Search for a command to run...
23 Oct 2021
"एक राज्य, एक धर्म, लॉ एण्ड आर्डर की स्थापना के समय स्वयं का परिवर्तन कर विश्व परिवर्तक बनो"
23 October 2021 · हिंदी
23-10-2021 मधुबन अव्यक्त बापदादा ओम् शान्ति 23-10-2021
ईश्वरीय स्नेह सम्पन्न मधुर याद स्वीकार करना जी।
बाद समाचार - प्यारे बापदादा ने हम सब बच्चों को तीन तख्त का मालिक बनाया है। सभी भ्रकुटी के अकाल तख्त पर बैठ तपस्या करते, बाबा के सपूत बच्चे बन उनके दिलतख्त पर राज्य करते और भविष्य में विश्व का राज्य तख्त प्राप्त कर लेते।
आज मीठे अव्यक्त बापदादा के इतने प्यार और दुलार भरे महावाक्य सुनकर सभी का मन आनंदित हो रहा है। वर्तमान समय एक ओर प्रकृति के तत्वों की हलचल, दूसरी ओर विकारों का फुल फोर्स, तीसरी ओर पुराने रहे हुए हिसाब-किताब चुक्तू होने की फास्ट मशीनरी... देख सभी एक बल एक भरोसे के आधार पर, कल्प-कल्प की विजयी आत्मा के स्वमान में रह, हर दृश्य को साक्षीदृष्टा बन पार करते, एकरस अचल अडोल रहते हैं। बाबा अपने बच्चों को विशेष इशारा करते बच्चे, अब स्व-कल्याण के साथ विश्व कल्याण के कार्य को सम्पन्न करने के लिए अपनी मन्सा को शक्तिशाली बनाओ। सभी प्रकार के प्रश्नों से पार रह अपनी प्रसन्नचित स्थिति द्वारा आने वाली स्वर्णिम दुनिया की खुशखबरी हर एक को सुनाओ। सदा खुशी में रहो और खुशियों का दान करो। जरूर आप सभी समय निकाल इस प्रकार की बेहद सेवा कर रहे होंगे।
मधुबन लाइट हाउस से चारों ओर योग की शक्तिशाली सकाश जा रही है। यहाँ के सभी स्थानों पर विशेष योग तपस्या के ही कार्यक्रम चल रहे हैं। आप सभी दूर बैठे भी अपने दिव्य बुद्धि के विमान से मधुबन की सैर करते यहाँ के वायुमण्डल का अनुभव कर रहे होंगे।
देखो, यह ऑनलाइन बाबा मिलन का कार्यक्रम भी कैसे पूरे वायुमण्डल को चेंज कर देता है। साइंस के साधनों द्वारा भी जब अपनी मीठी दादियों को सम्मुख देखते हैं, तो उनकी साकार उपस्थिति का अनुभव होने लगता है। ऐसे लगता जैसे अव्यक्त होते भी हम सबके बीच में हाज़िर नाज़िर हैं। गुल्जार दादी जी को देखते सभी के दिल में बाबा बाबा का अनहद गीत गूंजने लगता है। सम्मुख में तो बहुत थोड़ी संख्या में भाई बहिनें आते हैं लेकिन आप सब दूर बैठे भी सम्मुख का अनुभव करते होंगे। अभी भोपाल ज़ोन के भाई बहिनें पहुंचे हैं सभी खूब रिफ्रेश हो रहे हैं। अच्छा - सभी को याद.. ओम् शान्ति।
23-10-21 ओम् शान्ति “अव्यक्त-बापदादा'' वीडियो रिवाइज-15-12-08 मधुबन
