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17 Feb 2023
"सम्पूर्ण पवित्रता का व्रत रखना और मैं पन को समर्पित करना ही शिवजयन्ती मनाना है"
17 February 2023 · हिंदी
17-02-2023 मधुबन अव्यक्त बापदादा ओम् शान्ति 17-02-2023
प्राणेश्वर शिव भोलानाथ बाप के अति स्नेही, सदा पवित्रता का व्रत ले, मैंपन को भी समर्पित करने और कराने वाली, सदा उमंग-उत्साह में रह बेहद सेवाओं में तत्पर निमित्त टीचर्स बहिनें तथा सर्व श्रेष्ठ ब्राह्मण कुल भूषण भाई बहिनें, ईश्वरीय स्नेह सम्पन्न मधुर याद के साथ 87 वीं त्रिमूर्ति शिव जयन्ती सो गीता जयन्ती सो ब्राह्मणों की जयन्ती की सबको बहुत-बहुत बधाई हो।
हम सबके प्राणप्यारे शिव भोलानाथ बाबा ने विश्व परिवर्तन के लिए आते ही बेहद रूद्र ज्ञान यज्ञ की स्थापना की और उसकी सम्भाल के लिए ब्राह्मण बच्चों को निमित्त बनाया, इसलिए बाप के साथ-साथ ब्रह्मा बाप का और हम ब्राह्मणों का भी यही अलौकिक जन्म दिन है, जो हर वर्ष सभी खूब धूमधाम से मनाते हैं। इस बार भी पूरे भारत में सभी बहुत उमंग-उत्साह के साथ यह पर्व मना रहे हैं। हर स्थान पर सेवाओं का विशाल यज्ञ रचा हुआ है। अनेक स्थानों पर शिव दर्शन मेले, अमरनाथ गुफा व 12 ज्योर्तिलिंग दर्शन, सम्मेलन, सभायें, प्रभातफेरी आदि के साथ शिवबाबा का ध्वज फहराकर सभी को परमात्मा पिता के दिव्य अवतरण का सन्देश दे रहे हैं। मधुबन में तो सभी मुख्य स्थानों पर शिवबाबा का झण्डा फहरा रहे हैं। प्यारे अव्यक्त बापदादा ने भी हर एक बच्चे को पदमगुणा खुशियों की थालियां भर-भर करके मुबारक दी है और अपने भक्तों की भी महिमा करते हुए बाबा कहते बच्चे, भक्त कितनी भावना के साथ व्रत उपवास रखते हैं, जागरण करते हैं। वह एक दिन का व्रत रखते और आप बच्चों ने तो सारे जीवन के लिए सम्पूर्ण पवित्र बनने का व्रत लिया है। वह खाने का व्रत रखते और आपने मन के भोजन - व्यर्थ, निगेटिव संकल्प, अपवित्र संकल्पों का व्रत रखा है। कितना अच्छा यादगार भक्तों ने बनाया है। अभी हम तो अर्थ सहित सभी त्योहार मनाते हैं और यही लक्ष्य है कि हर एक को अपने सत्य पिता का परिचय मिले, सभी उन्हें पहचाने और अपना सम्बन्ध जोड़कर वर्से के अधिकारी बनें।
बाकी मधुबन में इस समय डबल विदेशी भाई बहिनों की बहुत अच्छी रिमझिम चल रही है। दो तीन वर्षो के बाद विश्व के हर कोने से बाबा के बच्चे पहुंच गये हैं। सभी मिलकर पूरे वर्ष के लिए स्व-उन्नति और सेवा की प्लैनिंग करते स्वयं को प्रभु पालना, परिवार की पालना से भरपूर कर रहे हैं। अभी सेवा का यह टर्न राजस्थान का है, वह भी काफी संख्या में पहुंचे हुए हैं। अन्य स्थानों के भाई बहिनें भी बाबा मिलन में आये हैं। अच्छा - सभी को बहुत-बहुत याद.. ओम् शान्ति।
17-02-23 ओम् शान्ति “अव्यक्त-बापदादा'' रिवाइज 07-03-2005 मधुबन
