैं तो नाम सुनकर आस्ट्रेलिया का बचपन बहुत याद आता है। आस्ट्रेलिया और न्युज़ीलैण्ड वाले हाथ उठाओ। आस्ट्रेलिया में बहुत अच्छे-अच्छे रत्न पैदा हुए। आस्ट्रेलिया की ये विशेषता रही कि यू.के. में फिर भी मिक्स हैं, भारतवासी भी हैं तो विदेशी भी हैं, मिक्स क्लास है लेकिन आस्ट्रेलिया की सेवा ने विदेशियों की संख्या को काफी बढ़ा दिया। और क्लास की रौनक, विदेश की आत्माओं के क्लास की रौनक सबसे नम्बरवन आस्ट्रेलिया की रही। कोई थोड़ा बहुत आते-जाते हैं, चक्कर लगाते हैं लेकिन फाउण्डेशन तो निमित्त बने। और जाने वाले भी कहाँ जायेंगे? आना तो है ही। सिर्फ चक्कर लगाने जाते हैं। फिर जब चक्कर पूरा हो जाता है तो कहते हैं बाबा मैं आपका ही हूँ, आपका ही रहूँगा। और आस्ट्रेलिया की विशेषता ये है कि वहाँ प्लैंनिंग बुद्धि बहुत अच्छी है। सेवा के प्लैन बनाने में और सेवा में सहयोग देने में, बड़ी-बड़ी इन्वेन्शन को प्रैक्टिकल में लाने में प्लेन बुद्धि भी हैं और सहयोगी भी हैं। प्लेन बुद्धि होकर प्लैन को प्रैक्टिकल में लाने में और थोड़ा सिर्फ अण्डरलाइन करो। समझा? थोड़ा अण्डरलाइन करना है प्लैनिंग के साथ प्लेन बुद्धि। जब प्लेन बुद्धि होकर प्लैन बनाते हैं तो प्लेन में सर्व शक्तियाँ भर जाती हैं और जहाँ सर्वशक्तियाँ होती हैं वहाँ सफलता भी निर्विघ्न 100 प्रतिशत होती है। तो आस्ट्रेलिया के अच्छे-अच्छे रत्न बापदादा के नज़र में सदा रहते हैं। सफलता स्वरूप भी हैं, सेवा में आगे बढ़ने वाले भी हैं, बढ़ाने वाले भी हैं। तो आस्ट्रेलिया की विशेषता भी कम नहीं। आस्ट्रेलिया को बापदादा सदा आगे बढ़ने वालों की नज़र से देखते हैं। और तीसरी विशेषता है कि पाण्डव और शक्तियाँ दोनों ही सेन्टर खोलने के निमित्त हैं। पाण्डव भी शक्तियों से कम नहीं हैं। पाण्डव भी निमित्त बनने में अच्छे सहयोगी हैं। वहाँ जायेंगे तो क्या देखेंगे? ये पाण्डवों का सेन्टर है, वो शक्तियों का सेन्टर है और दोनों की साथ-साथ रेस चल रही है। समझा? आस्ट्रेलिया वालों ने अपनी विशेषतायें सुनी? अच्छा।
साउथ एशिया - एशिया की भी विशेषता है। हर स्थान की विशेषता है। एशिया भारत के नजदीक है। तो एशिया का आवाज़ भारत में जल्दी पहुँचेगा। भारत के कुम्भकरण को जगाने में एशिया सहज कार्य कर सकता है। जैसे यू.के., यूरोप, अमेरिका में क्रिश्चियन्स ज्यादा निकले हैं, ऐसे एशिया में बौद्ध धर्म वाले ज्यादा निकले हैं। वो क्रिश्चियन्स और ये बौद्धी। तो देखो दूसरे धर्म का विस्तार ज्यादा एशिया में है। वैसे भी बुद्ध धर्म को भारत से कनेक्ट ज्यादा करते हैं। तो एशिया की विशेषता और भी है कि एक ही एशिया में ऑफिशियल प्रेज़ीडेन्ट सम्पर्क वाला है। मलेशिया का प्रेजीडेन्ट, फिलिपिन्स का प्रेजीडेन्ट होमली है ना और संख्या भी अच्छी है। वैसे तो हर स्थान की संख्या वृद्धि को प्राप्त कर रही है। सभी अच्छे उमंग-उत्साह से बढ़ रहे हैं। अभी सिर्फ एशिया को क्या करना है कि जो वहाँ निमित्त बने हुए हैं, उन्हों को भारत तक पहुँचाना है। अभी भारत तक नहीं पहुँचाया है। ये एडीशन करना है। जो विशेष सेवा के निमित्त हैं, वो सभी मिलकर जो भी सम्पर्क में हैं उन्हें समीप लाओ। जितना देश समीप है उतना आवाज़ भी समीप लाओ। और ऐसा हो जो आवाज़ को जल्दी पहुँचा सके। तो अभी जल्दी-जल्दी भारत तक आवाज़ पहुँचाओ। अभी भारत तक नहीं पहुँचा है। अच्छा!