आज बापदादा अपने चारों ओर के राजदुलारे बच्चों को देख रहे हैं। यह परमात्म दुलार कोटों में कोई को प्राप्त होता है। परमात्म दुलार में बापदादा ने हर एक बच्चे को तीन तख्त का मालिक बनाया है। पहला स्वराज्य अधिकार का भ्रकुटी का तख्त, दूसरा बापदादा का दिलतख्त और तीसरा है विश्व के राज्य अधिकार का तख्त, यह तीन तख्त बाप ने अपने स्नेही दुलारे बच्चों को दिया है। तो यह तीनों तख्त सदा स्मृति में रहने से हर एक बच्चे को रूहानी नशा रहता है। तो सभी बच्चे बाप द्वारा प्राप्त वर्से को देख खुशी में रहते हैं ना! दिल में स्वत: यह गीत बजता ही रहता है “वाह बाबा वाह! और वाह मेरा भाग्य वाह!'' जो स्वप्न में भी नहीं था वह प्रैक्टिकल जीवन में मिल गया। तख्त के साथ-साथ बापदादा ने इस संगम पर डबल ताज द्वारा उड़ती कला का अनुभवी भी बनाया है। तो बापदादा चारों ओर के बच्चों का यह डबल ताजधारी स्वरूप देख रहे हैं - एक प्युरिटी की रॉयल्टी का ताज है, दूसरा सेवा की जिम्मेवारी का ताज है।
बापदादा ने आज चारों ओर के बच्चों के पुरुषार्थ की रफ्तार को चेक किया क्योंकि समय की रफ्तार को तो आप सभी भी देख और जान रहे हो। तो बापदादा देख रहे थे कि जो हर एक को बाप द्वारा राज-भाग का वर्सा मिला है, अपने राज्य का, फ्युचर प्राप्ति का, तो फ्युचर में जो आप सबके संस्कार नैचुरल और नेचर होंगे वह अब से बहुतकाल के संस्कार अनुभव होने चाहिए क्योंकि आप सबके नये संस्कारों द्वारा ही यह नया संसार बन रहा है। तो जो नये संसार की विशेषतायें हैं, उसको भी अनुभव तो करते हो ना। हमारे राज्य में क्या होगा, नशा है ना! दिल कहती है ना कि हमारा राज्य, हमारा नया संसार आया कि आया। तो बापदादा देख रहे थे कि नये संसार की जो विशेषतायें हैं वह बच्चों के पुरुषार्थी जीवन में कहाँ तक इमर्ज हैं! जानते तो हो कि नये संस्कार और नये संसार की विशेषतायें क्या होंगी। सभी की बुद्धि में नये संसार की विशेषतायें इमर्ज हैं ना! जानते हो ना! गाते भी हो, जानते भी हो, पहली विशेषता, चेक करना एक-एक विशेषता मेरे में कहाँ तक इमर्ज है? मुख्य विशेषता है - एक राज्य, तो जैसे वहाँ एक राज्य स्वत: ही होता है, दूसरा कोई राज्य नहीं, ऐसे अपने संगम की जीवन में देखो कि आपके जीवन में भी एक राज्य है? कि कभी-कभी दूसरा राज्य भी होता है? अगर चलते-चलते स्व के राज्य के साथ-साथ माया का भी राज्य चलता है तो क्या एक राज्य के संस्कार होंगे? एक राज्य से दूसरा भी राज्य तो नहीं चलता? परमात्मा की श्रीमत का राज्य है या कभी-कभी माया का भी दबाव है? दिल में माया का राज्य तो नहीं होता? तो यह चेक करो। इस बातों से अपने चार्ट को चेक करो। अभी संगम पर एक परमात्मा का राज्य है या माया का भी दबाव हो जाता है? चेक किया? अभी अभी चेक करो, अपना चार्ट तो देखते रहते हो ना। तो अगर अभी तक भी दो राज्य हैं तो एक राज्य के अधिकारी कैसे बनेंगे? क्या श्रीमत के साथ माया की मत भी मिक्स हो जाती है क्या? ऐसे ही एक धर्म, एक राज्य भी होगा तो एक धर्म भी होगा। धर्म अर्थात् धारणा। तो आपकी विशेष धारणा कौन सी है? पवित्रता की धारणा। तो चेक करो - सदा मन, वचन, कर्म, सम्बन्ध-सम्पर्क में सम्पूर्ण और सदा पवित्रता की नेचर नैचुरल बनी