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2 Feb 2023
"विश्व की आत्माओं को दु : खों से छुड़ाने के लिए मन्सा सेवा को बढ़ाओ , सम्पन्न और सम्पूर्ण बनो"
2 February 2023 · हिंदी
02-02-2023 मधुबन अव्यक्त बापदादा ओम् शान्ति 02-02-2023
प्राणप्यारे अव्यक्तमूर्त मात-पिता बापदादा के अति स्नेही, सदा सर्व खजानों से सम्पन्न, अपनी चलन और चेहरे द्वारा बेफिकर बादशाह की स्थिति का अनुभव कराने वाले, सेवाओं में स्वयं सन्तुष्ट रह सर्व को सन्तुष्ट करने वाले, सदा मन्सा सेवा के अभ्यासी निमित्त टीचर्स बहिनें तथा देश विदेश के सर्व ब्राह्मण कुल भूषण भाई बहिनें, ईश्वरीय स्नेह सम्पन्न मधुर याद स्वीकार करना जी।
बाद समाचार - सभी ने जनवरी मास, अव्यक्त मास में बहुत अच्छी तपस्या की है। हर एक ने एक जैसा स्वमान लेकर, उस पर चिंतन मनन किया और विशेष योग अभ्यास कर अपनी अव्यक्त स्थिति बनाने के लिए विशेष अटेन्शन रखा। अभी फिर परमात्म प्रत्यक्षता के निमित्त विशाल सेवा करने का महापर्व “शिवरात्रि'' का यादगार दिन हम सभी खूब धूमधाम से मनायेंगे। अनेक सार्वजनिक कार्यक्रमों के साथ शिवबाबा का झण्डा भी फहरायेंगे, कुछ दृढ़ता सम्पन्न संकल्प भी लेंगे। इसके लिए मधुबन से सभी प्रकार की सूचनायें भेज दी गई हैं।
बापदादा समय प्रमाण बार-बार यही इशारा देते कि बच्चे, चारों ओर दु:ख की लहर बढ़ती जाती है। अनेक आत्मायें बिल्कुल हिम्मतहीन, दिलशिकस्त हो गई हैं। उनमें शक्ति भरने अथवा दु:खों से मुक्त करने के लिए, आप बच्चों को विशेष आवाज से परे रह मन्सा सेवा को बढ़ाना है। वाचा सेवा तो करते ही हो लेकिन सारे विश्व की आत्माओं को वर्सा दिलाना, दु:ख से छुड़ाना, उसके लिए स्वयं को सम्पन्न बनाना है और चारों ओर मन्सा सेवा की लहर फैलानी है तब विश्व का कल्याण होगा। समय प्रमाण जितना मन्सा सेवा में बिजी रहेंगे उतना माया अपने आप वापस चली जायेगी। समस्यायें समाप्त हो जायेंगी। ऐसी मधुर प्रेरणायें प्यारे अव्यक्त बापदादा ने हम बच्चों को दी हैं, जरूर इन्हें प्रैक्टिकल में लायेंगे।
बाकी प्यारे बापदादा की अव्यक्ति पालना का सभी बहुत अच्छा अनुभव कर रहे हैं। देश विदेश से हजारों बाबा के बच्चे मधुबन घर में पहुंच रहे हैं। अभी सेवा का टर्न महाराष्ट्र, मुम्बई, आंध्रा का है। इनके साथ अन्य स्थानों से भी अनेक भाई बहिनें पहुंचे हुए हैं। सभी खूब भरपूर हो रहे हैं। अच्छा - सभी को बहुत-बहुत याद... ओम् शान्ति।
02-02-23 “अव्यक्त-बापदादा'' ओम् शान्ति वीडियो - रिवाइज 28-03-06 मधुबन
