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31 Dec 2023
“नये वर्ष में अपने पुराने संस्कारों को योग अग्नि में भस्म कर ब्रह्मा बाप समान त्याग , तपस्या और सेवा में नम्बरवन बनो"
31 December 2023 · हिंदी
31-12-2023 मधुबनअव्यक्त बापदादाओम् शान्ति 31-12-2023
प्राणेश्वर अव्यक्त बापदादा के अति स्नेही, सदा ब्रह्मा बाप समान त्याग, तपस्या और सेवा में नम्बरवन लेने वाली निमित्त टीचर्स बहिनें तथा देश विदेश के सभी ब्राह्मण कुल भूषण भाई बहिनें, ईश्वरीय स्नेह सम्पन्न मधुर याद के साथ नये वर्ष की ढेर सारी शुभ कामनायें, हार्दिक बधाई।
यह नया वर्ष नया उमंग-उत्साह लेकर आ रहा है। जैसे आज पुराना वर्ष विदाई लेकर नया वर्ष शुरू होगा ऐसे हम सभी अभी शीघ्र ही इस पुरानी दुनिया को विदाई देकर नई दुनिया के सुनहरे दृष्य आंखों के सामने देखेंगे। अभी वह सुख-शान्ति सम्पन्न स्वर्णिम सवेरा आया कि आया। बोलो, सभी को यह खुशी है ना! तो हम सभी अब इस पुरुषोत्तम संगमयुग पर ऐसा तीव्रगति का पुरुषार्थ कर नये संस्कार धारण करें जो बापदादा की प्रत्यक्षता हो और पुरानी दुनिया का परिवर्तन हो। आज प्यारे बापदादा ने हम सभी बच्चों को विशेष होमवर्क दिया है कि बच्चे
1- संगमयुग पर फरिश्ता स्थिति का अनुभव करने के लिए अपने सब बोझ बाप को देकर सदा हल्के, बेफिकर बादशाह बनो। सदा अपने भाग्य के गीत गाते रहो, वाह मैं और वाह मेरा भाग्य!
2- इस नये वर्ष में दृढ़ संकल्प द्वारा एकाग्रता की शक्ति धारण कर पावरफुल योग अग्नि में पुराने संस्कारों का संस्कार कर नये संस्कार धारण करो।
3- नये वर्ष में सर्व खजाने सफल कर, जमा का खाता बढ़ाओ। इसके लिए सदा कर्म में निमित्त भाव, निर्माण भाव धारण कर, निर्मल वाणी रखनी है।
4- हर आत्मा के प्रति शुभ भावना, शुभ कामना रखते हुए हर एक को श्रेष्ठ आत्मा के रूप में देखने का अभ्यास करना है।
5- इस वर्ष हर एक को तीन सर्टीफिकेट अवश्य लेने हैं - एक मन का सर्टीफिकेट 2- ब्राह्मण परिवार का और तीसरा बाप का।
बोलो, यह होमवर्क आज से सभी करेंगे ना। अब तो समय भी यही सूचना दे रहा है कि जल्दी से जल्दी बाप समान सम्पन्न और सम्पूर्ण बन अपने स्वीट होम चलना है फिर अपनी स्वीट राजधानी में आना है। अच्छा - मधुबन बेहद घर में देश विदेश के हजारों बच्चों की बहुत सुन्दर रिमझिम है। सेवा का टर्न विशेष दिल्ली-आगरा ज़ोन का है। सभी खूब रिफ्रेश हो रहे हैं। अच्छा - सर्व को याद ... ओम् शान्ति।
31-12-23 ओम् शान्ति “अव्यक्त बापदादा'' रिवाइज-31-12-05 मधुबन