है? जैसे वहाँ अपने राज्य में पवित्रता का स्वधर्म स्वत: ही होगा, ऐसे ही इस समय पवित्रता की धारणा नैचुरल और नेचर बन गई है? क्योंकि जानते हो कि आपका अनादि स्वरूप और आदि स्वरूप पवित्रता है। तो चेक करो कि एक धर्म अर्थात् पवित्रता नैचुरल है? जो नेचर होती है वह न चाहते भी काम कर लेती है क्योंकि कई बच्चे जब रूहरिहान करते हैं तो क्या कहते हैं? बहुत मीठी-मीठी बातें करते हैं, कहते हैं चाहता नहीं हूँ, चाहती नहीं हूँ, लेकिन कभी मन्सा में, कभी वाचा में कोई न कोई अपवित्रता का अंश इमर्ज हो जाता है? संस्कार बहुत जन्मों का है ना इसीलिए हो जाता है। तो एक धर्म का अर्थ है पवित्रता की धारणा नेचर और नैचुरल हो। चाहे वाणी में भी आवेश आ जाता है, कहते हैं क्रोध नहीं था, थोड़ा सा आवेश आ गया। तो आवेश क्या है? क्रोध का ही तो बच्चा है। तो एक धर्म के संस्कार कब नैचुरल बनेंगे? तो चेक करो लेकिन चेक के साथ बाप द्वारा मिली हुई शक्तियों द्वारा चेन्ज करो। अभी फिर भी बापदादा पहले से ही अटेन्शन खिंचवा रहे हैं कि अभी फिर भी चेक करके चेन्ज करने का तीव्र पुरुषार्थ करेंगे तो मार्जिन है लेकिन कुछ समय के बाद अचानक टूलेट का बोर्ड लगना ही है। फिर नहीं कहना कि बाबा ने तो बताया ही नहीं, इसलिए अभी पुरुषार्थ का समय तो गया लेकिन तीव्र पुरुषार्थ का समय अभी भी है तो चेक करो लेकिन सिर्फ चेक नहीं करना, चेन्ज करो साथ में। कई चेक करते हैं लेकिन चेन्ज करने की शक्ति नहीं है। चेक और चेन्ज दोनों साथ-साथ होना चाहिए क्योंकि आप सबका स्वमान वा आप सबकी महिमा क्या है? टाइटिल क्या है? मास्टर सर्वशक्तिवान। है, मास्टर सर्वशक्तिवान है या शक्तिवान है? जो कहते हैं मास्टर सर्वशक्तिवान हैं, वह हाथ उठाओ। (सभी ने उठाया) अच्छा। तो मास्टर सर्वशक्तिवान हो! मुबारक हो, लेकिन मास्टर सर्वशक्तिवान और चेन्ज नहीं कर सकें तो क्या कहा जायेगा? अपने ही संस्कार को, नेचर को परिवर्तन करने चाहे भी और नहीं कर सके तो क्या कहेंगे? अपने से पूछो मास्टर शक्तिवान हैं या मास्टर सर्वशक्तिवान? मास्टर सर्वशक्तिवान ने संकल्प किया - करना ही है और हुआ पड़ा है। होगा, देखेंगे.... यह होता नहीं है। तो अभी समय के प्रमाण रिजल्ट यह होनी है कि जो सोचा, तो संकल्प और स्वरूप बनना साथ-साथ हो।
बापदादा ने देखा अभी भी अलबेलापन और रॉयल आलस्य है। रॉयल आलस्य है - हो जायेगा, बन ही जायेंगे, पहुंच ही जायेंगे और अलबेलापन है कर तो रहे हैं, तो तो.. यह तो होना ही है, यह तो करना ही है, कहने और करने में अन्तर हो जाता है। बापदादा एक दृश्य देख करके मुस्कराता रहता है कि क्या कहते? यह हो जाये ना, यह कर ले ना, तो बहुत अच्छा मैं आगे बढ़ सकता हूँ। दूसरे को बदलने की वृत्ति रहती है लेकिन स्व परिवर्तन की वृत्ति कहाँ कहाँ कम हो जाती है। अभी दूसरे को देखना, यह वृत्ति चेन्ज करो। अगर