मॉरिशियस:- मॉरिशियस की विशेषता ही ये है कि मॉरिशियस के स्टूडेण्ट अच्छे एकरस होकर चलने वाले हैं। थोड़ा बहुत नीचे-ऊपर होता है, वो कोई बात नहीं। लेकिन मैजारिटी देखा जाता है कि मॉरिशियस के स्टूडेण्ट ज्यादा हलचल में नहीं आते। तो मॉरिशियस की विशेषता - एक तो हलचल कम है, अचल ज्यादा हैं और दूसरा सहयोगी सहज बन जाते हैं, चाहे आई.पी. हो, चाहे वी.आई.पी. हो लेकिन सहयोग देने में अच्छे निमित्त बन जाते हैं। आई.पी. या वी.आई.पी. की सेवा में मेहनत नहीं लगती। इज़ी धरनी है। खिटपिट वाली धरनी नहीं। मेहनत लेने वाली धरनी नहीं। और इसीलिये मॉरिशियस भी भारत के बहुत नजदीक है। मॉरिशियस वाले तो भारत की फिलॉसॉफी को भी मानते हैं। इसलिये मॉरिशियस की आवाज़ भी भारत में जल्दी पहुँच सकती है। प्रत्यक्षता करने में पहले झण्डा किसका पहुँचेगा? मॉरिशियस का या एशिया का? मॉरिशियस का पहले पहुँचेगा? एशिया वाले भी दौड़-दौड़ कर फ्लैग ले आयेंगे और मॉरिशियस वाले भी ले आयेंगे। सब विदेश की तरफ से प्रत्यक्षता का झण्डा भारत में आयेगा। तो अच्छा है मॉरिशियस वालों की भी सहज सफलता है। ये विशेष धरनी को और ब्राह्मण सेवाधारियों को वरदान है।
अफ्रीका:- अफ्रीका की विशेषता ये है जो ये देश सदा ही भय के देश हैं और भय में निर्भय रहना, ये अफ्रीका वालों की विशेषता है। बापदादा सदा बिल्ली के पूंगरों की कहानी याद करते हैं, कि चारों ओर आग के बीच में बिल्ली के पूंगरे सेफ रहे। तो जैसे अफ्रीका के सरकमस्टांश हैं, उस सरकमस्टांश के अनुसार जो भी बाप के बच्चे हैं वो हिम्मत और निर्भयता में बहुत अच्छे ए-वन हैं। कमाल है उन्हों की। कैसी भी हालत हो लेकिन सेवा को छोड़ते नहीं। पक्के हैं। तो बापदादा उन्हों के निर्भयता और हिम्मत को देखकरके सदा छत्रछाया भी देते और मुबारक भी देते हैं कि कमाल के बच्चे हैं। कैसी भी हालत हो लेकिन परिस्थिति में स्व स्थिति का सबूत देने वाले हैं। इसलिये जो आने वाले हैं उन्हों में भी हिम्मत भरते रहते हैं। अगर निमित्त हलचल में आ जाये तो आने वाले भी हलचल में आ जाये और ये देश वंचित रह जाये। लेकिन बच्चों की कमाल है जो अचल रह करके हिम्मत रखी है। सदा आगे बढ़ते रहते हैं और सेवाकेन्द्र खोलते जाते हैं, लोग भागते जाते हैं और ये खोलते जाते हैं। तो ये विशेषता है। और जो नाम है कि बाप विश्व कल्याणकारी है, तो काले हो या गोरे हो लेकिन कालों को भी सफेद बनाना ये भी विशेष सेवा है। विश्व कल्याण में ये भी तो होने चाहिये ना। अगर ये नहीं हो तो विश्व कल्याण तो नहीं कहेंगे ना। साउथ अफ्रीका भी देखो सेवा के उमंग के कारण स्वतन्त्र हो गया ना। तो ये हिम्मत की कमाल है। साउथ अफ्रीका में भी सेवा का चांस अभी सहज मिल गया ना। तो ये किसने हिम्मत रखी? बच्चों ने हिम्मत रखी और स्वतन्त्र हो गये। आपकी सेवा ने देश को स्वतन्त्र कर दिया। तो अफ्रीका की रिजल्ट अच्छे उमंग-उत्साह वाली है। सबसे हिम्मत में नम्बरवन है। समझा? अफ्रीका वाले हिम्मत वाले हैं? डरते तो नहीं हैं ना? अच्छा, सबूत देने वाले हैं। तो सबूत देने वाले को बापदादा सपूत कहते हैं। जो सपूत होता है वो सबूत देता है। तो अच्छा बढ़ रहा है और बढ़ता रहेगा। समझा? श्री लंका भी छोटा है लेकिन कमाल कर रहा है।
