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15 Dec 2024
“बापदादा की विशेष आशा - हर एक बच्चा दुआयें दे और दुआयें ले''
15 December 2024 · हिंदी
मधुबनअव्यक्त बापदादाओम् शान्ति 15-12-2004
प्राणप्यारे अव्यक्त मूर्त मात-पिता बापदादा के अति स्नेही, सदा रूहानी फखुर में रहने वाले बेफिक्र बादशाह, पवित्रता की लाइट के ताजधारी, स्वराज्य अधिकारी सर्व निमित्त टीचर्स बहिनें तथा ब्राह्मण कुल भूषण भाई बहिनें, ईश्वरीय स्नेह सम्पन्न मधुर याद स्वीकार करना जी।
बाद समाचार - आज बापदादा अपने बेफिक्र बादशाहों की सभा को देखकर बोले, बच्चे आप सदा स्वयं भी सन्तुष्ट रहने वाले और सर्व को सन्तुष्ट करने वाले हो। कभी कोई अप्राप्ति है ही नहीं जो असन्तुष्ट हों। तो बाबा कहते बच्चे, चेक करो कि सदा सर्व प्राप्ति सम्पन्न, सन्तुष्ट हैं? सन्तुष्टता ब्राह्मण जीवन का विशेष श्रृंगार है, श्रेष्ठ वैल्यु है। दूसरा बाबा कहे बच्चे, अभी इतनी दुआयें जमा कर लो, जो भक्ति मार्ग में अपने पूज्य स्वरूप से सभी भक्तों को दुआयें दे सको, उनकी मनोकामनायें पूरी कर सको। आज बापदादा ने बच्चों को विशेष होमवर्क भी दिया है - बच्चे, जिस बात में मेरा मेरा आता है, उस मेरे को तेरे में परिवर्तन कर दो। अभी सब बोझ बाप को देकर डबल लाइट रहो। कोई भी बोझ अपने सिर पर नहीं रखना तब बेफिक्र बादशाह बन उड़ती कला में उड़ सकेंगे। बोलो, ऐसा ही अनुभव करते हो ना।
इस बार सेवाओं का टर्न दिल्ली और आगरा ज़ोन का है। काफी संख्या में भाई बहिनें पहुंच गये हैं। डबल विदेशी भाई बहनें ज्ञान सरोवर में बहुत अच्छी तपस्या कर रहे हैं। सभी निमित्त बड़ी बहनों ने हर एक की विशेष उन्नति के लिए योग भट्ठी के विशेष कार्यक्रम रखे हैं। आने वाले सभी भाई बहिनें स्वयं को खूब भरपूर कर रहे हैं।
अभी तो नया वर्ष सामने आ रहा है, जरूर आप सभी इस नये वर्ष 2025 के लिए अपनी स्व-उन्नति और सेवाओं के लिए नये-नये प्लैन्स बना रहे होंगे! शान्तिवन में तो हर वर्ष 18 दिसम्बर से 18 जनवरी तक ट्रेनिंग सेन्टर में बाबा के कमरे में 8-9 घण्टे की अखण्ड तपस्या चलती है। सभी लक्ष्य रखते हैं हमें कम से कम रोज़ 24 घण्टे में 4 घण्टे बैठकर योग तपस्या करनी है। सभी मन और मुख का मौन भी रखते हैं। आप सभी भी ब्रह्मा बाबा के इस स्मृति मास में विशेष अन्तर्मुखी रह स्वयं को सम्पन्न बनाने की तपस्या के साथ-साथ पूरे विश्व को शक्तियों की सकाश देने की सेवा करना जी। इसके लिए रोज़ की मुरली में विशेष ब्रह्मा बाप समान सम्पूर्ण सम्पन्न बनने की प्वाइंटस जनवरी मास में आयेंगी। सभी ध्यान से सुनना और उसका अभ्यास करना जी। अच्छा- सभी को बहुत-बहुत याद... ओम् शान्ति।