आज विशेष शिव बाप अपने सालिग्राम बच्चों का बर्थ डे मनाने आये हैं। आप बच्चे बाप का जन्म दिन मनाने आये हो और बापदादा बच्चों का बर्थ डे मनाने आये हैं क्योंकि बाप का बच्चों से बहुत प्यार है। बाप अवतरित होते ही यज्ञ रचते हैं और यज्ञ में ब्राह्मणों के बिना यज्ञ सम्पन्न नहीं होता है इसलिए यह बर्थ डे अलौकिक है, न्यारा और प्यारा है। ऐसा बर्थ डे जो बाप और बच्चों का इकट्ठा हो यह सारे कल्प में न हुआ है, न कभी हो सकता है। बाप है निराकार, एक तरफ निराकार है दूसरे तरफ जन्म मनाते हैं। एक ही शिव बाप है जिसको अपना शरीर नहीं होता इसलिए ब्रह्मा बाप के तन में अवतरित होते हैं, यह अवतरित होना ही जयन्ती के रूप में मनाते हैं। तो आप सभी बाप का जन्म दिन मनाने आये हो वा अपना मनाने आये हो? मुबारक देने आये हो वा मुबारक लेने आये हो? यह साथ-साथ का वायदा बच्चों से बाप का है। अभी भी संगम पर कम्बाइण्ड साथ है, अवतरण भी साथ है, परिवर्तन करने का कार्य भी साथ है और घर परमधाम में चलने में भी साथ-साथ है। यह है बाप और बच्चों के प्यार का स्वरूप।
शिव जयन्ती भगत भी मनाते हैं लेकिन वह सिर्फ पुकारते हैं, गीत गाते हैं। आप पुकारते नहीं, आपका मनाना अर्थात् समान बनना। मनाना अर्थात् सदा उमंग-उत्साह से उड़ते रहना इसीलिए इसको उत्सव कहते हैं। उत्सव का अर्थ ही है उत्साह में रहना। तो सदा उत्सव अर्थात् उत्साह में रहने वाले हो ना! सदा है या कभी-कभी है? वैसे देखा जाए तो ब्राह्मण जीवन का श्वांस ही है - उमंग-उत्साह। जैसे श्वांस के बिना रह नहीं सकते हैं, ऐसे ब्राह्मण आत्मायें उमंग-उत्साह के बिना ब्राह्मण जीवन में रह नहीं सकते हैं। ऐसे अनुभव करते हो ना? देखो, विशेष जयन्ती मनाने के लिए कहाँ-कहाँ से, दूर-दूर से भाग करके आये हैं। बापदादा को अपने जन्म दिन की इतनी खुशी नहीं है जितनी बच्चों के जन्म दिन की है इसलिए बापदादा एक एक बच्चे को पदमगुणा खुशी की थालियां भर-भर के मुबारक दे रहे हैं। मुबारक हो, मुबारक हो, मुबारक हो।
बापदादा को आज के दिन सच्चे भगत भी बहुत याद आ रहे हैं। वह व्रत रखते हैं एक दिन का और आपने व्रत रखा है सारे जीवन में सम्पूर्ण पवित्र बनने का। वह खाने का व्रत रखते हैं, आपने भी मन के भोजन व्यर्थ संकल्प, निगेटिव संकल्प, अपवित्र संकल्पों का व्रत रखा है। पक्का व्रत रखा है ना? यह डबल फारेनर्स आगे-आगे बैठे हैं। यह कुमार बोलो, कुमारों ने व्रत रखा है, पक्का? कच्चा नहीं। माया सुन रही है। सब झण्डियां हिला रहे हैं ना तो माया देख रही है, झण्डियां हिला रहे हैं।
