“ सर्व खजानों से सम्पन्न अपने चेहरे वा चलन से अलौकिकता का साक्षात्कार कराओ ''
मधुबन अव्यक्त बापदादा
आज सर्व खजानों के दाता अपने खजानों के मालिक बच्चों को देख रहे हैं। हर एक बच्चा सर्व खजानों से सम्पन्न है क्योंकि बाप ने सर्व बच्चों को एक जैसे एक ही समय में सर्व खजाने दिये हैं। तो बापदादा अपने बालक सो मालिक बच्चों से मिलने आये हैं। बच्चों ने बुलाया तो बाप बच्चों के स्नेह में पहुंच गये हैं। खजाने तो बहुत हैं, सबसे पहला खजाना है ज्ञान धन, जिस ज्ञान धन से मालामाल हो गये, महादानी बन औरों को भी बांटते रहते हो। जिस ज्ञान के खजाने से भिन्न-भिन्न बंधनों में फंसी हुई आत्मा, उन सब बंधनों से मुक्त हो गई। बन्धनयुक्त से बन्धनमुक्त हो गये। साथ में योग अर्थात् याद का खजाना, जिससे अनेक शक्तियां प्राप्त की हैं। ऐसे ही धारणा द्वारा सर्व गुणों की अनुभूति अर्थात् खजाना मिला है। साथ में धारणा की शक्ति से सर्व के स्नेह की शक्ति, सर्व के प्यारे और न्यारेपन की शक्ति का खजाना प्राप्त किया, सर्व के स्नेह का खजाना अनुभव किया। साथ में सर्व ब्राह्मण सम्बन्ध से अपार खुशी का खजाना अनुभव किया। लेकिन सर्व खजानों के साथ जो विशेष खजाना है वह है संगम के समय का खजाना। जिस आत्मा को समय के खजाने का महत्व है वह सदा अनेक प्राप्तियों के मालिक बन जाते हैं क्योंकि संगमयुग का समय बहुत छोटा है लेकिन समय से प्राप्तियां ज्यादा हैं। सबसे ज्यादा संगमयुग की श्रेष्ठ से श्रेष्ठ प्राप्ति है स्वयं भगवान बाप रूप में, शिक्षक रूप में, सतगुरू के रूप में प्राप्त होता है। संगमयुग में छोटे से जन्म में 21 जन्म की प्राप्ति, जिसमें तन, मन, धन, जन सर्व प्राप्ति हैं और गैरन्टी है 21 जन्म फुल, आधा नहीं, पौना नहीं लेकिन फुल 21 जन्म की गैरन्टी है। तो सबसे ज्यादा जो महत्व है वह है संगमयुग का एक-एक सेकण्ड अनेक वर्षों के समान है। तो बोलो, सर्व खजानों से सम्पन्न तो हैं? सम्पन्न है ना? इसलिए बापदादा सदा समय की स्मृति दिला रहे हैं। कई बच्चे समझते हैं कि एक दो मिनट अगर और कुछ सोच लिया, तो 2 मिनट ही तो हैं। लेकिन जितना समय का महत्व है उस अनुसार तो 2 मिनट नहीं, 2 मास भी नहीं, दो वर्ष के समान हैं। इतना महत्व है संगम के समय का। सर्व शक्तियों की, सर्व गुणों की, परमात्म प्यार की, ब्राह्मण परिवार के प्यार की और कल्प पहले वाले ईश्वरीय हक की, यह सर्व प्राप्तियाँ इस छोटे से युग में हैं और कोई भी युग में यह सर्व प्राप्ति नहीं। राज्य भाग्य होगा, आप सबका राज्य होगा, सुख शान्ति सब होगा लेकिन परमात्म मिलन का, अतीन्द्रिय सुख का, सर्व ब्राह्मण परिवार के प्यार का, आदि मध्य अन्त की नॉलेज का भाग्य अब संगम पर ही मिला है, हर कल्प मिलता रहेगा।