जापान:- जापान में सेवा की मेहनत है लेकिन मेहनत से डरने वाले नहीं। कोई-कोई धरनी मेहनत वाली होती है। तो जापान में मेहनत ज्यादा करनी पड़ती है लेकिन फाउण्डेशन पक्के हो गये हैं ना। तो फाउण्डेशन में मेहनत लगती है, अभी फाउण्डेशन अच्छे हैं इसलिये अभी सहज होना चाहिये। तो जो सेवा के फाउण्डेशन निमित्त बनते हैं वो बापदादा के सदा सामने रहते हैं। तो जापान भी अच्छा प्रोग्रेस कर रहा है। अच्छा।
अमेरिका:- अमेरिका की भी विशेषता ये है कि अमेरिका में विस्तार बहुत अच्छा किया है। अमेरिका के चारों ओर अच्छे-अच्छे सेवास्थान खुले हैं, चल रहे हैं। तो अमेरिका ने विस्तार अच्छा किया है। कोने-कोने में आवाज़ फैलाया है। एरिया के हिसाब से सबसे ज्यादा सेवाकेन्द्र अच्छी हिम्मत से खोल रहे हैं और खुलते रहेंगे। तो जैसे अमेरिका देश का विस्तार है ना, तो सेवा का भी विस्तार अच्छा किया है। और हर स्थान में बाप के बच्चे निकल ही आते हैं। चाहे कहाँ थोड़े हैं, कहाँ ज्यादा हैं लेकिन आवाज़ तो पहुँच गया ना। और दूसरी अमेरिका की विशेषता ब्रह्माकुमारी ईश्वरीय विश्व विद्यालय, उसको प्रसिद्ध करने के लिये यू.एन. के द्वारा अमेरिका ही तो निमित्त है ना। तो अमेरिका, विश्व विद्यालय को, कार्य को सहज प्रत्यक्ष करने के निमित्त बना हुआ है। और जो भी सुनते हैं तो सब आश्चर्य खाते हैं, ब्रह्माकुमारियाँ यू.एन. तक पहुँच गई! तो ये भी विशेष सेवा का साधन है। और साधन बनाने के निमित्त अमेरिका ही है। तो अमेरिका का विस्तार चारों ओर नाम फैलाने में अच्छा आगे बढ़ रहा है। अच्छा।
रशिया:- आपके चित्रों में भी रशिया और अमेरिका विशेष दिखाया हुआ है। एक बिल्ला बिचारा कमजोर हो गया है। लेकिन रशिया वालों ने, जो एक भाग सेवा का रहा हुआ था वो भाग पूरा कर लिया। और हिम्मत है इन्हों की जो इकॉनॉमी डाउन होते हुए भी ये स्वयं डाउन नहीं होते। हिम्मत नहीं हारते। फिर भी देखो इतना ग्रुप पहुँच जाता है। समाचार सुनो तो कहते हैं बड़ा मुश्किल है, बड़ा मुश्किल है फिर ग्रुप भी पहुँच जाता है। इसको कहा जाता है सच्ची दिल पर साहेब राजी। कहाँ न कहाँ से पहुँचने की हिम्मत अच्छी रखते हैं। नम्बर पीछे नहीं हटते। और भी अगर संख्या मिल जायेगी तो आ जायेंगे। तो इकॉनॉमी होते हुए एकनामी में होशियार हैं। इकॉनॉमी की परवाह नहीं करते लेकिन एकनामी बनने में आगे बढ़ते हैं। तो अच्छा है, बापदादा का नाम बाला करने में सहयोगी हैं, स्नेही हैं और सदा आगे बढ़ते रहेंगे।