देखना है तो विशेषता देखो, यह तो होता ही है, यह तो चलता ही है, यह भी तो करते हैं... यह भावना कम करो। अपने को देखो, बाप को सामने रखो, बाकी तो कोई भी है, चाहे महारथी है, चाहे बीच वाला है, पुरुषार्थ में कोई न कोई कमी को परिवर्तन कर ही रहे हैं, इसलिए सी फादर, सी डबल फादर, ब्रह्मा बाप को देखो, शिव बाप को देखो। जब बाप ने आपको अपने दिलतख्त पर बिठाया है और आपने भी अपने दिलतख्त पर बाप को बिठाया है, आपका स्लोगन भी है सी फादर। सी सिस्टर, सी ब्रदर.. यह स्लोगन है ही नहीं। कुछ न कुछ कमी सबमें अभी रही हुई है लेकिन अगर दूसरे को देखना है तो विशेषता देखो, जो कमी वह निकाल रहे हैं अपने से, उसको नहीं देखो। दूसरी बात - तो अपने राज्य में, याद है ना अपना राज्य! कल तो था और कल फिर होने वाला है। आपकी बुद्धि में, नयनों में अपना राज्य स्पष्ट आ गया ना। कितने बार राज्य किया है? गिनती किया है? अनेक बार राज्य किया है। कहने से ही सामने आ जाता है। अपना राज्य अधिकारी रूप और श्रेष्ठ राज्य, तो जैसे अपने राज्य में लॉ एण्ड आर्डर स्वत: ही चलता है। सब नॉलेजफुल संस्कार वाले हैं, जानते हैं लॉ क्या है, आर्डर क्या है, ऐसे अभी अपने जीवन में देखो, बाप के आर्डर में चलते हो या कभी माया का भी आर्डर चल जाता है? कभी परमत, मनमत, श्रीमत के सिवाए चलता तो नहीं? और लॉ क्या है? लॉ है बेफिकर बादशाह, कोई फिकर नहीं क्योंकि सर्व प्राप्तियां हैं। ऐसे ही चेक करो संगम के श्रेष्ठ जन्म में भी सर्व प्राप्तियां हैं? जो बाप ने दी है, यह भगवान का जैसे प्रसाद होता है ना, तो प्रसाद का कितना महत्व रखते हैं। तो बाप की जो भी प्राप्तियां हैं, वह प्रभु प्रसाद प्राप्त है, प्रभु प्रसाद का महत्व है? वर्सा भी है, अधिकार भी है और प्रसाद भी है। तो चेक करो - लॉ और आर्डर, दोनों में सम्पन्न हैं?
बापदादा एक बात देख रहे थे कि मैजारिटी को परिवर्तन करने की जो शक्ति मिली है, वह परिवर्तन शक्ति समय पर कार्य में लगायें तो कोई मेहनत नहीं है। देखो, सभी को अनुभव है कि अगर कभी भी, किसी भी प्रकार की हार माया से होती है, तो सभी भाषण में कहते हो, क्लास भी कराते हो तो यही कहते हो कि दो शब्द गिराने वाले भी हैं, चढ़ाने वाले भी हैं, वह दो शब्द सभी जानते हैं, सबके मन में आ गया है। वह दो शब्द हैं - मैं और मेरा। भाषण में कहते हो ना, क्लास भी कराते हो ना। बापदादा क्लास भी सुनते हैं, क्या कहते हैं? अभी इन दो शब्दों को परिवर्तन शक्ति द्वारा परिवर्तन करो, जब भी मैं शब्द बोलो तो मैं फलानी या फलाना या ब्राह्मण तो हूँ लेकिन मैं कौन? जो बापदादा ने स्वमान दिये हैं, जब भी मैं शब्द बोलो तो कोई न कोई स्वमान साथ में बोलो, यानी बुद्धि में लाओ। मैं शब्द बोला और स्वमान याद आ जाये। मेरा शब्द बोला तो बाबा याद आ जाये। मेरा बाबा, यह नैचुरल स्मृति हो जाए, यह