आज बापदादा चारों ओर के चाहे सम्मुख हैं, चाहे दूर बैठे दिल के समीप हैं, सर्व को तीन मुबारक दे रहे हैं। एक नव जीवन की मुबारक है, दूसरी नव युग की मुबारक है और तीसरी आज के दिन वर्ष की मुबारक है। आप सभी भी नये वर्ष की मुबारक देने और मुबारक लेने आये हो। वास्तव में सच्ची दिल के खुशी की मुबारकें आप ब्राह्मण आत्मायें लेते भी हो, देते भी हो। आज के दिन का महत्व है। विदाई भी है और बधाई भी है। विदाई और बधाई का संगमयुग है। आज के दिन को कहेंगे संगम का दिन है। संगम की महिमा बहुत बड़ी है। आप सभी जानते हो कि संगमयुग की महिमा के कारण आजकल पुराने और नये वर्ष के संगम को कितना धूमधाम से मनाते हैं। संगमयुग की महिमा के कारण ही इस पुराने नये वर्ष के संगम की महिमा है। जहाँ दो नदियां मिलती हैं, संगम होता है, उनकी भी महिमा है। जहाँ नदी सागर का संगम होता है उसकी भी महिमा है। लेकिन सबसे बड़ी महिमा इस संगमयुग की, पुरुषोत्तम युग की है, जहाँ आप ब्राह्मण भाग्यवान आत्मायें बैठे हो। यह नशा है ना! अगर आपसे कोई पूछे आप किस समय पर हो? क्या कलियुग में रहते हो या सतयुग में रहते हो? तो क्या फ़लक से कहेंगे? हम इस समय पुरुषोत्तम संगमयुग में रहते हैं। आप कलियुगी नहीं हो, संगमयुगी हो। और इस संगमयुग की विशेष महिमा क्यों है? क्योंकि भगवान और बच्चों का मिलन होता है। मेला होता है, मिलन होता है, जो किसी भी युग में नहीं होता। तो मेला मनाने आये हो ना! आप मिलन मेला मनाने के लिए कहाँ-कहाँ से आये हो। कभी स्वप्न में भी सोचा था कि ड्रामा में मुझ आत्मा का ऐसा भी भाग्य नूंधा हुआ है। आत्मा का परमात्मा से मिलने का भाग्य था और है। बाप भी हर एक बच्चे के भाग्य को देख हर्षित होते हैं। वाह! भाग्यवान बच्चे वाह! अपने भाग्य को देख दिल में अपने प्रति वाह मैं वाह! वाह! मेरा भाग्य वाह! वाह! मेरा बाबा वाह! वाह! मेरा ब्राह्मण परिवार वाह! यह वाह, वाह के गीत ऑटोमेटिक दिल में गाते रहते हो ना!
तो आज इस संगम के समय अपने अन्दर सोच लिया है कि किस-किस बातों को विदाई देनी है? सभी ने सोचा है? सदाकाल के लिए विदाई देनी है क्योंकि सदाकाल के लिए विदाई देने से सदाकाल की बधाईयां मना सकेंगे। ऐसी बधाई दो जो आपके चेहरे को देख जो भी आत्मा सामने आये वह भी बधाईयां प्राप्त कर खुश हो जाए। जो दिल से बधाई देते वा लेते हैं वह सदा ही कैसे दिखाई देते हैं? संगमयुगी फरिश्ता। सभी का यही पुरुषार्थ है ना - ब्राह्मण सो फरिश्ता और फरिश्ता सो देवता! क्योंकि बाप को सब प्रकार के संकल्प वा जो भी कुछ प्रवृत्ति का, कर्म का बोझ है वह दे दिया है ना! बोझ दिया है या थोड़ा सा रह गया है? क्योंकि थोड़ा भी बोझ फरिश्ता बनने नहीं देगा और जब बाप बच्चों का बोझ लेने के लिए आये हैं तो बोझ देना मुश्किल है क्या! मुश्किल है या सहज है? जो समझते हैं बोझ दे दिया है वह हाथ उठाओ। दे दिया है? देखना सोच के हाथ उठाना। बोझ दे दिया है? अच्छा, दे दिया है तो बहुत मुबारक हो। और जिन्होंने नहीं दिया है वह किसलिए रखा है? बोझ से प्रीत है क्या? बोझ अच्छा लगता है? देखो, बापदादा हर बच्चे को क्या कहते हैं? ओ मेरे बेफिकर बादशाह बच्चे। तो बोझ का फिकर होता है ना! तो बोझ लेने