भारत:- अच्छा, भारत तो पहले है, विदेश वाले भारत में ही तो आये हैं। लेकिन हैं भारतवासी। भारतवासी हो या विदेशी? असली तो भारतवासी हो ना? ये तो सेवा के लिये गये हो। ओरिज़नल आत्मा के संस्कार कौन-से हैं? विदेश के या भारत के? कि विदेश का कल्चर अलग है? पहले बहुत कहते थे, पहले विदेशियों की ये कम्पलेन आती थी, कि विदेशियों का कल्चर और है, भारत का कल्चर और है। अभी परिवर्तन हो गया है। अभी ऐसी कम्पलेन कोई बिरले की आती है। अभी बदल गये हैं, अभी संस्कार इमर्ज हो गये हैं कि मुश्किल लगता है भारत का कल्चर? मुश्किल तो नहीं लगता? तो भारत वालों की विशेषता है सदा डबल विदेशियों की मेहमान निवाजी करना। आने और जाने वाले को भी मेहमान कहा जाता है। ऐसे तो मालिक हो लेकिन आते हो और जाते हो तो उस हिसाब से मेहमान भी हो। बापदादा भी मेहमान होकर आता है। तो बापदादा भी भारत का मेहमान हो गया ना! विदेश का मेहमान बना? नहीं बना। भारत के ही मेहमान बने। तो भारत की विशेषता है कि भगवान भी भारत में ही मेहमान होकर आते हैं। और आप सभी को राज्य-भाग्य भी भारत वाले देंगे ना। भारत में महल बनायेंगे या विदेश में? कहाँ महल बनायेंगे? भारत में बनायेंगे ना? तो देखो, भारत कितना बड़े दिल वाला है। जो भगवान को भी मेहमान बना सकते हैं वो कितने बड़े हो गये। तो भारत की विशेषता है एक तो सभी की बड़े दिल से मेहमान निवाजी करते हैं और दूसरा भारत स्थापना के निमित्त है। अगर भारत की बहनें विदेश सेवा में नहीं जाती तो आप लोग कैसे आते? विदेश सेवा के अर्थ भारत की बहनें निमित्त बनी ना। तो भारत स्थापना के निमित्त है। और भारत ही आप सबको राज्य के साथी बनाने के निमित्त है। पहले आपको महल देंगे, पहले आपको रखेंगे। भारत फऱाख दिल है, ‘पहले आप' करने वाले हैं। ‘मैं-मैं' करने वाले नहीं हैं। भारत सदा ही दान-पुण्य करने में होशियार है। तो औरों को आगे बढ़ाना ये पुण्य है। अच्छा।
(विदेश से सिन्धी भाई-बहिनों का ग्रुप आया है) सिन्धी ग्रुप हाथ उठाओ। यह ब्रह्मा बाप के देश के साथी हैं। तो नजदीक के साथी हो। सिर्फ आये थोड़ा देरी से हो। लेकिन लास्ट सो फास्ट, फास्ट सो फर्स्ट। ऐसे है ना? पीछे रहने वाले नहीं हैं। स्नेह और सहयोग में सिन्धी ग्रुप पहला नम्बर जाता है। बाकी एक बात एड करनी है। तीन शब्द हैं - एक सहयोग, दूसरा स्नेह, तीसरा शक्ति। तो स्नेह और सहयोग में सभी पास हो। अभी शक्ति रूप में थोड़ा और आगे बढ़ना है। शक्ति रूप बनेंगे ना तो राजधानी में भी नम्बर लेंगे। अभी सभी आपको स्नेह की दृष्टि से देखते हैं कि ये देश के साथी हैं, बाबा के देश के साथी हैं। अभी शक्ति रूप बनने से और सिन्धियों को सहज जगायेंगे। अभी स्नेह रूप का अनुभव तो सुनाते हो। शक्ति रूप का अनुभव सुनाओ, कि इतनी शक्ति आ गई है। धारणा की शक्ति, चलने की शक्ति। अभी ये एड करना है। बाकी बापदादा को पसन्द हो, अच्छे लगते हो। अच्छा। एक-एक कम से कम कितनों को जगायेंगे? एक दीपक कितनी दीपमाला बनायेंगे? (लाखों