जब व्रत रखते हैं - पवित्र बनना ही है, तो व्रत रखना अर्थात् श्रेष्ठ वृत्ति बनाना। तो जैसी वृत्ति होती है वैसे ही दृष्टि, कृति स्वत: ही बन जाती है। तो ऐसा व्रत रखा है ना? पवित्र शुभ वृत्ति, पवित्र शुभ दृष्टि, जब एक दो को देखते हो तो क्या देखते हो? फेस को देखते हो या भ्रकुटी के बीच चमकती हुई आत्मा को देखते हो? कोई बच्चे ने पूछा कि जब बात करना होता है, काम करना होता है तो फेस को देख करके ही बात करनी पड़ती है, आंखों के तरफ ही नज़र जाती है, तो कभी-कभी फेस को देख करके थोड़ा वृत्ति बदल जाती है। बापदादा कहते हैं - आंखों के साथ-साथ भ्रकुटी भी है, तो भ्रकुटी के बीच आत्मा को देख बात नहीं कर सकते हैं! अभी बापदादा सामने बैठे बच्चों के आंखों में देख रहे हैं या भ्रकुटी में देख रहे हैं, मालूम पड़ता है? साथ-साथ ही तो है। तो फेस में देखो लेकिन फेस में भ्रकुटी में चमकता हुआ सितारा देखो। तो यह व्रत लो, लिया है लेकिन और अटेन्शन दो। आत्मा को देख बात करना है, आत्मा से आत्मा बात कर रहा है। आत्मा देख रहा है। तो वृत्ति सदा ही शुभ रहेगी और साथ-साथ दूसरा फायदा है जैसी वृत्ति वैसा वायुमण्डल बनता है। वायुमण्डल श्रेष्ठ बनाने से स्वयं के पुरुषार्थ के साथ-साथ सेवा भी हो जाती है। तो डबल फायदा है ना! ऐसी अपनी श्रेष्ठ वृत्ति बनाओ जो कैसा भी विकारी, पतित आपके वृत्ति के वायुमण्डल से परिवर्तन हो जाए। ऐसा व्रत सदा स्मृति में रहे, स्वरूप में रहे।
आजकल बापदादा ने बच्चों का चार्ट देखा, अपने वृत्ति से वायुमण्डल बनाने के बजाए कहाँ-कहाँ, कभी-कभी दूसरों के वायुमण्डल का प्रभाव पड़ जाता है। कारण क्या होता? बच्चे रूहरिहान में बहुत मीठी-मीठी बातें करते हैं, कहते हैं इसकी विशेषता अच्छी लगती है, इनका सहयोग बहुत अच्छा मिलता है, लेकिन विशेषता प्रभु की देन है। ब्राह्मण जीवन में जो भी प्राप्ति है, जो भी विशेषता है, सब प्रभु प्रसाद है, प्रभु देन है। तो दाता को भूल जाए, लेवता को याद करे...! प्रसाद कभी किसका पर्सनल गाया नहीं जाता, प्रभु प्रसाद कहा जाता है। फलाने का प्रसाद नहीं कहा जाता है। सहयोग मिलता है, अच्छी बात है लेकिन सहयोग दिलाने वाला दाता तो नहीं भूले ना! तो पक्का-पक्का बर्थ डे का व्रत रखा है? वृत्ति बदल गई है? सम्पन्न पवित्रता, यह सच्चा-सच्चा व्रत लेना वा प्रतिज्ञा करना। चेक करो - बड़े-बड़े विकार का व्रत तो रखा है लेकिन छोटे-छोटे उनके बाल-बच्चों से मुक्त हैं? वैसे भी देखो जीवन में प्रवृत्ति वालों का बच्चों से ज्यादा पोत्रे धोत्रे से प्यार होता है। माताओं का प्यार होता है ना। तो बड़े बड़े रूप से तो जीत लिया लेकिन छोटे-छोटे सूक्ष्म स्वरूप में वार तो नहीं करते? जैसे कई कहते हैं - आसक्ति नहीं है लेकिन अच्छा लगता है। यह चीज़ ज्यादा अच्छी लगती है लेकिन आसक्ति नहीं है। विशेष अच्छा क्यों लगता? तो चेक करो छोटे-छोटे रूप में भी अपवित्रता का अंश तो नहीं रह गया है? क्योंकि अंश से कभी वंश पैदा हो सकता है। कोई भी विकार चाहे छोटे रूप में, चाहे बड़े रूप में आने का