तो बापदादा हर बच्चे के चेहरे से देखते हैं कि खजाने जमा कितने हैं? खजाने तो मिले लेकिन हर एक ने कितना जमा का खाता बढ़ाया है, वह हर एक के चेहरे से, चलन से दिखाई देता है और आप सब भी अपने आपको जानते हो कि मैंने कितना जमा किया है! अभी बापदादा के दिल की यही आश है कि खजाने मिले तो हैं लेकिन अब समय सिर्फ वर्णन करने का नहीं है लेकिन आपका चेहरा और चलन प्रत्यक्ष अनुभव कराये कि यह आत्मायें कोई विशेष हैं, न्यारे हैं और परमात्म प्यारे हैं क्योंकि आगे चलकर समय परिवर्तन होने से आपकी सेवा सिर्फ वर्णन करने से नहीं, समय नाजुक होने से इतना समय कोई निकाल नहीं सकेगा लेकिन आपके खजाने सम्पन्न चेहरे से, चलन से आपकी अलौकिकता का दूर से ही साक्षात्कार होगा। तो ऐसा पुरुषार्थ अभी अपना प्रत्यक्ष करो। जैसे ब्रह्मा बाप को देखा, चाहे संगठन के बीच में भी रहा तो भी दूर से वह पर्सनैलिटी, चमक अनुभव हुई। ऐसे अभी डबल विदेशी विशेष डबल पुरुषार्थ करो। बापदादा डबल पुरुषार्थी कहते हैं। वृद्धि का पुरुषार्थ अच्छा कर रहे हैं, निमित्त बनी हुई आत्माओं से पालना भी सभी को बहुत अच्छी मिल रही है और बापदादा को एक बात सभी की बहुत अच्छी लगती है कि सर्व आत्मायें हर वर्ष अपना संगठन का मिलन मधुबन में विशेष करते हैं क्योंकि मधुबन का वायुमण्डल रिफ्रेशमेंट में बहुत सहयोग देता है और एक ही जिम्मेवारी है - स्व-परिवर्तन, मन्सा सेवा, एक दो के अनुभवों का भी अच्छा चांस मिलता है। तो बापदादा इस बात पर मुबारक देते हैं।
अभी कुछ कमाल अपने-अपने स्थान पर जाकर करना, कुछ न्यारापन जो बाप को प्यारा है वह प्रैक्टिकल में अनुभव कराना जिससे मधुबन की रिफ्रेशमेंट का सहयोग वहाँ भी अनुभव करते रहेंगे। अच्छा लगता है, बापदादा ने पहले भी सुनाया है कि डबल विदेशी या डबल पुरुषार्थी बच्चों ने बाप का एक विशेष टाइटिल प्रत्यक्ष किया है। जो विदेश में मैजारिटी तरफ के बाप के बच्चों को निकाल उनकी भी तकदीर की तस्वीर बना दी है, इसीलिए लगन से जो चारों ओर मेहनत कर रहे हैं, उससे बाप का विश्व कल्याणकारी कर्तव्य प्रसिद्ध किया है। इसीलिए बापदादा हर बच्चे को वाह! बच्चा वाह! की मुबारक देते हैं। अभी भी जैसे भारत में कोने-कोने में सन्देश देने की सेवा चलती रहती है ऐसे वहाँ भी उमंग-उत्साह है कि रहे हुए देश में सन्देश दे दें क्योंकि समय पर कोई भरोसा नहीं। बापदादा ने पहले से ही कहा है कि अचानक क्या भी हो सकता है इसलिए सन्देश देने का वा अपने प्रोग्रेस का अभी-अभी, कभी-कभी नहीं, बापदादा ने कहा ही है कि वास्तव में ब्राह्मणों की डिक्शनरी में कभी-कभी शब्द शोभता नहीं है, अभी-अभी, संकल्प किया करना ही है। देखेंगे, करेंगे, यह गे-गे का शब्द ही नहीं है इसलिए आपकी मम्मा ने भी यही लक्ष्य रखा और सबको याद दिलाया कि “अब नहीं तो कब नहीं''।
तो डबल पुरुषार्थी बच्चे अभी-अभी करने वाले हैं या कभी-कभी? जो समझते हैं कि अभी-अभी करके दिखाने वाले हैं, वह हाथ उठाओ। करना ही है। करना ही है। करेंगे नहीं, करना ही है। याद रखना, अपने आपही अपना चार्ट रखना और बापदादा ने पहले ही सुनाया है कि हर रात्रि को बापदादा को अपने सारे दिन का चार्ट सुनाने के बाद अपना दिमाग खाली करके सोने से आपको नींद भी अच्छी आयेगी और साथ में रोज़ का हालचाल देने से दूसरे दिन याद रहता है कि बाबा को हमने अपना कहा है, तो वह स्मृति सहयोग देती है। फिर धर्मराजपुरी में जाना नहीं पड़ेगा। दे दिया ना और परिवर्तन कर लिया तो धर्मराजपुरी से बच जायेंगे। अभी दूसरे वर्ष, देखा तो किसने नहीं है लेकिन अभी लक्ष्य रखो, वर्ष को छोड़ो, कम से कम जितने थोड़े समय में बाप की जो आश है कि चेहरा दिखाई दे, चलन दिखाई दे, वह जल्दी से