के लिए बाप आये हैं क्योंकि 63 जन्म से बाप देख रहे हैं बोझ उठाते-उठाते सभी बच्चे बहुत भारी हो गये हैं। इसलिए जब बाप बच्चों को प्यार से कह रहे हैं बोझ दे दो। फिर भी क्यों रख लिया है? क्या बोझ अच्छा लगता है? सबसे सूक्ष्म बोझ है - पुराने संस्कार का। बापदादा ने हर बच्चे के इस वर्ष का, क्योंकि वर्ष पूरा हो रहा है ना, तो इस वर्ष का चार्ट देखा। आप सबने भी अपना-अपना वर्ष का चार्ट चेक किया होगा? तो बापदादा ने देखा कि कई बच्चों को इस पुराने संसार की आकर्षण कम हुई है, पुराने सम्बन्ध की भी आकर्षण कम हुई है लेकिन पुराने संस्कार, उसका बोझ मैजारिटी में रहा हुआ है। किसी न किसी रूप में चाहे मन्सा अशुद्ध संकल्प नहीं लेकिन व्यर्थ संकल्प का संस्कार अभी भी परसेन्ट में दिखाई देता है। वाचा में भी दिखाई देता है। सम्बन्ध-सम्पर्क में भी कोई न कोई संस्कार अभी भी दिखाई देता है।
तो आज बापदादा सभी बच्चों को मुबारक के साथ-साथ यही इशारा देते हैं कि यह रहा हुआ संस्कार समय पर धोखा देता भी है और अन्त में भी धोखा देने के निमित्त बन जायेगा। इसीलिए आज संस्कार का संस्कार करो। हर एक अपने संस्कार को जानता भी है, छोड़ने चाहता भी है, तंग भी है, लेकिन सदा के लिए परिवर्तन करने में तीव्र पुरुषार्थी नहीं हैं। पुरुषार्थ करते हैं लेकिन तीव्र पुरुषार्थी नहीं हैं। कारण? तीव्र पुरुषार्थ क्यों नहीं होता? कारण यही है, जैसे रावण को मारा भी लेकिन सिर्फ मारा नहीं, जलाया भी। ऐसे मारने के लिए पुरुषार्थ करते हैं, थोड़ा बेहोश भी होता है संस्कार, लेकिन जलाया नहीं तो बेहोशी से बीच-बीच में उठ जाता है। इसके लिए पुराने संस्कार का संस्कार करने के लिए इस नये वर्ष में योग अग्नि से जलाने का, दृढ़ संकल्प का अटेन्शन रखो। पूछते हैं ना इस नये वर्ष में क्या करना है? सेवा की तो बात अलग है लेकिन पहले स्वयं की बात है - योग लगाते हो, बापदादा बच्चों को योग में अभ्यास करते हुए देखते हैं। अमृतवेले भी बहुत पुरुषार्थ करते हैं लेकिन योग तपस्या, तप के रूप में नहीं करते हैं। प्यार से याद जरूर करते हैं, रूहरिहान भी बहुत करते हैं, शक्ति भी लेने का अभ्यास करते हैं लेकिन याद को इतना पावरफुल नहीं बनाया है, जो जो संकल्प करो विदाई, तो विदाई हो जाए। योग को योग अग्नि के रूप में कार्य में नहीं लगाते। इसलिए योग को पावरफुल बनाओ। एकाग्रता की शक्ति विशेष संस्कार भस्म करने में आवश्यक है। जिस स्वरूप में एकाग्र होने चाहो, जितना समय एकाग्र होने चाहो, ऐसी एकाग्रता संकल्प किया और भस्म। इसको कहा जाता है योग अग्नि। नामनिशान समाप्त। मारने में फिर भी लाश तो रहता है ना! भस्म होने के बाद नामनिशान खत्म। तो इस वर्ष योग को पावरफुल स्टेज में लाओ। जिस स्वरूप में रहने चाहो मास्टर सर्वशक्तिवान, आर्डर करो, समाप्त करने की शक्ति आपके आर्डर से नहीं माने, यह हो नहीं