आज सर्व खजानों के मालिक बापदादा अपने चारों ओर के सर्व खजाने सम्पन्न बच्चों को देख रहे हैं। बापदादा ने हर एक बच्चे को सर्व खजाने का मालिक बनाया है। एक ही देने वाला और सर्व को एक जैसे सर्व खजाने दिये हैं। किसको कम, किसको ज्यादा नहीं दिये हैं। क्यों? बाप अखुट खजाने के मालिक हैं। बेहद का खजाना है इसलिए हर एक बच्चा अखुट खजाने का मालिक है। बापदादा ने सर्व बच्चों को एक जितना एक जैसा दिया है। लेकिन धारण करने वालों में कोई सर्व खजाने धारण करने वाले हैं और कोई यथा शक्ति धारण करने वाले हैं। कोई नम्बरवन हैं और कोई नम्बरवार हैं। जिन्होंने जितना भी धारण किया है उन्हों के चेहरे से, नयनों से खजानों का नशा स्पष्ट दिखाई देता है। खजाने से भरपूर आत्मा चेहरे से, नयनों से भरपूर दिखाई देती है। जैसे स्थूल खजाना प्राप्त करने वाली आत्मा के चलन से, चेहरे से मालूम पड़ जाता है, तो यह अविनाशी खजानों का नशा, खुशी स्पष्ट दिखाई देती है। सम्पन्नता का फ़खुर बेफिकर बादशाह बना देता है। जहाँ ईश्वरीय फ़खुर है वहाँ फिकर हो नहीं सकता, बेफिकर बादशाह, बेगमपुर के बादशाह बन जाते हैं। तो आप सभी ईश्वरीय सम्पन्नता के खजाने वाले बेफिकर बादशाह हो ना! बेगमपुर के बादशाह हो। कोई फिकर है क्या? कोई गम है? क्या होगा, कैसा होगा इसका भी फिकर नहीं। त्रिकालदर्शी स्थिति में स्थित रहने वाले जानते हो जो हो रहा है वह सब अच्छा, जो होने वाला है वह और अच्छा। क्यों? सर्वशक्तिवान बाप के साथी हो, साथ रहने वाले हो। हर एक को नशा है, फ़खुर है कि बापदादा सदा हमारे दिल में रहते हैं और हम सदा बाप के दिलतख्त पर रहते हैं। तो ऐसा नशा है ना! जो दिलतख्त नशीन हैं उसके संकल्प तो क्या स्वप्न में भी दु:ख की लहर, लैस भी नहीं आ सकती उसमें। क्यों? सर्व खजानों से भरपूर है, जो भरपूर चीज़ होती है उसमें हलचल नहीं होगी।
तो चारों ओर के बच्चों की सम्पन्नता देख रहे थे, हर एक का बापदादा ने जमा का खाता चेक किया। खजाना तो अखुट मिला है लेकिन जो मिला है उस खजाने को कार्य में लगाते खत्म किया है वा मिले हुए खजाने को कार्य में भी लगाया है और बढ़ाया भी है? कितनी परसेन्ट में हर एक के खाते में जमा है? क्योंकि यह खजाना सिर्फ अब इस समय के लिए नहीं है, यह खजाना भविष्य में भी साथ में चलना है। जमा हुआ ही साथ जायेगा। तो परसेन्टेज देख रहे थे। क्या देखा? सेवा तो सभी बच्चे यथा योग वा यथा शक्ति कर रहे हैं लेकिन सेवा का फल जमा होना उसमें अन्तर हो जाता है। कई बच्चों का जमा खाता देखा, सेवा बहुत करते लेकिन सेवा करने का फल जमा हुआ या नहीं, उसकी निशानियां क्या होंगी? सेवा कोई भी हो चाहे मन्सा, चाहे वाचा, चाहे कर्मणा तीनों में 100 परसेन्ट मार्क होती हैं। तीनों में 100 हैं। सेवा तो की लेकिन अगर सेवा करने के समय वा सेवा के बाद स्वयं अपने मन में, अपने से सन्तुष्ट हैं और साथ में जिनकी सेवा की, जो सेवा में साथी बनते हैं वा सेवा करने वाले को देखते हैं, सुनते हैं वह भी सन्तुष्ट हैं तो समझो जमा हुआ। स्व की सन्तुष्टता, सर्व की सन्तुष्टता नहीं है तो परसेन्टेज़ जमा का कम हो जाता है।