आज बापदादा अपने चारों ओर के बेफिक्र बादशाहों की सभा को देख रहे हैं। यह राज सभा सारे कल्प में इस समय ही है। रूहानी फ़खुर में रहते हो इसलिए बेफिक्र बादशाह हो। सवेरे उठते हैं तो भी बेफिक्र, चलते फिरते, कर्म करते भी बेफिक्र और सोते हो तो भी बेफिक्र नींद में सोते हो। ऐसे अनुभव करते हो ना! बेफिक्र हैं? बने हैं वा बन रहे हैं? बन गये हैं ना! बेफिक्र और बादशाह हो, स्वराज्य अधिकारी इन कर्मेन्द्रियों के ऊपर राज्य करने वाले बेफिक्र बादशाह हो अर्थात् स्वराज्य अधिकारी हो। तो ऐसी सभा आप बच्चों की ही है। कोई फिक्र है? है कोई फिक्र? क्योंकि अपने सारे फिकर बाप को दे दिये हैं। तो बोझ उतर गया ना! फिकर खत्म और बेफिक्र बादशाह बन अमूल्य जीवन अनुभव कर रहे हो। सबके सिर पर पवित्रता के लाइट का ताज स्वत: ही चमकता है। बेफिक्र के ऊपर लाइट का ताज है, अगर कोई फिकर करते हो, कोई बोझ अपने ऊपर उठा लेते हो तो मालूम है सिर पर क्या आ जाता है? बोझ के टोकरे आ जाते हैं। तो सोचो ताज और टोकरे दोनों सामने लाओ, क्या अच्छा लगता? टोकरे अच्छे लगते या लाइट का ताज अच्छा लगता? बोलो, टीचर्स क्या अच्छा लगता है? ताज अच्छा लगता है ना! सभी कर्मेन्द्रियों के ऊपर राज्य करने वाले बादशाह हो। पवित्रता लाइट का ताजधारी बनाती है इसलिए आपके यादगार जड़ चित्रों में डबल ताज दिखाया है। द्वापर से लेकर बादशाह तो बहुत बने हैं, राजे तो बहुत बने हैं लेकिन डबल ताजधारी कोई नहीं बना। बेफिक्र बादशाह स्वराज्य अधिकारी भी कोई नहीं बना क्योंकि पवित्रता की शक्ति मायाजीत, कर्मेन्द्रियां जीत विजयी बना देती है। बेफिक्र बादशाह की निशानी है - सदा स्वयं भी सन्तुष्ट और औरों को भी सन्तुष्ट करने वाले। कभी भी कोई अप्राप्ति है ही नहीं जो असन्तुष्ट हो। जहाँ अप्राप्ति है वहाँ असन्तुष्टता है। जहाँ प्राप्ति है वहाँ सन्तुष्टता है। ऐसे बने हो? चेक करो - सदा सर्व प्राप्ति स्वरूप, सन्तुष्ट हैं? गायन भी है - अप्राप्त नहीं कोई वस्तु देवताओं के नहीं लेकिन ब्राह्मणों के खज़ाने में। सन्तुष्टता जीवन का श्रेष्ठ श्रृंगार है, श्रेष्ठ वैल्यु है। तो सन्तुष्ट आत्मायें हो ना!
बापदादा ऐसे बेफिक्र बादशाह बच्चों को देख खुश होते हैं। वाह मेरे बेफिक्र बादशाह वाह! वाह! वाह! हो ना! हाथ उठाओ जो बेफिक्र हैं। बेफिक्र? फिकर नहीं आता? कभी तो आता है? नहीं? अच्छा है। बेफिक्र बनने की विधि बहुत सहज है, मुश्किल नहीं है। सिर्फ एक शब्द की मात्रा का थोड़ा सा अन्तर है। वह शब्द है - मेरे को तेरे में परिवर्तन करो। मेरा नहीं तेरा, तो हिन्दी भाषा में मेरा भी लिखो और तेरा भी लिखो तो क्या फ़र्क होता है, मे और ते का? लेकिन फ़र्क इतना हो जाता है। तो आप सब मेरे-मेरे वाले हो या तेरे-तेरे वाले हो? मेरे को तेरे में परिवर्तन कर लिया? नहीं किया हो तो कर लो। मेरा-मेरा अर्थात् दास बनने वाला, उदास बनने वाला। माया के दास बन जाते हैं ना! तो उदास तो होंगे ना! उदासी अर्थात् माया के दासी बनने वाले। तो आप मायाजीत हो, माया के दास नहीं। तो उदासी आती है? कभी-कभी टेस्ट कर लेते हो, क्योंकि 63 जन्म उदास रहने का अभ्यास है ना! तो कभी-कभी