सकता। मालिक हो। मास्टर कहलाते हो ना! तो मास्टर आर्डर करे और शक्ति हाजिर नहीं हो तो क्या वह मास्टर है? तो बापदादा ने देखा कि पुराने संस्कार का कुछ न कुछ अंश अभी भी रहा हुआ है और वह अंश बीच-बीच में वंश भी पैदा कर देता है, जो कर्म तक भी काम हो जाता है। युद्ध करनी पड़ती है। तो बापदादा को बच्चों का समय प्रमाण युद्ध का स्वरूप भाता नहीं है। बापदादा हर बच्चे को मालिक के रूप में देखने चाहता है। आर्डर करो जी हजूर। तो सुना इस वर्ष स्व के प्रति क्या करना है? शक्तिशाली, बेफिकर बादशाह।
बापदादा बच्चों से प्रश्न पूछते हैं कि आप सब बाप समान बन गये हो? पर्दा खोलें कि पर्दा खोलेंगे तो कोई कंघी कर रहा है, कोई फेस को क्रीम लगा रहा है, अगर एवररेडी हो, संस्कार समाप्त हो गये तो बापदादा को पर्दा खोलने में क्या देरी लगेगी। एवररेडी तो हो जाओ ना! हो जायेंगे, हो जायेंगे कहके बाप को बहुत समय खुश किया है। अभी ऐसा नहीं करना। होना ही है, करना ही है। बाप समान बनना है इसमें तो सभी हाथ उठा देते हैं, उठाने की जरूरत नहीं। ब्रह्मा बाप को देखो, साकार में तो ब्रह्मा बाप को फालो करना है ना! ब्रह्मा बाप ने त्याग, तपस्या और सेवा लास्ट घड़ी तक साकार रूप में प्रैक्टिकल दिखाया। अपनी ड्युटी, शिव बाप द्वारा महावाक्य उच्चारण की ड्युटी लास्ट दिन तक निभाई। लास्ट मुरली याद है ना? तीन शब्द का वरदान, याद है? (निराकारी, निर्विकारी और निरहंकारी बनो) जिसको याद है वह हाथ उठाओ। अच्छा सभी को याद है, मुबारक हो। त्याग भी लास्ट दिन तक किया, अपना पुराना कमरा नहीं छोड़ा। बच्चों ने कितना प्यार से ब्रह्मा बाप को कहा लेकिन बच्चों के लिए बनाया, स्वयं नहीं यूज़ किया। और सदा अढ़ाई तीन बजे उठकर स्वयं प्रति तपस्या की, संस्कार भस्म किये तब कर्मातीत अव्यक्त बने, फरिश्ता बने। जो सोचा वह करके दिखाया। कहना, सोचना और करना तीनों समान। फालो फादर। लास्ट तक अपने कर्तव्य में पूर्ण रहे, पत्र भी लिखे, कितने पत्र लिखे? सेवा भी नहीं छोड़ी। फॉलो फादर। अखण्ड महादानी, महादानी नहीं, अखण्ड महादानी का प्रैक्टिकल रूप दिखाया, अन्त तक। लास्ट तक बिना आधार के तपस्वी रूप में बैठे। अभी बच्चे तो आधार लेते हैं ना, बैठने का। लेकिन ब्रह्मा बाप ने आदि से अन्त तक तपस्वी रूप रखा। आंखों में चश्मा नहीं डाला। यह सूक्ष्म शक्ति है। निराधार। शरीर पुराना है, दिनप्रतिदिन प्रकृति हवा पानी दूषित हो रहा है इसलिए बापदादा आपको कहते नहीं हैं, क्यों आधार लेते हो, क्यों चश्मा पहनते हो, पहनो भले पहनो, लेकिन शक्तिशाली स्थिति जरूर बनाओ।