यथार्थ सेवा की विधि पहले भी बताई है - तीन बातें विधि पूर्वक हैं तो जमा है, वह सुनाया है - एक निमित्त भाव, दूसरा निर्मान भावना, तीसरा निर्मल स्वभाव, निर्मल वाणी। भाव, भावना और स्वभाव, बोल अगर यह तीन बातों से एक बात भी कम है, एक है दो नहीं है, दो हैं एक नहीं है तो वह कमजोरी जमा की परसेन्टेज़ कम कर देती है। तो चार ही सबजेक्ट में अपने आपको चेक करो - क्या चार ही सबजेक्ट में हमारा खाता जमा हुआ है? क्यों? बापदादा ने देखा कि कईयों की चार बातें जो सुनाई, भाव, भावना.... उस प्रमाण कई बच्चों का सेवा समाचार बहुत है लेकिन जमा का खाता कम है।
तो बाप बच्चों से प्रश्न करता है, बाप से तो प्रश्न बहुत करते हैं ना, तो आज बाप बच्चों से प्रश्न करता है - समय को समीप लाने वाले कौन? ड्रामा है लेकिन निमित्त कौन? आपका एक गीत भी है, किसके रोके रूका है सवेरा। है ना गीत? तो सवेरा लाने वाला कौन? विनाशकारी तो तड़प रहे हैं कि विनाश करें, विनाश करें... लेकिन नव निर्माण करने वाले इतना रेडी हैं? अगर पुराना खत्म हो जाए, नया निर्माण हो नहीं तो क्या होगा? इसलिए बापदादा ने अभी बाप के बजाए टीचर का रूप धारण किया है। होमवर्क दिया है ना? कौन होमवर्क देता है? टीचर। लास्ट में है सतगुरू का पार्ट। तो अपने आपसे पूछो सम्पन्न और सम्पूर्ण स्टेज कहाँ तक बनी है? क्या आवाज से परे वा आवाज में आना, दोनों ही समान हैं? जैसे आवाज में आना जब चाहो सहज है, ऐसे ही आवाज से परे हो जाना जब चाहे, जैसे चाहे वैसे है? सेकण्ड में आवाज में आ सकते हैं, सेकण्ड में आवाज से परे हो जाएं - इतनी प्रैक्टिस है? जैसे शरीर द्वारा जब चाहो, जहाँ चाहो वहाँ आ-जा सकते हो ना। ऐसे मन बुद्धि द्वारा जब चाहो, जहाँ चाहो वहाँ आ-जा सकते हो? क्योंकि अन्त में पास मार्क्स उसको मिलेगी जो सेकण्ड में जो चाहे जैसा चाहे, जो आर्डर करना चाहे उसमें सफल हो जाए। साइन्स वाले भी यही प्रयत्न कर रहे हैं, सहज भी हो और कम समय में भी हो। तो ऐसी स्थिति है? क्या मिनटों तक आये हैं, सेकण्ड तक आये हैं, कहाँ तक पहुंचे हैं? जैसे लाइट हाउस माइट हाउस सेकण्ड में ऑन करते ही अपनी लाइट फैलाते हैं, ऐसे आप सेकण्ड में लाइट हाउस बन चारों ओर लाइट फैला सकते हो? यह स्थूल ऑख एक स्थान पर बैठे दूर तक देख सकती है ना! फैला सकती है ना अपनी दृष्टि! ऐसे आप तीसरे नेत्र द्वारा एक स्थान पर बैठे चारों ओर वरदाता, विधाता बन नज़र से निहाल कर सकते हो? अपने को सब बातों में चेक कर रहे हो? इतना तीसरा नेत्र क्लीन और क्लीयर है? सभी बातों में अगर थोड़ी भी कमजोरी है, तो उसका कारण पहले भी सुनाया है कि यह हद का लगाव “मैं और मेरा'' है।