वह इमर्ज हो जाती है इसलिए बापदादा ने क्या कहा? हर एक बच्चा बेफिक्र बादशाह है। अगर अभी भी कहाँ कोने में कोई फिकर रख दिया हो तो दे दो। अपने पास बोझ क्यों रखते हो? बोझ रखने की आदत पड़ गई है? जब बाप कहते हैं बोझ मेरे को दे दो, आप लाइट हो जाओ, डबल लाइट। डबल लाइट अच्छा या बोझ अच्छा? तो अच्छी तरह से चेक करना। अमृतवेले जब उठो तो चेक करना कि विशेष वर्तमान समय सबकान्सेस में भी कोई बोझ तो नहीं है? सबकान्सेस तो क्या स्वप्न मात्र भी बोझ का अनुभव नहीं हो। पसन्द तो डबल लाइट है ना! तो विशेष यह होम वर्क दे रहे हैं, अमृतवेले चेक करना। चेक करना तो आता है ना, लेकिन चेक के साथ, सिर्फ चेक नहीं करना चेंज भी करना। मेरे को तेरे में चेंज कर देना। मेरा, तेरा। तो चेक करो और चेंज करो क्योंकि बापदादा बार-बार सुना रहे हैं - समय और स्वयं दोनों को देखो। समय की रफ्तार भी देखो और स्वयं की रफ्तार भी देखो। फिर यह नहीं कहना कि हमको तो पता ही नहीं था, समय इतना तेज चला गया। कई बच्चे समझते हैं कि अभी थोड़ा ढीला पुरुषार्थ अगर है भी तो अन्त में तेज कर लेंगे। लेकिन बहुतकाल का अभ्यास अन्त में सहयोगी बनेगा। बादशाह बनके तो देखो। बने हैं लेकिन कोई बने हैं, कोई नहीं बने हैं। चल रहे हैं, कर रहे हैं, सम्पन्न हो जायेंगे....। अब चलना नहीं है, करना नहीं है, उड़ना है। अभी उड़ने की रफ्तार चाहिए। पंख तो मिल गये हैं ना! उमंग-उत्साह और हिम्मत के पंख सबको मिले हैं और बाप का वरदान भी है, याद है वरदान? हिम्मत का एक कदम आपका और हजार कदम मदद बाप की, क्योंकि बाप का बच्चों से दिल का प्यार है। तो प्यार वाले बच्चों की बाप मेहनत नहीं देख सकते। मुहब्बत में रहो तो मेहनत समाप्त हो जायेगी। मेहनत अच्छी लगती है क्या? थक तो गये हो। 63 जन्म भटकते, भटकते मेहनत करते थक गये थे और बाप ने अपनी मुहब्बत से भटकने के बजाए तीन तख्त के मालिक बना दिया। तीन तख्त जानते हो? जानते क्या हो लेकिन तख्त निवासी हो। अकालतख्त निवासी भी हो, बापदादा के दिलतख्त नशीन भी हो और भविष्य विश्व राज्य के तख्त नशीन भी हो। तो बापदादा सभी बच्चों को तख्त नशीन देख रहे हैं। ऐसा परमात्म दिलतख्त सारे कल्प में अनुभव नहीं कर सकेंगे। क्या समझते हैं पाण्डव? बादशाह हैं? हाथ उठा रहे हैं। तख्त नहीं छोड़ना। देह भान में आये अर्थात् मिट्टी में आ गये। यह देह मिट्टी है। तख्त नशीन बने तो बादशाह बने।
बापदादा सभी बच्चों के पुरुषार्थ का चार्ट चेक करते हैं। चार ही सबजेक्ट में कौन-कौन कहाँ तक पहुंचा है? तो बापदादा ने हर एक बच्चे का चार्ट चेक किया कि बापदादा ने जो भी खज़ाने दिये हैं वह सर्व खज़ाने कहाँ तक जमा किये हैं? तो जमा का खाता चेक किया क्योंकि खज़ाने बाप ने सबको एक जैसे, एक जितना दिया है, कोई को कम, कोई को ज्यादा नहीं दिया है। सबसे बड़ा खज़ाना है श्रेष्ठ संकल्प का खज़ाना। संकल्प भी खज़ाना है, तो वर्तमान समय भी