सुनाया ना - अभी योग सर्वशक्तियों से पावरफुल हो, योग अग्नि हो, ज्वालामुखी हो। अभी संस्कार का अंश मात्र भी नहीं रहे तब कहेंगे ज्वाला रूप योगी तू आत्मा और साथ-साथ इस नये वर्ष में जो भी खजाने हैं, ज्ञान का खजाना, शक्तियों का, गुणों का, श्रेष्ठ संकल्प का खजाना, एक तो सफल करो और दूसरा जमा करो। जमा भी करो, सफल भी करो क्योंकि आपका टाइटल है, वरदान है सफलता के सितारे। है ना आपका टाइटल - सफलता के सितारे? सभी फ़लक से कहते हो सफलता हमारे गले का हार है। सफलता हमारा जन्म सिद्ध अधिकार है। तो सफलतामूर्त हो, सफल करो और जमा भी करो। सेवा कितनी भी करते हो लेकिन जमा का खाता हुआ या नहीं हुआ, उसकी निशानी या उसकी गोल्डन चाबी है - निमित्त भाव, निर्मान भाव और निर्मल वाणी। तीनों हैं? तीनों में से एक भी कम है, तो सेवा कितनी भी करो जमा का खाता नहीं होता। बहुत थोड़ा, नाम मात्र जमा होता है। तो बापदादा ने यह भी चेक किया तो सेवा तो बहुत करते लेकिन जमा का खाता जितना होना चाहिए उतना नहीं है, उसका कारण? कारण तो समझते हो ना! एक तो तीन विशेषतायें, निमित्त भाव में मैं पन का भाव मिक्स हो जाता है। मैं-पन आया, जमा नहीं हुआ। कितनी भी मेहनत करो, रात दिन भागदौड़, दिमाग चलाओ लेकिन निमित्त भाव, निर्मान स्वभाव, निर्मल वाणी, यह तीन नहीं है तो जमा नहीं। बहुत में बहुत 5 परसेन्ट जमा होता है। तो यह भी चेक करना तो जमा हुआ? बापदादा बहुत सहज रास्ता बताते हैं, किसी से भी सम्बन्ध-सम्पर्क में आते हो, चाहे लौकिक, चाहे अलौकिक पहले अपने शुभ भावना, शुभ कामना की वृत्ति को चेक करो और किससे भी मिलते हो, तो सदा आत्मा को देख करके बात करो, आत्मा से बात करते हैं, कोई अलौकिक परिवार से बात करते हो, खुशी होनी चाहिए यह कल्प पहले वाली, हर कल्प भाग्य बनाने वाली कोटों में कोई आत्मा है। उस भाव से देखो। चाहे प्यादा हो, लेकिन है तो कोटों में कोई। मेरा बाबा तो कहता है। चाहे क्रोधी भी हो, स्वभाव अच्छा नहीं हो, लेकिन आप अपना स्वभाव श्रेष्ठ रखो। आप श्रेष्ठ आत्मा के रूप में देखो, श्रेष्ठ आत्मा के स्वरूप में देखो, तभी कार्य अच्छा होगा, जमा होगा। तो इस वर्ष का होमवर्क बहुत मिला है। सभी पूछते हैं ना - क्या करें, क्या करें, क्या करें..। बहुत होम वर्क मिला है। जो बच्चे इस होमवर्क में नम्बरवन पास होंगे, उसको फिर बापदादा सौगात देंगे। चाहे हजार भी हों तो भी देंगे, सौगात तैयार करायेंगे। लेकिन सर्टीफिकेट लेंगे, ऐसे नहीं आप कहेंगे तो बाबा मान जायेगा, नहीं। साथियों से सर्टीफिकेट भी लेंगे। पहले मन का सर्टीफिकेट फिर ब्राह्मण परिवार के साथियों का सर्टीफिकेट और तीसरा है बाप का सर्टीफिकेट। तो सर्टीफिकेट लेंगे ना। हिम्मत है ना! जो समझते हैं हम सर्टीफिकेट लेकर ही छोड़ेंगे, दृढ़ निश्चय है, वह हाथ उठाओ। अच्छा - यह तो यूथ भी उठा रहे हैं। अच्छा है। डबल फारेनर्स भी उठा रहे हैं। हाथ लम्बा उठाओ, करके दिखायेंगे? (सभी ने हाथ उठाया) फिर तो बहुत सौगातें तैयार करनी पड़ेंगी। आपकी तैयारी के पीछे सौगात तो कुछ भी नहीं है। पहले तो परमात्म दिलतख्त मिलेगा। लेकिन सौगात भी देंगे। अच्छा। अभी क्या करना है?