तो आप ही रिजल्ट के हिसाब से देखो - क्या स्थापना का कार्य, स्व को सम्पन्न बनाना और सर्व आत्माओं को मुक्ति का वर्सा दिलाना, यह सम्पन्न हुआ है? स्वयं को जीवनमुक्ति स्वरूप बनाना और सर्व आत्माओं को मुक्ति का वर्सा दिलाना - यह है स्थापना कर्ता आत्माओं का श्रेष्ठ कर्म। तो बापदादा इसीलिए पूछता है कि सर्व बन्धनों से मुक्त, जीवनमुक्त की स्टेज पर संगम पर ही पहुंचना है वा सतयुग में पहुंचना है? संगमयुग में सम्पन्न होना है या वहाँ भी राजयोग करके सीखना है? सम्पन्न तो यहाँ बनना है ना? सम्पूर्ण भी यहाँ ही बनना है। संगमयुग के समय का भी सबसे बड़े ते बड़ा खजाना है। तो किसके रोके रूका है सवेरा, बताओ। तो बापदादा क्या चाहते हैं? क्योंकि बाप की आशाओं का दीपक बच्चे ही हैं।
तो बापदादा बच्चों से प्रश्न पूछता है - कब तक हर एक स्वयं को सम्पन्न और सम्पूर्ण बनायेंगे? दूसरे को नहीं देखो, यह अलबेलापन आ जाता है। दूसरे भी करते हैं, मैंने किया तो क्या हुआ! यह अलबेलापन है। मुझे स्व को सम्पन्न बनाना है। अब इसके लिए कितना टाइम चाहिए? इसका भी हिसाब रखें या नहीं? संगठन है, बाप जानते हैं, संगठन में बहुत कुछ सुनना भी पड़ता है, देखना भी पड़ता है, बहुत कुछ चलने में भी सामने बातें आती हैं, लेकिन यह तो आयेंगी। बातें खत्म हों तो सम्पन्न बनें, वह होना नहीं है। जितना आगे बढ़ेंगे, रूप जरूर चेंज होगा लेकिन बातें तो आयेंगी। लास्ट पेपर में ही देखो कितनी बातें हैं। बातें दिखाई न दें, बाबा दिखाई दे। बाबा ने क्या कहा, बातें क्या करती हैं, बातें क्या कहती हैं, नहीं। बाबा ने क्या कहा। बाबा को फॉलो करना है। फॉलो बातें करना है या फॉलो फादर करना है? और बापदादा अभी यह देखने चाहते हैं, अगर वतन में स्विच ऑन करें तो चाहे देश में, चाहे विदेश में, चाहे गांवों में, चाहे बड़े शहरों में सब बच्चे सम्पन्न रूप में राजा बच्चे दिखाई दें। अभी बाप की हर एक बच्चे में यही श्रेष्ठ आशा है। तो आप सभी बाप के आशा के दीपक बनेंगे? बनेंगे तो हाथ उठाओ। ऐसे नहीं हाथ उठाओ। फाइल में हाँ का पत्र डाल दें, नहीं फाइनल। सभी यह आशा पूरी करेंगे? अच्छा मुबारक हो। जिसने नहीं उठाया, वह उठाओ। कोई है? अच्छा इन्हों को टाइम चाहिए? एक साल चाहिए? तीव्र पुरुषार्थ करो। करना ही है, होना ही है। मैजारिटी ने तो उठाया है। बापदादा को यह खुशी है और दिल की दुआयें दे रहे हैं, अब प्रैक्टिकल करके दिखाना।