की!) वाह! अच्छी हिम्मत रखी है! हज़ार भी नहीं, लाख। मुख में गुलाबजामुन। अच्छा है और ये तो जरूर है कि एक आता है तो अनेकों का वायुमण्डल बदलता है। चाहे आने में देरी करते हैं लेकिन वायुमण्डल तो बदलता ही है। वायुमण्डल बदल रहा है ना? अभी अच्छा-अच्छा सब कहने लगे हैं। अच्छा बनने की हिम्मत नहीं है लेकिन अच्छा है, यहाँ तक तो पहुँचे हैं ना? पहला कदम तो हुआ है, धरनी तो बनी है ना। अभी और बीज डालकर फल निकालना। अभी जहाँ तहाँ देखने में आता है ये वायुमण्डल बदलता जाता है। पहले आना नहीं चाहते थे, अभी आना चाहते हैं लेकिन यहाँ से मना होती है। फर्क तो पड़ गया ना। आप लोग आते हैं, सुनाते हैं तो दूसरे भी कहते हैं ना कि हमको भी ले चलना, हमको भी ले चलना। तो फर्क आ गया ना। अभी माला तैयार करके आना। अभी दूसरी बारी आओ तो माला तैयार करके आयेंगे या कंगन तैयार करके आयेंगे? (माला) माला तैयार करके आयेंगे। अच्छा है, हिम्मते बच्चे मददे बाप। सदा मददगार है बाप। सिर्फ हिम्मत का एक कदम बढ़ाओ और बाप हज़ार कदम बढ़ाने के लिये बंधा हुआ है। बाप को भी बांधने वाले हो ना। स्नेह की रस्सी में बांधने में होशियार हो। अच्छा! बाप को शुद्ध दिल वाले प्रिय लगते हैं और बाप आपको प्रिय लगता है, ऐसे? जादू तो नहीं लग गया। यह जादू फायदे वाला है, नुकसान वाला नहीं। तो अच्छी तरह से जादू लगा? थोड़ा तो नहीं लगा जो वहाँ उतर जाये। जादू माना परिवर्तन। तो परिवर्तन हो ही गया ना। इस जादू से खुश हो ना, घबराते तो नहीं हो?
सभी चैरिटी बिगेन्स एट होम सिद्ध करने वाले बने हो। नहीं तो जब ये सेवा करते हैं तो सभी लोग पूछते हैं - सिन्धी लोग क्यों नहीं आते? तो आप कहेंगे आते हैं ना, तो सहयोगी बन गये ना। टूलेट में नहीं आये, लेट में आये। फिर भी लक्की हैं। (सभी हंसते हैं) अच्छा है रोते तो नहीं हैं ना। लोग तो रुलाते हैं, आप हंसाते हो तो अच्छा है ना। रोने वाले को भी हंसा दो। परवाह नहीं करो, हंसने दो। फिर ये हंसने वाले आपको नमस्कार करने वाले हैं। आज हंसते हैं, कल नमस्कार करेंगे। अच्छा!
दुबई - अच्छा, गुप्त सेवाधारी। अननोन बट वेरी वेल नोन। राज्य के हिसाब से गुप्त रूप में सेवा कर रहे हैं और अविनाशी रत्न हैं, चाहे कितनी भी हलचल हो जाये लेकिन अविनाशी रत्न होने के कारण अचल हैं। गुप्त में भी आगे बढ़ रहे हैं। दुबई वाले पक्के हैं ना! हिलने वाले तो नहीं है ना? तो अच्छी हिम्मत रखने वाले हैं। इसीलिये बापदादा की स्पेशल मदद और मुबारक। अच्छा!
नया वर्ष मनाया कि 12 बजे मनायेंगे? आपकी तो हर घड़ी नई है ना? कि 12 बजे नया होगा? हर घड़ी नई है, हर सेकेण्ड नया दिन है। जब भी मनाओ आपके लिये नया वर्ष है। जब युग ही नया है तो नवयुग स्थापन करने वालों का सब नया है कि 12 बजे नया होगा? आपके लिये नया है ना। क्योंकि आप नये बन गये ना! वो तो घण्टा बजायेंगे। अभी 12 घण्टे बजा दो इसमें क्या है? अच्छा!