निमित्त एक शब्द का भाव है, वह एक शब्द है - “मैं''। बॉडीकानसेस का मैं। इस एक मैं शब्द से अभिमान भी आता है और अभिमान अगर पूरा नहीं होता तो क्रोध भी आता है क्योंकि अभिमान की निशानी है - वह एक शब्द भी अपने अपमान का सहन नहीं कर सकता, इसलिए क्रोध आ जाता। तो भगत तो बलि चढ़ाते हैं लेकिन आप आज के दिन जो भी हद का मैं पन हो, उसको बाप को देकर समर्पित करो। यह नहीं सोचो करना तो है, बनना तो है... तो तो नहीं करना। समर्थ हो और समर्थ बन समाप्ति करो। कोई नई बात नहीं है, कितने कल्प, कितने बार सम्पूर्ण बने हो, याद है? कोई नई बात नहीं है। कल्प-कल्प बने हो, बनी हुई बन रही है, सिर्फ रिपीट करना है। बनी को बनाना है, इसलिए कहा जाता है बना बनाया ड्रामा। बना हुआ है सिर्फ अभी रिपीट करना अर्थात् बनाना है। मुश्किल है कि सहज है? बापदादा समझते हैं संगमयुग का वरदान है - सहज पुरुषार्थ। इस जन्म में सहज पुरुषार्थ के वरदान से 21 जन्म सहज जीवन स्वत: ही प्राप्त होगी। बापदादा हर बच्चे को मेहनत से मुक्त करने आये हैं। 63 जन्म मेहनत की, एक जन्म परमात्म प्यार, मुहब्बत से मेहनत से मुक्त हो जाओ। जहाँ मुहब्बत है वहाँ मेहनत नहीं, जहाँ मेहनत है वहाँ मुहब्बत नहीं। तो बापदादा सहज पुरुषार्थी भव का वरदान दे रहा है और मुक्त होने का साधन है - मुहब्बत, बाप से दिल का प्यार। प्यार में लवलीन और महा यंत्र है - मनमना भव का मंत्र। तो यंत्र को काम में लगाओ। काम में लगाना तो आता है ना! बापदादा ने देखा संगमयुग में परमात्म प्यार द्वारा, बापदादा द्वारा कितनी शक्तियां मिली हैं, गुण मिले हैं, ज्ञान मिला है, खुशी मिली है, इन सब प्रभु देन को, खजानों को समय पर कार्य में लगाओ।
तो बापदादा क्या चाहते हैं, सुना? हर एक बच्चा सहज पुरुषार्थी, सहज भी, तीव्र भी। दृढ़ता को यूज़ करो। बनना ही है, हम नहीं बनेंगे तो कौन बनेगा। हम ही थे, हम ही हैं और हर कल्प हम ही होंगे। इतना दृढ़ निश्चय स्वयं में धारण करना ही है। करेंगे नहीं कहना, करना ही है। होना ही है। हुआ पड़ा है।
बापदादा देश विदेश के बच्चों को देख खुश है। लेकिन सिर्फ आप सामने सम्मुख वालों को नहीं देख रहे हैं, चारों ओर के देश और विदेश के बच्चों को देख रहे हैं। मैजारिटी जहाँ-तहाँ से बर्थ डे की मुबारकें आई हैं, कार्ड भी मिले हैं, ई-मेल भी मिले हैं, दिल का संकल्प भी मिला है। बाप भी बच्चों के गीत गाते हैं, आप लोग गीत गाते हो ना - बाबा आपने कर दी कमाल, तो बाप भी गीत गाते हैं मीठे बच्चों ने कर दी कमाल। बापदादा सदा कहते हैं कि आप तो सम्मुख बैठे हो लेकिन दूर वाले भी बापदादा के दिल पर बैठे हैं। आज चारों ओर बच्चों के संकल्प में है - मुबारक हो, मुबारक हो, मुबारक हो। बापदादा के कानों में आवाज पहुंच रहा है और मन में संकल्प पहुंच रहे हैं। यह