डबल फॉरेनर्स तो एवररेडी होंगे ना! बापदादा सबका सम्पन्न स्वरूप देखेगा। एवररेडी होंगे? ठीक है? मैजारटी ने तो हाथ उठाया है। मुबारक हो। सभी को मुबारक एडवांस में दे रहे हैं। फिर सभी एक दो को मुबारक देंगे, वाह! सम्पूर्ण वाह! वाह! सम्पन्न वाह! क्योंकि बहुत दु:ख बढ़ रहा है, आप आवाज नहीं सुनते हो ना, बापदादा सुनता है। बिल्कुल हिम्मतहीन, दिलशिकस्त हो गये हैं। तो जैसे साइन्स वाले अपनी जगह पर रहते हुए जहाँ अपना यंत्र भेजने चाहें वहाँ भेज सकते हैं, ऐसे आप मन्सा शक्ति द्वारा सेवा करो। मन्सा सेवा को बढ़ाओ। वाचा तो करनी है लेकिन सारी विश्व की आत्माओं को वर्सा दिलाना, दु:ख से छुड़ाना, उसके लिए आपको सम्पन्न बनना पड़ेगा। और मन्सा सेवा चारों ओर फैलाओ तब विश्व का कल्याण होगा। ऐसी मन्सा सेवा कर सकते हो? जिन्हों को मन्सा सेवा का अभ्यास है, चाहे थोड़ा है चाहे बहुत है लेकिन अभ्यास है, कर सकते हैं, वह हाथ उठाओ। (सबने हाथ उठाया) इसमें तो सब पास हैं। इतनी आत्मायें अगर मन्सा सेवा से वायुमण्डल फैला सकते हो तो क्या बड़ी बात है! जितना मन्सा सेवा में बिजी रहेंगे उतना समस्याओं से मुक्त हो जायेंगे क्योंकि आपका मन बुद्धि बिज़ी रहेगी, फ्री नहीं होगी तो माया आयेगी कहाँ, वापस चली जायेगी। समस्या हिम्मत नहीं रख सकती। तो मन्सा सेवा को बढ़ाओ। समझा।
अच्छा। अभी एक मिनट के लिए सभी लाइट हाउस, माइट हाउस स्थिति द्वारा विश्व में अपनी लाइट माइट फैलाओ। (ड्रिल) अच्छा - ऐसा अभ्यास समय प्रति समय कार्य में होते हुए भी करते रहो। अच्छा।
महाराष्ट्र , बम्बई और आंध्र प्रदेश के सेवा का टर्न है :- जिसका टर्न होता है, आधा क्लास उन्हों का ही होता है। अच्छा - महाराष्ट्र सदा महान स्थिति में रहने वाले और विश्व में जीवन की महानता प्रत्यक्ष करने वाले। अच्छा है महाराष्ट्र ने गोल्डन चांस लिया है, स्वयं को सम्पूर्ण बनाने का, सपूत बच्चा वही है जो प्रत्यक्ष प्रमाण दिखाता है। बापदादा को बच्चों का प्यार तो पहुंचता है लेकिन शक्तिशाली स्थिति कम पहुंचती है। प्यार में बापदादा भी अच्छी परसेन्ट देखते हैं लेकिन अभी शक्ति स्वरूप, सम्पन्न स्वरूप में सबसे ज्यादा मार्क्स लेनी हैं। तो महाराष्ट्र नम्बरवन जायेगा? जायेगा? अच्छा है। जो ओटे वह अर्जुन। अर्जुन नम्बरवन। अच्छा।
चारों ओर के बच्चों के पुरुषार्थ और प्यार के समाचार पत्र बापदादा को मिले हैं, बापदादा बच्चों का उमंग-उत्साह देख यह करेंगे, यह करेंगे... यह समाचार सुन खुश होते हैं। अभी सिर्फ जो हिम्मत रखी है, उमंग-उत्साह रखा है, इसको बार-बार अटेन्शन दे प्रैक्टिकल में लाना। यही सभी बच्चों के प्रति बापदादा के दिल की दुआयें हैं और सभी चारों ओर के संकल्प, बोल और कर्म में, सम्बन्ध-सम्पर्क में सम्पन्न बनने वाले श्रेष्ठ आत्माओं को सदा स्वदर्शन करने वाले, स्वदर्शन चक्रधारी बच्चों को, सदा दृढ़ संकल्प द्वारा मायाजीत बन बाप के आगे स्वयं को प्रत्यक्ष करने वाले और विश्व के आगे बाप को प्रत्यक्ष करने वाले सर्विसएबुल, नॉलेजफुल, सक्सेसफुल बच्चों को बापदादा का यादप्यार और दिल से पदम-पदमगुणा दुआयें हो, नमस्ते हो। नमस्ते।