सेवा का टर्न दिल्ली ज़ोन का है:- बापदादा ने देखा है कि जिस भी ज़ोन को टर्न मिलता है, बड़े उमंग-उत्साह से और बहुत बड़ी संख्या में इकट्ठे होते हैं, खुशी होती है, गोल्डन चांस मिलता है ना। दिल्ली वाले भी सोचते हैं कि दिल्ली से प्रत्यक्षता का झण्डा हो। धरनी तो है लेकिन प्लैन बनाओ। कैसे प्रत्यक्षता का झण्डा लहरायेंगे, उसके लिए क्या सोचा है? प्रोग्राम तो करते हो, वह तो करना ही है लेकिन यह आवाज कोई भी रेडियो खोले, कोई भी टी.वी. का स्विच खोले तो यह आवाज आवे “हमारा शिवबाबा आ गया'' तब कहेंगे प्रत्यक्षता का झण्डा लहराया। अच्छा मीडिया वाले सोच रहे हैं कि हम करेंगे, कोई भी करो लेकिन सभी रेडियो में, चाहे विदेश में, चाहे देश में जहाँ भी स्विच खोलें तो यही आवाज आवे। इसको कहते हैं प्रत्यक्षता का झण्डा। कौन करेगा? विदेश करेगा, विदेश में होगा? करो, कोई भी करो, फर्स्ट प्राइज लो। यह धूम मचनी चाहिए, आ गया, आ गया, आ गया। अच्छा है, संख्या तो बहुत है, अभी कमाल करना।
अच्छा। बहुत अच्छा पार्ट बजा रहे हैं। बापदादा ने देखा है सहयोगी एक दो के बहुत अच्छे हैं। समाचार मिलता है, जहाँ भी प्रोग्राम होता है वहाँ एक दो के सहयोगी बनके कार्य सफल कर देते हैं, इसकी बापदादा विशेष मुबारक दे रहे हैं। अभी जलवा दिखाओ। एक गीत है ना आप लोगों का - जलवा देखा वह तेरा हो गया...। अभी यह गीत मुख से गावें, दुनिया गावे। अच्छा।
डबल विदेशी :- अच्छा बच्चे भी हैं, यूथ भी हैं। डबल विदेशियों को बापदादा टाइटल देते हैं डबल तीव्र पुरुषार्थी क्योंकि विदेशियों के संस्कार हैं जो सोचते हैं वह करते हैं। बापदादा ने देखा है कि प्लैन को प्रैक्टिकल लाने में लक्ष्य अच्छा रखते हैं। विदेशियों के लिए सोचते हैं - इन्हों का कल्चर अलग है लेकिन विदेश वाले इन्डिया से भी आगे नम्बर ले सकते हैं। महान तपस्वी बनने में नम्बरवन। हो सकता है ना! होना ही है। हो सकता है क्योंकि विदेशियों में दृढ़ता का संस्कार है, अभी इसमें सिर्फ दृढ़ता का संस्कार यूज़ करो, हो जायेगा। ठीक है ना! नम्बरवन लेना है ना! अच्छा। बापदादा खुश है। हिम्मत रख रहे हैं और मदद भी मिल रही है। इसलिए आप भी खुश, बाप भी खुश। अच्छा।
चारों ओर के सदा उमंग-उत्साह में आगे बढ़ने वाले, सदा हिम्मत से बापदादा की पदमगुणा मदद के पात्र बच्चों को, सदा विजयी रत्न हैं, हर कल्प में विजयी बने थे, अब भी हैं और हर कल्प में विजयी हैं ही हैं। ऐसे विजयी बच्चों को सदा एक बाप दूसरा न कोई, न संसार की आकर्षण, न संस्कार की आकर्षण, दोनों आकर्षण से मुक्त रहने वाले, सदा बाप समान बच्चों को बापदादा का यादप्यार और नमस्ते।