निमित्त कार्ड हैं, पत्र हैं लेकिन बहुत बड़े हीरे से भी ज्यादा मूल्यवान गिफ्ट हैं। सभी सुन रहे हैं, हर्षित हो रहे हैं। तो सभी ने अपना बर्थ डे मना लिया। चाहे दो साल का हो, चाहे एक साल का हो, चाहे एक सप्ताह का हो, लेकिन यज्ञ की स्थापना का बर्थ डे है। तो सभी ब्राह्मण यज्ञ निवासी तो हैं ही इसलिए सभी बच्चों को बहुत-बहुत दिल का यादप्यार भी है, दुआयें भी हैं, सदा दुआओं में ही पलते रहो, उड़ते रहो। दुआयें देना और लेना सहज है ना! सहज है? जो समझते हैं सहज है, वह हाथ उठाओ। झण्डियां हिलाओ। तो दुआयें छोड़ते तो नहीं? सबसे सहज पुरुषार्थ ही है - दुआयें देना, दुआयें लेना, इसमें योग भी आ जाता, ज्ञान भी आ जाता, धारणा भी आ जाती, सेवा भी आ जाती। चार ही सबजेक्ट आ जाती हैं दुआयें देने और लेने में।
तो डबल फारेनर्स दुआयें देना और लेना सहज है ना! सहज है? कितना अच्छा है। आने में तकलीफ तो नहीं हुई ना। सहज आ गये ना! जहाँ मुहब्बत है वहाँ कुछ मेहनत नहीं। तो आज का विशेष वरदान क्या याद रखेंगे? सहज पुरुषार्थी। सहज कार्य जल्दी-जल्दी किया ही जाता है। मेहनत का काम मुश्किल होता है ना तो टाइम लगता है। तो सभी कौन हो? सहज पुरुषार्थी। बोलो, याद रखना। अपने देश में जाके मेहनत में नहीं लग जाना। अगर कोई मेहनत का काम आवे भी तो दिल से कहना, बाबा, मेरा बाबा, तो मेहनत खत्म हो जायेगी। अच्छा। मना लिया ना! बाप ने भी मना लिया, आपने भी मना लिया। अच्छा।
सेवा का टर्न - राजस्थान का है:- अच्छा है, रूहानी लश्कर है। बहुत अच्छा सेवा दिल से की भी है और सभी को सन्तुष्ट भी किया है। तो जो सन्तुष्ट करता है उसको दिल से जो सन्तुष्टता की लहरें पहुंचती हैं, उससे बहुत खुशी होती है। तो बहुत खुशी मिली है ना! आपने स्थूल सेवा की और सभी भाई बहिनों ने आपको खुशी की सौगात दी है। सन्तुष्टता सबसे बड़ी खुशी की खुराक है। सारा ग्रुप सन्तुष्टमणियों का हो गया। सन्तुष्ट करने वाले सन्तुष्टमणी। सन्तुष्टमणियों को बापदादा और सारे परिवार की मुबारक हो, मुबारक हो, मुबारक हो।
देखो, हाल की रौनक कौन बढ़ाता है? आप बच्चे जब आते हैं तो डायमण्ड हाल, डायमण्ड बन जाता है। अच्छा दृश्य लगता है। अच्छा है दादी को डायमण्ड हाल बहुत पसन्द आ गया है। अच्छा, नचाती अच्छा है। खुश हो जाते हो ना, जब दादी आके नचाती है तो खुश हो जाते हैं। बहुत अच्छा। अभी एक सेकण्ड में ड्रिल कर सकते हो? कर सकते हो ना! अच्छा।
चारों ओर के सदा उमंग-उत्साह में रहने वाले श्रेष्ठ बच्चों को, सदा सहज पुरुषार्थी संगमयुग के सर्व वरदानी बच्चों को, सदा बाप और मैं आत्मा इसी स्मृति से मैं बोलने वाले, मैं आत्मा, सदा सर्व आत्माओं को अपने वृत्ति से वायुमण्डल का सहयोग देने वाले ऐसे मास्टर सर्वशक्तिवान बच्चों को बापदादा का यादप्यार, दुआयें, मुबारक और नमस्ते।