परिवर्तन कर लो बस। और दूसरी बात बहुत करके जब सम्बन्ध-सम्पर्क में आते हो तो दो शब्द द्वारा माया आती है, एक भाव और दूसरी भावना। तो जब भी भाव शब्द बोलते हो सोचते हो तो आत्मिक भाव, भाव शब्द बोलते ही आत्मिक भाव पहले याद आवे और भावना तो शुभ भावना याद आये। शब्द का अर्थ परिवर्तन कर लो। आपका टाइटिल क्या है? विश्व परिवर्तक। विश्व परिवर्तक क्या यह शब्द परिवर्तन नहीं कर सकते? तो समय पर परिवर्तन शक्ति को यूज़ करके देखो। पीछे आता है, जब समय बीत जाता है और मन को अच्छा नहीं लगता है, खुद ही अपना मन सोचता है लेकिन समय तो बीत चुका ना। इसलिए अब तीव्रगति की आवश्यकता है, कभी कभी नहीं। ऐसे नहीं सोचो बहुत समय तो ठीक रहता हूँ लेकिन बापदादा ने सुना दिया है कि अन्तिम घड़ी का कोई भरोसा नहीं। अचानक के खेल होने हैं। कई बच्चे बाप को भी बहुत मीठी-मीठी बातें सुनाते हैं, कहते हैं समय थोड़ा और अति में जायेगा ना, तो वैराग्य तो होगा, तो वैराग्य के समय आपेही रफ्तार तेज हो जायेगी। लेकिन बापदादा ने कह दिया है कि बहुत समय का पुरुषार्थ चाहिए। अगर थोड़े समय का पुरुषार्थ होगा तो प्रालब्ध भी थोड़े समय की मिलेगी, फुल 21 जन्म की प्रालब्ध नहीं बनेगी। तीन शब्द बापदादा के सदा याद रखो - एक अचानक, दूसरा एवररेडी और तीसरा बहुतकाल। यह तीनों शब्द सदा बुद्धि में रखो। कब और कहाँ भी किसका भी अन्तिम काल हो सकता है। अभी-अभी देखो कितने ब्राह्मण जा रहे हैं, उन्हों को पता था क्या, इसीलिए बहुतकाल के पुरुषार्थ से फुल 21 जन्म का वर्सा प्राप्त करना ही है, यह तीव्र पुरुषार्थ स्मृति में रखो। फर्स्ट नम्बर, फर्स्ट जन्म, अपने राज्य का। क्या सोचा है? फर्स्ट जन्म में आना है ना! मजा किसमें होगा? फर्स्ट जन्म में या कोई में भी? जो समझता है कि अपने राज्य के फर्स्ट जन्म में श्रीकृष्ण के साथ-साथ हमारा भी पार्ट हो, वह हाथ उठाओ। (सभी ने उठाया) अच्छा, पार्ट फर्स्ट में? हाथ देख करके तो खुश हो गये। ताली बजाओ। फर्स्ट जन्म में आओ, उसकी मुबारक है, लेकिन.. लेकिन कहें क्या... नहीं कहें? आना ही है फर्स्ट, फिर दूसरी बात क्यों कहें। अच्छा है, जितने भी आये हैं फर्स्ट जन्म में आना ही है। ताली तो बजा दी, फर्स्ट जन्म और फर्स्ट स्टेज भी। तो फर्स्ट स्टेज बनानी ही है, यह जिसका दृढ़ संकल्प है, फास्ट जाना ही है, चाहे कुछ भी विघ्न हो लेकिन विघ्न, विघ्न नहीं रहे, विघ्न-विनाशक के आगे विजय के रूप में बदल जाये क्योंकि आप सभी विघ्न-विनाशक हो। टाइटिल क्या है? विघ्न-विनाशक। तो विघ्न आवे भी, खेल खेलने आयेगा लेकिन आप दूर से ही जान जाओ, रॉयल रूप में आयेगा लेकिन आप विघ्न-विनाशक दूर से ही जान जायेंगे कि यह क्या खेल हो रहा है, इसलिए बापदादा भी यही चाहते हैं कि सब बच्चे साथ चलें। पीछे नहीं रहें। बापदादा को बच्चों के बिना मजा नहीं आता है। तो दृढ़ता को कभी भी कमजोर नहीं करना। करना ही है। गे गे नहीं करना, करेंगे देखेंगे, हो जायेगा, देख लेना..., यह बातें नहीं करना। दृढ़ता सफलता की चाबी है, इस चाबी को कभी भी गंवाना नहीं। माया भी चतुर है ना, वह चाबी को ढूंढ लेती है, इसलिए इस चाबी को अच्छी तरह से सम्भालके रखो।