बहुत बड़ा खज़ाना है क्योंकि वर्तमान समय में जो कुछ प्राप्त करने चाहे, जो वरदान लेने चाहें, जितना अपने को श्रेष्ठ बनाने चाहे, उतना अभी बना सकते हैं। अब नहीं तो कब नहीं। जैसे संकल्प के खज़ाने को व्यर्थ गंवाना अर्थात् अपने प्राप्तियों को गंवाना। ऐसे ही समय के एक सेकण्ड को भी व्यर्थ गंवाया, सफल नहीं किया तो बहुत गंवाया। साथ में ज्ञान का खज़ाना, गुणों का खज़ाना, शक्तियों का खज़ाना और हर आत्मा और परमात्मा द्वारा दुआओं का खज़ाना। सबसे सहज है पुरुषार्थ में “दुआयें दो और दुआयें लो।'' सुख दो और सुख लो, न दु:ख दो न दु:ख लो। ऐसे नहीं कि दु:ख दिया नहीं लेकिन ले लो तो भी दु:खी तो होंगे ना! तो दुआयें दो, सुख दो और सुख लो। दुआयें देना आता है? आता है? लेना भी आता है? जिसको दुआयें लेना और देना आता है वह हाथ उठाओ। अच्छा - सभी को आता है? अच्छा - डबल फॉरेनर्स को भी आता है? मुबारक है, देने आता है लेने आता है तो मुबारक है। सभी को मुबारक है, अगर लेने भी आता और देने भी आता फिर और चाहिए क्या। दुआयें लेते जाओ दुआयें देते जाओ, सम्पन्न हो जायेंगे। कोई बद-दुआ देवे तो क्या करेंगे? लेंगे? बद-दुआ आपको देता है तो आप क्या करेंगे? लेंगे? अगर बद-दुआ मानों ले लिया तो आपके अन्दर स्वच्छता रही? बद-दुआ तो खराब चीज़ है ना! आपने ले ली, अपने अन्दर स्वीकार कर ली तो आपका अन्दर स्वच्छ तो नहीं रहा ना! अगर ज़रा भी डिफेक्ट रहा तो परफेक्ट नहीं बन सकते। अगर खराब चीज़ कोई देवे तो आप ले लेंगे? कोई बहुत सुन्दर फल हो लेकिन आपको खराब हुआ दे देवे, फल तो बढ़िया है फिर ले लेंगे? नहीं लेंगे ना कि कहेंगे अच्छा तो है, चलो दिया है तो ले लें। कभी भी कोई बद-दुआ दे तो आप मन में अन्दर धारण नहीं करो। समझ में आता है यह बद-दुआ है लेकिन बद-दुआ अन्दर धारण नहीं करो, नहीं तो डिफेक्ट हो जायेगा। तो अभी यह वर्ष, अभी थोड़े दिन पड़े हैं पुराने वर्ष में लेकिन अपने दिल में दृढ़ संकल्प करो, अभी भी किसकी बद-दुआ मन में हो तो निकाल दो और कल से दुआ देंगे, दुआ लेंगे। मंजूर है? पसन्द है? पसन्द है या करना ही है? पसन्द तो है लेकिन जो समझते हैं करना ही है, कुछ भी हो जाये, लेकिन करना ही है, वह हाथ उठाओ। करना ही है।
टीचर्स उठा रही हैं? यह कैबिन वाले नहीं उठा रहे हैं। यह समझते हैं हम तो देते ही हैं। अभी करना ही है। कुछ भी हो जाए, हिम्मत रखो। दृढ़ संकल्प रखो। अगर मानों कभी बद-दुआ का प्रभाव पड़ भी जावे ना तो 10 गुणा दुआयें ज्यादा दे करके उसको खत्म कर देना। एक बद-दुआ के प्रभाव को 10 गुणा दुआयें देके हल्का कर देना फिर हिम्मत आ जायेगी। नुकसान तो अपने को होता है ना, दूसरा तो बद-दुआ देके चला गया लेकिन जिसने बद-दुआ समा ली, दु:खी कौन होता है? लेने वाला या देने वाला? देने वाला भी होता है लेकिन लेने वाला ज्यादा होता है। देने वाला तो अलबेला होता है।
आज बापदादा अपने दिल की विशेष आशा सुना रहे हैं। बापदादा की सभी बच्चों के प्रति, एक-एक बच्चे के प्रति चाहे देश, चाहे विदेश में हैं, चाहे सहयोगी हैं क्योंकि सहयोगियों को भी परिचय तो मिला है ना। तो जब परिचय मिला है तो परिचय से प्राप्ति तो करनी चाहिए ना। तो बापदादा की यही आशा है कि हर बच्चा दुआयें देता रहे। दुआओं का खजाना जितना जमा कर सको उतना करते जाओ क्योंकि इस समय जितनी दुआयें इकट्ठी करेंगे, जमा करेंगे उतना ही जब आप पूज्य बनेंगे तो आत्माओं को दुआयें दे सकेंगे। सिर्फ अभी दुआयें आपको नहीं देनी है, द्वापर से लेके भक्तों को भी दुआयें देनी हैं। तो इतना दुआओं का स्टॉक जमा करना है। राजा बच्चे हो ना! बापदादा हर एक बच्चे को राजा बच्चा देखते हैं। कम नहीं। अच्छा।
सेवा का टर्न दिल्ली/अगारा ज़ोन का है:- अच्छा दिल्ली वाले सभी उठो। दिल्ली का नाम सुन करके सब खुश होते हो ना! क्योकि कल्प-कल्प की आपकी राजधानी है। वैसे देखो ड्रामा में राजधानी दिल्ली तो है ही लेकिन सेवा की आरम्भ भी दिल्ली से हुई। यह यज्ञ सेवा का चांस मिला है। यज्ञ सेवा का फल बहुत बड़ा है क्योंकि यज्ञ सेवा अर्थात् ब्राह्मण आत्माओं की सेवा।
डबल विदेशी:- हाथ हिलाओ। सभी ने देखा। अच्छा है। डबल मुबारक हो। आप लोगों को भी देखकर सभी खुश होते हैं। अगर कोई भी टर्न में डबल विदेशी नहीं होते हैं ना तो संगठन में कमी लगती है इसलिए बहुत अच्छा है। हर ग्रुप में आते रहें। शोभा है ना। हर एक बच्चा इस दरबार का श्रृंगार है। तो उड़ते रहना, चलना नहीं, दौड़ना नहीं, हाई जम्प नहीं देना, उड़ना। उड़ने वाले। देखो डबल विदेशी स्थूल में भी उड़ने के बिना पहुंच नहीं सकते हैं, उड़के ही आना पड़ता है। तो इस सम्पन्न बनने की मंजिल पर पहुंचने में भी उड़ती कला में रहना। अच्छा - मुबारक हो। अच्छा! और जो दूर बैठे सुन रहे हैं, देख रहे हैं, कोई सुनने वाले हैं, कोई देखने और सुनने वाले हैं, दोनों को चारों ओर के बच्चों को बहुत-बहुत-बहुत मुबारक और याद क्योंकि हर सीज़न में, हर टर्न मे सभी पत्र बहुत भेजते हैं। तो बापदादा को वह पत्र पहुंचते हैं, ऐसे ही नहीं जाते हैं, पहुंचते हैं। कोई प्यार के पत्र भेजते, कोई अपने पुरुषार्थ के पत्र भेजते, कोई सेवा के पत्र भेजते, कोई प्रॉमिस के पत्र भेजते हैं, प्रॉमिस भी बहुत अच्छी-अच्छी करते हैं। तो बापदादा के पास सब प्रकार के और सब तरफ से पत्र पहुंच जाते हैं। आपके मुआफिक्र बापदादा पत्र बैठ पढ़ते तो नहीं हैं लेकिन पहुंच जाते हैं दिल में। पत्रों का पोस्ट आफिस बापदादा की दिल में है, तो वहाँ पहुंच जाते हैं।
अच्छा। चारों ओर के बेफिक्र बादशाहों को, सदा रूहानी फ़खुर में रहने वाले श्रेष्ठ आत्माओं को, सदा प्राप्त हुए खजानों को जमा खाते में बढ़ाने वाले तीव्र पुरुषार्थी आत्माओं को, सदा एक समय में तीनों प्रकार की सेवा करने वाले श्रेष्ठ सेवाधारी बच्चों को बापदादा का यादप्यार, पदम-पदम-पदमगुणा यादप्यार और नमस्ते।