चारों ओर के नवयुग के राज्य अधिकारी श्रेष्ठ आत्माओं को सदा स्व परिवर्तन और विश्व परिवर्तन के निमित्त विशेष आत्माओं को, सदा पुरुषार्थ में नवीनता-श्रेष्ठता लाने वाले सर्व स्नेही आत्माओं को, सदा बाप का नाम प्रत्यक्ष करने वाले सपूत आत्माओं को, सदा ‘मेरा' और ‘मैं' को यथार्थ भाव और अर्थ में लाने वाले सहजयोगी आत्माओं को बापदादा का याद-प्यार और नमस्ते।
अच्छा, चारों ओर के न्यु वर्ष के कार्ड बहुत आये। वैसे तो कार्ड खरीद करते हो और बापदादा के पास पहले ही आपकी मुबारक पहुँच जाती है। कार्ड में लिखने के पहले बाप के दिल में लिख जाती है। लेकिन फिर भी सुहेज मनाने के लिये भेज देते हैं। तो बापदादा सभी देश-विदेश के न्यु वर्ष के पत्र वा कार्ड भेजने वालों को विशेष पद्मगुणा मुबारक के साथ सदा उड़ने वाले और उड़ाने वाले, सदा सहज विश्व परिवर्तक बनने वाले, इस स्वरूप से पद्मगुणा मुबारक दे रहे हैं, मुबारक हो! मुबारक हो!!
दादी जी से - आपके संकल्प पूरे हो रहे हैं ना! अच्छा है, जो निमित्त बनता है उसको टचिंग होती है। ब्रह्मा बाप के समान हो। ब्रह्मा बाप को नींद आती थी क्या? तो निमित्त बनने वालों को निमित्त बनने के कारण संकल्प अच्छे आते ही हैं। अच्छा है, आपके सहयोगी भी अच्छे-अच्छे हैं। आदि रत्नों का ग्रुप अच्छा है। फाउण्डेशन जो होते हैं, फाउण्डेशन के पिल्लर्स अगर मजबूत होते हैं तो चाहे कितना भी कोई हिलाये, अगर पिल्लर्स पक्के हैं तो सब सहज होता है। (दादियों से) बापदादा आप निमित्त पिल्लर्स का ग्रुप देखकर खुश होता है। मजबूत पिल्लर हैं ना? हिलने वाले हैं ही नहीं। चाहे कितना भी कोई पिल्लर को हिलावे लेकिन अविनाशी हैं। अच्छा है, भारत और विदेश दोनों ही सेवा-स्थान और सेवा में रेस कर रहे हैं। एडवांस मुबारक हो। जो सेवा कर रहे हैं उन्हों को विशेष याद-प्यार देना। अच्छा है। क्या नहीं हो सकता! जो चाहे वो कर सकते हैं। (आप जो चाहे करा सकते हो) और बच्चे निमित्त बन सकते हैं। अच्छे हैं, चारों ओर के, चाहे देश, चाहे विदेश, लेकिन सहयोगी बहुत अच्छे हैं। और समय पर सहयोगी बनने के कारण, जो समय पर सहयोगी होते हैं उनको एक का पद्मगुणा फल मिल जाता है। स्थान अपना साधन लेकर आता है। ज्ञान सरोवर का देखकर समझते हो ना, इतना कैसे होगा, क्या होगा, लेकिन सहज बढ़ता जाता है, होता जाता है। प्रैक्टिकल सभी ब्राह्मणों की अंगुली उमंग-उत्साह से पड़ रही है इसीलिये सहज हो रहा है। खर्चा भी खूब हो रहा है और सहयोग भी खूब मिल रहा है, मिलता रहेगा। अभी आगे भी तो सहयोग देना है या मकान बन गया, बस। (अभी दादी को मेला करना है) मेला तो उसके आगे कुछ भी नहीं है। वो तो सहज है। ये करोड़ों की बात है वो लाखों की बात है। फर्क है ना! अच्छा है, जो कार्य हो जाये और जितना तुरन्त हो जाये उतना अच्छा है।
(12 बजे रात तक भाई-बहिनों ने खूब गीत गाये फिर बापदादा ने सभी बच्चों को नये वर्ष (1995) की मुबारक दी)
चारों ओर के सभी बच्चों को नये वर्ष की पद्म पद्म पद्म गुणा मुबारक हो। इस नये वर्ष में यही दृढ़ संकल्प करो कि सदा खुश रहेंगे और सभी को दिलखुश मिठाई बांटेंगे। कैसी भी परिस्थिति हो, परिस्थिति चली जाये लेकिन खुशी नहीं जाये। कोई आपको दु:ख देने की बातें भी करे लेकिन हम सदा सुख देंगे, सुख लेंगे - इस दृढ़ प्रतिज्ञा के साथ नये वर्ष को आरम्भ किया? तो पुरानी बातों को, पुरानी दुनिया की बातों को विदाई दी? वापस तो नहीं लेंगे? तो सदा विदाई की बधाइयाँ हो, मुबारक हो। अच्छा!