तो अभी चेक करना - अपने राज्य के संस्कार अभी से धारण करने ही हैं। गे गे नहीं करना, एक गे गे, दूसरा तो तो कहते हो.. यह शब्द ब्राह्मण डिक्शनरी से निकाल दो। चलो, कोई की भी कोई कमजोरी देखते भी हो, पुरुषार्थी तो सब हैं, नहीं तो ब्राह्मण जीवन से चले जाते, पुरुषार्थी हैं तब तो ब्राह्मण जीवन में चल रहे हैं ना, मानो कई ऐसे कहते हैं मैं तो बिल्कुल ठीक हूँ लेकिन दूसरे करते हैं ना तो वह सामने विघ्न बन जाता है। यह नहीं करे ना, यह बदले ना, लेकिन बाप ने पहले से ही स्लोगन दिया है, हमको बदलके उनको बदलाना है। मुझे बदलना है। वह बदले तो मैं बदलूं, नहीं। सुनाया ना - भाव और भावना को चेंज करो। भाव आत्मा का, और भावना, शुभ भावना। आप करके देखो, थक नहीं जाओ। शुभ भावना बहुत रखके देखी, बदलता नहीं है, यह तो बदलना ही नहीं है, आप ब्राह्मणों के मुख से यह शब्द बोलना कि बदलना नहीं है तो क्या यह वरदान हुआ? ब्राह्मण क्या वरदान देते हैं! वरदान देना अर्थात् सहारा देना। तो सभी को शुभ भावना का सहारा दो, नहीं तो किनारा करो। दिल में नहीं रखो। शुभ भावना की दुआ दो और शब्द नहीं दो। एक यह करते हैं, दूसरा! दूसरा शब्द बतायें क्या कहते हैं? क्योंकि आज बापदादा ने अच्छी तरह से चेंकिग की, दूसरा क्या करते हैं? यह तो चलता ही है, यह भी तो करता है ना, तो मैंने किया तो क्या हुआ। वह कुएं में गिर रहा है और आप भी गिरके देख रहे हो, क्या यह समझदारी है? अभी एक बात 18 जनवरी तक बापदादा पुरुषार्थ के लिए होमवर्क दे रहा है - करेंगे? करेंगे तो हाथ उठाओ।
कुछ भी हो जाए, बदलना पड़े, समाना पड़े, किनारा करना पड़े, लेकिन बदलेंगे। हाथ उठाया। पक्का? कि कहेंगे मैंने बहुत कोशिश की, नहीं हुआ, यह जवाब नहीं देना क्योंकि अभी अचानक के खेल बहुत होने हैं। और बापदादा चाहता है एक बच्चा भी पीछे नहीं रह जाए, साथ चले। इसलिए एक तो अगर कोई नहीं बदलता है, शुभ भावना रखी और कोई नहीं बदलता है तो आप अपने को बदलो, उसने यह कहा, उसने यह किया इसीलिए मुझे भी करना पड़ा, यह नहीं। करते सिखाने के भाव से हो, लेकिन देखते कमी को हो। इसीलिए भाव और भावना आत्मिक भाव, शुभ भावना। और यह शब्द कि यह तो होता ही रहता है, यह तो करते ही हैं ना, चल ही रहा है ना तो मैंने किया तो क्या हुआ... तो क्या बाप जब चलेंगे तो आप कहेंगे यह भी रह रहे हैं ना, मैं भी रह जाता हूँ, इसमें क्या है। तो सी फादर, और भाव और भावना दोनों का परिवर्तन। जब 5 तत्वों के प्रति आप शुभ भावना रखते हो तो क्या ब्राह्मण परिवार के प्रति शुभ भावना नहीं रख सकते! यह तो होता ही है, यह तो चलता ही है, यह शब्द समाप्त करो। मुझे बदलके दिखाना है। मैं बदलूंगा, और भी बदलेंगे, अवश्य बदलेंगे। इस निश्चय और शुभ भावना से चलो फिर देखो जल्दी जल्दी अपना राज्य आ जायेगा। तो यह दो बातें सदा के लिए धारण कर ली! यह बापदादा नहीं कहता है कि लिखकर सिर्फ भेजो, प्रतिज्ञा करने की फाइल, बापदादा के पास लिखत वाले फाइल वतन में बहुत पड़े हैं। प्रतिज्ञा नहीं, दृढ़ता के संकल्प रूप में यह दो बातें धारण करनी है। ठीक है टीचर्स? करनी है ना। अच्छा।
मातायें हाथ उठाओ, करेंगी? बड़ा हाथ उठाओ। पाण्डव हाथ उठाओ। पाण्डव भी उठा रहे हैं, ठीक है। बापदादा तो रोज़ देखता रहेगा। बापदादा को देखने में देरी नहीं लगती है। ठीक है ना। अच्छा।
सेवा का टर्न भोपाल ज़ोन का है:- अच्छी संख्या में पहुंच गये हो। बापदादा जिस भी बच्चे को जिस भी ज़ोन को देखते हैं तो उसी दृष्टि से देखते हैं कि यह हर एक बच्चा होवनहार है। कोई नये बच्चे भी अन्दर ही अन्दर सेवा की बहुत अच्छी कमाल कर रहे हैं, बापदादा के पास समाचार भले नहीं आये लेकिन बापदादा जानते हैं। तो कमाल करके दिखाना, शुरू में बहुत अच्छी सेवा की, आरम्भ किया था, बापदादा को याद है, अब कोई कमाल करके दिखाओ। करेंगे ना, करेंगे? अच्छा है।
सेवा का गोल्डन चांस तो हर ज़ोन को बहुत अच्छा मिलता है। बाप भी खुश हो जाते और आप सब भी खुशी से चांस लेते हो। अच्छा है, बापदादा खुश है, वृद्धि को देखके खुश है।
डबल विदेशी:- सभी डबल विदेशी उठो, यूथ भी उठो। आप सबकी तरफ से डबल पुरुषार्थी बच्चों को मुबारक दे रहे हैं। आप सभी मधुबन के श्रृंगार बन जाते हो। तो मधुबन के श्रृंगार को मुबारक हो, मुबारक हो, मुबारक हो।
अभी ऐसा ग्रुप बनाओ जो सदा एकरस एकाग्र रहे, कभी-कभी शब्द नहीं आवे। सदा शब्द हो, ऐसा ग्रुप बनाओ। सदा शब्द इतना पक्का हो, जो कभी-कभी क्या होता है, उस पुरुषार्थ में अन्जान हो जाए। चलते फिरते सदा शब्द प्रैक्टिकल हो, हर सबजेक्ट में। ऐसा ग्रुप विदेश में भी बना सकते हैं, देश में भी बना सकते हैं। रेस करो, चाहे छोटा ग्रुप बने, बड़ा ग्रुप बने, लेकिन कहाँ भी ऐसा ग्रुप बनाके दिखाओ। बनायेंगे! डबल पुरुषार्थी बच्चों की आदत है - जो सोचते हैं वह करके दिखाते हैं। तो यह करके दिखाओ। अच्छा।
चारों ओर के लवली और लक्की दृढ़ संकल्प वाले बच्चों को सोचा और किया, करेंगे, देखेंगे नहीं, सोचा और किया, सदा अपने को नष्टोमोहा में, सिर्फ संबंध का मोह नहीं, अपने देहभान और देह अभिमान का भी मोह नहीं। ऐसे नष्टोमोहा एवररेडी बच्चों को सदा श्रीमत में हाथ में हाथ देते, साथ उड़ने वाले और साथ में ब्रह्मा बाप के साथ अपने राज्य में आने वाले ऐसे तीव्र पुरुषार्थी उड़ती कला वाले बच्चों को बापदादा की बहुत-बहुत दुआयें और यादप्यार स्वीकार हो और बालक सो मालिक बच्चों को नमस्ते ।