जल्दी प्रैक्टिकल में करके दिखाओ। हिम्मत है, तो हाथ उठाओ। हिम्मत है? हिम्मत है? अच्छा मुबारक हो। बापदादा तो हर बच्चे में निश्चय और हिम्मत का उमंग-उत्साह अभी-अभी देख रहा है। लेकिन जाते-जाते प्लेन में थोड़ा कम नहीं करना। बढ़ाते रहना। बापदादा ने जो दृढ़ संकल्प की चाबी दी है उसको सदा ही कायम रखना। करना ही है, अभी-अभी, गे गे नहीं। वह समय अभी गया। हो जायेगा नहीं, होना ही है। बापदादा ने डबल पुरुषार्थी का टाइटिल जो दिया है, उसको सदा याद रखना।
अभी इस वर्ष में विशेष कौन सी बात प्रैक्टिकल में करनी है, वह सुना दिया कि अभी आपको जो भी देखे उसको आपके चेहरे में चमक दिखाई दे। प्रत्यक्षता के निमित्त बनना है, बाप को प्रत्यक्ष करना है तो क्या करना है? सदा मुस्कराता हुआ चेहरा, कोई चिंतन में, कोई उलझन में नहीं। बापदादा ने सुनाया था कि अभी दो शब्द याद करो - माया को इशारा करो गेट आउट और अपने को गेस्ट हाउस में अनुभव करो। यह दुनिया आपकी नहीं है, गेस्ट हाउस है, अब तो घर जाना ही है। घर के नज़ारे मन में बुद्धि में दिखाई दें। तो आटोमेटिकली घर आया कि आया। आपका एक गीत है - अब घर चलना है। तो यह लहर हर स्थान पर हो, चाहे भारत, चाहे विदेश, अब यह अनुभव प्रत्यक्ष करके दिखाओ। बेहद का वैराग्य, गेस्ट हाउस में दिल नहीं लगती, जाना है, जाना है, याद रहता है। तो यह बेहद का वैराग्य कोई भी प्रकार के मन के संकल्पों को, आपस में संगठन के माया के विघ्नों को एकदम समाप्त कर देगा। यह माया के तूफान आपके लिए तोहफा बन जायेंगे। यह जो छोटे-मोटे पेपर आते हैं यह पेपर नहीं लगेंगे लेकिन एक अनुभव बढ़ाने की लिफ्ट लगेंगे। गिफ्ट और लिफ्ट। समझा। अभी लक्ष्य रखो बेहद के वैरागी और हिम्मत उमंग-उत्साह के पंखों से उड़ते रहो और उड़ाते रहो। अभी उड़ने का समय है। अपने पंख सदा चेक करो कमजोर तो नहीं हो रहे हैं!
तो बापदादा अभी क्या देखने चाहते हैं? हर बच्चा बाप समान सम्पन्न और सम्पूर्ण, सर्व खजानों से सम्पन्न और हर श्रीमत जो मिलती रही है उसमें सम्पूर्ण। पसन्द है? पसन्द है तो ताली बजाओ। अच्छा। यह ताली हर दिन याद करना, अपने आप ही मन में बजाना, बाहर से नहीं मन में बजाना। यह होम वर्क है। अच्छा।
सेवा का टर्न -इन्दौर-आरती , भोपाल ज़ोन का है।
सभी ने आगे बढ़ने का संकल्प भी किया है और आपस में रूहरिहान भी की है। बापदादा के पास समाचार आता रहता है। अभी एवररेडी ग्रुप बनाओ।
यहाँ सभी निर्विघ्न रहेंगे, एवररेडी रहेंगे, मायाजीत रहेंगे, स्नेही और सेवा में सहयोगी रहेंगे। जो नम्बरवन होगा उसको बापदादा प्राइज़ देगा। चलो, एक नहीं तो तीन को देंगे। एक दो तीन।
तीन नम्बर। पसन्द है? हाँ हाथ हिलाओ। पसन्द है? ठीक है? तैयार होंगे ना! फिर बापदादा प्राइज देंगे। बहुत अच्छा, इसकी ताली तो बजाओ। अच्छा। बापदादा भी खुश होते हैं, वाह तीव्र पुरुषार्थी बच्चे वाह! अच्छा।
चारों ओर के तीव्र पुरुषार्थी हिम्मत और उमंग-उत्साह से उड़ने वाले, चलने वाले नहीं, उड़ने वाले, चारों ओर के बाप समान सम्पन्न और सम्पूर्ण बनने वाले बापदादा के दिलतख्तनशीन, सदा बाप के कम्बाइन्ड रूप का अनुभव और सहयोग लेने वाले हर एक बाप के सिकीलधे, स्नेही बच्चों को बापदादा का यादप्यार और नमस्ते।
